Wednesday, 24 October 2012

यूँ आरंभ हुआ विजयदशमी पर्व

आज दशहरा (विजयदशमी) पर्व है. यह पर्व भारतीय संस्कृति में सबसे ज्यादा बेसब्री के साथ इंतजार किये जाने वाला त्यौहार है। दशहरा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के शब्द संयोजन "दश" व "हरा" से हुयी है, जिसका अर्थ भगवान राम द्वारा रावण के दस सिरों को काटने व तत्पश्चात रावण की मृत्यु रूप में राक्षस राज के आंतक की समाप्ति से है। यही कारण है कि इस दिन को विजयदशमी अर्थात अन्याय पर न्याय की विजय के रूप में भी मनाया जाता है। दशहरे से पूर्व हर वर्ष शारदीय नवरात्र के समय मातृरूपिणी देवी नवधान्य सहित पृथ्वी पर अवतरित होती हैं- क्रमशः शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी व सिद्धिदात्री रूप में माँ दुर्गा की लगातार नौ दिनों तक पूजा होती है।

ऐसी मान्यता है कि नवरात्र के अंतिम दिन भगवान राम ने चंडी पूजा के रूप में माँ दुर्गा की उपासना की थी और माँ ने उन्हें युद्ध में विजय का आशीर्वाद दिया था। इसके अगले ही दिन दशमी को भगवान राम ने रावण का अंत कर उस पर विजय पायी, तभी से शारदीय नवरात्र के बाद दशमी को विजयदशमी के रूप में मनाया जाता है और आज भी प्रतीकात्मक रूप में रावण-पुतला का दहन कर अन्याय पर न्याय के विजय की उद्घोषणा की जाती है.

दशहरे की परम्परा भगवान राम द्वारा त्रेतायुग में रावण के वध से भले ही आरम्भ हुई हो, पर द्वापरयुग में महाभारत का प्रसिद्ध युद्ध भी इसी दिन आरम्भ हुआ था। पर विजयदशमी सिर्फ इस बात का प्रतीक नहीं है कि अन्याय पर न्याय अथवा बुराई पर अच्छाई की विजय हुई थी बल्कि यह बुराई में भी अच्छाई ढूँढ़ने का दिन होता है।

आप सभी को विजयदशमी पर्व की ढेरों शुभकामनायें !!

कृष्ण कुमार यादव

Sunday, 21 October 2012

हिंदी के श्रेष्ठ शिशु-बाल गीत

हिन्दी के श्रेष्ठ शिशु और बाल गीतों की यदि चर्चा हो तो सर्वप्रथम हमारा ध्यान लोक-साहित्य पर जाता है। जिसमें न केवल अनेक लोककथाओं को पिरोते हुए बच्चों के लिए कविताएँ मिलती हैं बल्कि स्वर, लय और ध्वनि के चमत्कार से सुसाित बाल-मन को लुभाने वाले अनेक खेल गीत भी विद्यमान हैं। बाल लोकगीतकारों ने शिशु-मानस को बहुत आत्मीयता से देखा है और उसके अनुरूप ही गीत रचे हैं। इन गीतों के रचयिताओं के नाम कोई नहीं जानता लेकिन ये बाल और शिशु गीत हिंदी समाज में बच्चों के मन को वर्षों से गुदगुदाते आए हैं।

अक्कड़-बक्कड़ बंबे बोअस्सी नब्बे पूरे सौ।
सौ में लगा धागाचोर निकल के भागा।
 
यह एक ऐसा लोक खेल-गीत है जिसे गाकर बच्चे अपना कोई भी खेल आरंभ करते हैं।
बच्चों के लिए लोक-साहित्य में चंदा को हमेशा बच्चों के मामा की तरह प्रस्तुत किया गया है और चंदा मामा को लेकर अनेक बाल तथा शिशु-गीत प्रचलित हैं।

चंदा-मामा दूर केपुए पकाए पूर के
आप खाए थाली मेंमुन्ने को दें प्याली में
प्याली गई टूटमुन्ना गया रूठ!

ये प्लालियाँ, कटोरियाँ जिसमें बच्चे दूध-दही-भात, मनपसंद व्यंजन खाते हैं-बच्चों के मन में बसी रहती हैं।

लल्ला लल्ला लोरीदूध की कटोरी
दूध में बताशालल्ला करें तमासा।


या फिर,

अटकन-बटकन दही चटाकनमामा लाए चार कटोरी
एक कटोरी टूट गईमामा की बहू रूठ गई।


लोक-साहित्य अलिखित साहित्य है। पर हिंदी में लिखित बाल-साहित्य का प्रारंभ हम भारतेन्दु-युग से मान सकते हैं। इससे पहले बाल-साहित्य के नाम पर संस्कृत से हिंदी में अनुवादित केवल पंचतंत्र और हितोपदेश जैसी कृतियाँ ही थीं। इसमें बेशक बच्चों की अस्मिता झलकती है। भारतेंदु हरिश्चन्द्र की प्रेरणा से बाल-दर्पण (1862) तथा बालबोधिनी (1874) पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ। इन पत्रिकाओं से ही हिंदी में बाल-साहित्य का जन्म हुआ। भारतेंदु-युग के प्रमुख बाल साहित्यकारों में सबसे पहले स्वयं भारतेन्दु हरिशचन्द्र का ही नाम आता है। आपकी बालोपयोगी पुस्तकों में सत्य हरिश्चन्द्र, अंधेर नगरी, बादशाह दर्पण और कश्मीर कुसुम प्रमुख हैं। अंधेर नगरी की ये पंक्तियाँ तो आज भी बच्चों का ही नहीं, बड़ों-बड़ों का भी केवल मनोरंजन ही नहीं करतीं, उन्हें सोचने के लिए भी बाध्य करती हैं।

अंधेर नगरी चौपट राजा।
टके सेर भाजी, टके सेर खाजा॥


पूर्व स्वतंत्रता युग, जिसे हम 1901 से 1947 तक मान सकते हैं, में हिन्दी बाल साहित्य में काफी बढ़ोतरी हुई। इस काल के बाल साहित्यकारों में कामताप्रसाद गुरु, मैथिलीशरण गुप्त, रामनरेश त्रिपाठी, सुखदेव चौबे, विद्याभूषण, विशु, गिरजा दत्त शुक्ल, श्रीनाथ सिंह, सोहनलाल द्विवेदी, रामेश्वर गुरु, आदि प्रमुख हैं। इनमें से कई ऐसे कविलेखक हैं जो स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े रहे और जिनमें राष्ट्रीय भावना की प्रमुखता रही। इनकी बाल कविताएं भी राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत रहीं। सोहनलाल द्विवेदी इनमें प्रमुख कवि कहे जा सकते हैं। हजारी प्रसाद द्विवेदी का कहना था कि हिंदी में बड़े-बड़े साहित्यकार तो हैं किंतु बच्चों के माई-बाप तो केवल सोहनलाल द्विवेदी हैं। द्विवेदी जी ने राष्ट्रभाव को विकसित और प्रेरित करने के लिए अनेकानेक बाल गीत लिखे और इनमें उपदेश भी कुछ इस तरह दिया कि बच्चों का अपना स्वाद बरकरार रहे-

मीठा होता खस्ता खाजा
मीठा होता हलुआ ताजा
मीठे होते गट्टे गोल
सबसे मीठे, मीठे बोल
मैंने पाले बहुत कबूतर
भोले भाले बहुत कबूतर
पहने हैं पैंजनी कबूतर





बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दौर में जिन्हें और शिशु गीतकारों के रूप में प्रथम कवियों में सम्मिलित किया जा सकता है वे हैं, श्रीधर पाठक, बालमुकुंद गुप्त, सत्यनारायण कविरत्न आदि। बालमुकुंद गुप्त ने रेलगाड़ी नाम से एक अत्यंत सुंदर कविता लिखीं-

हिस हिस हिस हिस हिस हिस करती
रेल धड़ाधड़ जाती है
जिन जंजीरों से जकड़ी है
उन्हें खूब खड़काती है।





इस बाल गीत में स्पष्ट ही स्वतंत्रता के लिए प्रयत्न करने का उपदेश भी निहित है। इस काल प्रसंग में यदि अयोध्यासिंह उपाध्याय का नाम न लिया जाय तो यह उनके साथ बड़ा अन्याय होगा। हरिऔघ एक गंभीर कवि थे, लेकिन उन्होंने कई बालोपयोगी कविताएं लिखीं। उन्हें भी हिंदी के प्रथम बालकवियों में नि:संदेह रखा जा सकता है। उनकी एक प्रसिद्ध कविता बंदर शीर्षक से है-

देखो लड़कों बंदर आयाएक मदारी उसको लाया।
उसका है कुछ ढंग निरालाकानों में पहने वो बाला॥




पूर्व स्वतंत्रता युग के कुछ अन्य कवियों ने अत्यंत रोचक और बाल-मन में अपनी पैठ बनाती कविताएं रची हैं जिन्हें हम न केवल उत्कृष्ट कविताएं कह सकते हैं, बल्कि जो शिशु-बाल गीत लेखन के लिए एक मापदंड बनाती हैं। श्रीनाथ सिंह की एक कविता है-

नानी का संदूक
नानी का संदूक निरालाहुआ धुएं से बेहद काला
पीछे से वह खुल जाता हैआगे लटका रहता ताला
चंदन चौकी देखी उसमेंसूखी लौकी देखी उसमें
बाली जौ की देखी उसमेंखाली जगहों में है ताला।


भावपूर्ण, संवेदनशील और श्रेष्ठ गीतों को लिखने में जिस कवि ने सचमुच एक बड़ा और युगांतर काम किया है, वह है निरंकार देव सेवक। उन्होंने ही सच पूछा जाय, शिशु गीतों की असली पहचान कराई, उनकी खूबियों पर प्रकाश डाला और साथ ही उन्हें एक आधुनिक मुहावरा दिया। उनका एक मजेदार बाल गीत इस प्रकार है-

अगर मगर दो भाई थे, लड़ते खूब लड़ाई थे।
अगर मगर से छोटा था, मगर मगर से खोटा था.


-


अभी तक चिड़िया हिंदी शिशुबाल कविताओं में चीं चीं चूं चूं ही बोलती थी। एक प्रसिद्धि कविता है- चिडिया है चीं चीं बोल रही कानों में अमृत घोल रही वे फुदक-फुदक इठलाती हैं वे सबका मन बहलाती हैं। निरंकार जी ने चिड़ियों की बोली को एक नया आकार दिया। चिड़ियों की यह नई बोली हिंदी को अंग्रेजी अक्षरों और उनके संयोजन से मिली

टी-टुट टुट
चिड़िया कहती टी-टुट टुट, मुझको भी दे दो बिस्कुट
भूखी हूं, मैं खाऊंगी, खा पीकर उड़ जाऊंगी





यह वह समय था जब अंग्रेजी साहित्य का हिंदी पर गहरा प्रभाव पड़ रहा था। वस्तुत: हिंदी का सारा छायावादी साहित्य अंग्रेजी रोमेटिज्म से प्रभावित और प्रेरित था। इसी प्रभाव में सुमित्रानन्दन पंत ने यह कविता लिखी-

संध्या का झुटपुटबांसों का झुरमुट
थीं चहक रहीं चिड़ियां टी वी टी टुट टुट





ये पंक्तियां एक गंभीर कविता का अंश है। लेकिन सेवक जी ने चिड़ियों की इस अंग्रेजी बोली को स्पष्ट ही शिशु गीत में पिरोया है।

पूर्व स्वतंत्रता युग ने यदि हिंदी शिशु बाल गीतों के लिए एक सुदृढ़ आधार तैयार किया तो स्वतंत्रता के बाद के युग में ऐसे गीतों के लिए एक अच्छी और मजबूत इमारत बनी। इस युग के कवियों में दामोदर अग्रवाल, शेर जंग गर्ग, बाल स्वरूप राही, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, योगेन्द्र कुमार लल्ला, सूर्य कुमार पांडे, शंकुतला सिरोठिया आदि नाम सम्मान से लिए जा सकते हैं।
सेवक जी के बाद शिशु गीतों को और भी अधिक ऊंचाई पर ले जाने वालों में शेर जंग गर्ग का नाम सर्वोच्च शिखर पर है। बाल-मन को लुभाने वाले उनके नटखट और चुटीले गीत बहुत ही प्यारे बन पड़े है
कितनी अच्छी कितनी प्यारीसब दुनिया से न्यारी गाय
सारा दूध हमें दे देतीआओ इसे पिलाएं चाय
अथवा
गुड़िया है आफत की पुड़ियाबोले हिंदी कन्नड़ उड़िया।
नानी के संग भी खेली थीकिंतु अभी तक हुई न बुढ़िया॥
इन गीतों में जहां बच्चों के लिए मनोरंजन है, वहीं एक खिलंदडेपन के साथ विचार को प्रेरित करने वाले तत्व भी हैं। यही बात हमें दामोदर अग्रवाल के बाल-गीतों में भी दिखाई देती है। उन्होंने प्रकृति के कई रंग-बिरंगे चित्र तो खींचे ही हैं
कुछ रंग भरे फूलकुछ खट्टे मीठे फलथोड़ी बांसुरी की धुनथोड़ा जामुन का जल- परंतु उनके गीतों में कहीं न कहीं विचार भी समाहित है।
सड़क पर मिले जो मुझे एक पैसा
मैं झट से उसे अपनी मुट्ठी में ले लूं
मैं झट से उसे अपने भाई को दे दूं
मैं झट सेउसे अपनी मां को दिखाऊं
मैं सबको चलूं ले के मेला दिखाऊं
मैं राजा बनूं और हाथी पे घूमूं
मैं वो पैसा पूरा का पूरा लूटा दूं
मैं पैसा लुटाकर गरीबी मिटा दूं
योगेन्द्र कमार लल्ला और सूर्य कुमार पांडे के शिशु-गीत भी उल्लेखनीय हैं। उन्हें बिना किसी विवाद के श्रेष्ठ गीतों में रखा जा सकता है। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना एक बड़े कवि हैं। लेकिन बाल मन में उनकी पैठ देखते ही बनती है। उनकी प्रसिद्ध कविता-इब्नबतूतापहन के जूता-हमारा ध्यान तो खींचती ही है, बच्चों के दिल को भी आकर्षित करती है। हाल ही में इसकी प्रथम पंक्ति को टेक बनाकर एक फिल्मी गाना काफी चर्चा में रहा और गीतकार गुलजार पर आरोप लगाए गए। पर मुद्दे की बात यह है कि गुलजार जैसे कवि भी इस गीत के आकर्षण से बच नहीं पाए। सर्वेश्वर जी का पूरा गीत इस प्रकार है
इब्नबतूता पहन के जूता निकल पड़े तूफान में
थोड़ी हवा नाक में घुस गई
थोड़ी घुस गई कान में
कभी नाक को कभी कान को
मलते इब्नेबतूता
इसी बीच में निकल पड़ा
उनके पैरों का जूता
उड़ते-उड़ते जूता उनका
जा पहुंचा जापान में
इब्नबतूता खड़े रह गए मोची की दुकान में।

यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि हिन्दी जगत में कोई भी कवि अपने को बाल कवि के रूप में स्थापित करने के लिए उत्सुक नहीं हैं। बड़े-बड़े कवियों ने तमाम अच्छे शिशु और बाल गीत लिखे हैं। बाल साहित्य रचा है। कुछ ने तो अपना लेखन ही बाल साहित्य से आरंभ किया है। लेकिन आगे चलकर वे प्रौढ़ साहित्य की ओर प्रवृत्त हो गए। बाल साहित्य उनके लिए गौण हो गया। यह ध्यातव्य है कि हिंदी के अनेक बड़े और प्रतिष्ठित कवियों ने बाल साहित्य की रचना की। उनमें मुंशी प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, निराला, सुमित्रानंदन पंत, सुभद्राकुमारी चौहान, मैथिलीशरण गुप्त, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना आदि साहित्यकारों का नाम लिया जा सकता है। किंतु क्योंकि हिंदी में बाल साहित्य हमेशा ही दोयम दर्जे का साहित्य माना गया अत: बड़े साहित्यकार इससे विमुख हो गए। आज जरूरत है कि प्रतिभा संपन्न साहित्यकार बाल लेखन की ओर प्रवृत्त हों और अपने को बाल साहित्यकार कहलाने में गौरवान्वित महसूस करें।

-डा. सुरेन्द्र वर्मा
10 एचआईजी-1, 29 कलर रोड, इलाहाबाद-11001

(साभार: लोक गंगा)

Thursday, 18 October 2012

सोन मछरिया

ताल में जी ताल में
 सोनमछरिया ताल में.
मछुआरे ने मंतर फूंका
जाल गया पाताल में

थर-थर कांप ताल का पानी
फंसी जाल में मछली रानी,
तड़प-तड़प कर सोनमछरिया
मछुआरे से बोली भैया-
मुझे निकालो, मुझे निकालो,
दम घुटता है जाल में.

जाल में जी जाल में
सोनमछरिया जाल में.

मछुआरे ने सोचा पल भर,
कहा- छोड़ दूं तुझे मैं अगर,
उठ जाएगा दाना-पानी,
क्या होगा फिर मछली रानी?'
मछली बोली रोती-रोती-
'मेरे पास पड़े कुछ मोती,
जल में छोड़ो, ले आऊँगी,
सारे तुमको दे जाऊंगी.'

मछुआरे को बात जंच गई,
बस मछली की जान बच गई,
मछुआरे को मोती दे कर
जल में फुदकी जल की रानी.
सोनमछरिया-मछुआरे की
खत्म हुई इस तरह कहानी.
 
C-H2/1002 Classic Residency, Rajnagar Extension, NH-58, Ghaziabad-201003,

Tuesday, 16 October 2012

'नवरात्र' पर 'नव-सृजन' की ओर हों तत्पर..

 
!! नवरात्र पर नव-सृजन की ओर तत्पर हों !!
***नवरात्र की हार्दिक शुभकामनायें ***

Tuesday, 5 June 2012

पर्यावरण सुरक्षित तो जीवन सुरक्षित

पर्यावरण सुरक्षित तो जीवन सुरक्षित
(विश्व पर्यावरण दिवस पर)

Sunday, 13 May 2012

माँ - दीनदयाल शर्मा


माँ तू आंगन मैं किलकारी,
माँ ममता की तुम फुलवारी।
सब पर छिड़के जान,
माँ तू बहुत महान।।

दुनिया का दरसन करवाया,
कैसे बात करें बतलाया।

दिया गुरु का ज्ञान,
माँ तू बहुत महान।।

मैं तेरी काया का टुकड़ा,
मुझको तेरा भाता मुखड़ा।
दिया है जीवनदान,
माँ तू बहुत महान।।

कैसे तेरा कर्ज चुकाऊं,
मैं तो अपना फर्ज निभाऊं।
तुझ पर मैं कुर्बान,
माँ तू बहुत महान।।

-दीनदयाल शर्मा,

10/22 आर.एच.बी. कॉलोनी,
हनुमानगढ़ जंक्शन-335512
राजस्थान, भारत

Monday, 7 May 2012

पूर्व राज्यपाल डा. भीष्म नारायण सिंह ने किया कृष्ण कुमार-आकांक्षा यादव के बाल-गीत संग्रहों का विमोचन



युगल दंपत्ति एवं चर्चित साहित्यकार व ब्लागर कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव के बाल-गीत संग्रह 'जंगल में क्रिकेट' एवं 'चाँद पर पानी' का विमोचन पूर्व राज्यपाल डा. भीष्म नारायण सिंह और डा. रत्नाकर पाण्डेय (पूर्व सांसद) ने राष्ट्रभाषा स्वाभिमान न्यास एवं भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद्, नई दिल्ली द्वारा गाँधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में 27 अप्रैल, 2012 को किया. उद्योग नगर प्रकाशन, गाजियाबाद द्वारा प्रकाशित इन दोनों बाल-गीत संग्रहों में कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव के 30 -30 बाल-गीत संगृहीत हैं.


इस अवसर पर दोनों संग्रहों का विमोचन करते हुए अपने उद्बोधन में पूर्व राज्यपाल डा. भीष्म नारायण सिंह ने युगल दम्पति की हिंदी साहित्य के प्रति समर्पण की सराहना की. उन्होंने कहा कि बाल-साहित्य बच्चों में स्वस्थ संस्कार रोपता है, अत: इसे बढ़ावा दिए जाने क़ी जरुरत है. पूर्व सांसद डा. रत्नाकर पाण्डेय ने युवा पीढ़ी में साहित्य के प्रति बढती अरुचि पर चिंता जताते हुए कहा कि, यह प्रसन्नता का विषय है कि भारतीय डाक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी होते हुए भी श्री यादव अपनी जड़ों को नहीं भूले हैं और यह बात उनकी कविताओं में भी झलकती है. युगल दम्पति के बाल-गीत संग्रह क़ी प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें आज का बचपन है और बीते कल का भी और यही बात इन संग्रह को महत्वपूर्ण बनाती है.


कार्यक्रम में राष्ट्रभाषा स्वाभिमान न्यास के संयोजक डा. उमाशंकर मिश्र ने कहा कि यदि युगल दंपत्ति आज यहाँ उपस्थित रहते तो कार्यक्रम कि रौनक और भी बढ़ जाती. गौरतलब है कि अपनी पूर्व व्यस्तताओं के चलते यादव दंपत्ति इस कार्यक्रम में शरीक न हो सके. आभार ज्ञापन उद्योग नगर प्रकाशन के विकास मिश्र द्वारा किया गया. इस कार्यक्रम में तमाम साहित्यकार, बुद्धिजीवी, पत्रकार इत्यादि उपस्थित थे.

- रत्नेश कुमार मौर्या
संयोजक- 'शब्द-साहित्य'
म्योराबाद, इलाहाबाद.
mauryark@indiatimes.com
http://shabdasahitya.blogspot.in/

Sunday, 25 March 2012

सब हैप्पी बर्थ-डे गाओ..


जन्मदिन है पाखी का
खूब करो धमाल
जमके आज खाओ सब
हो जाओ लाल-लाल।

सब हैप्पी बर्थ-डे गाओ
मस्ती करो, मौज मनाओ
पाखी, तन्वी, कुहू, ख़ुशी
सब मिलकर बैलून फुलाओ।

आईसक्रीम और केक खाओ
कोई भी न मुँह फुलाओ
कितना प्यारा बर्थ-डे केक
सब हैप्पी बर्थ-डे गाओ।

Friday, 23 March 2012

भारतीय नववर्ष विक्रमी सम्वत 2069 पर हार्दिक शुभकामनायें


आप सभी को भारतीय नववर्ष विक्रमी सम्वत 2069 और चैत्री नवरात्रारंभ पर हार्दिक शुभकामनायें. आप सभी के लिए यह नववर्ष अत्यन्त सुखद हो, शुभ हो, मंगलकारी व कल्याणकारी हो, नित नूतन उँचाइयों की ओर ले जाने वाला हो !!


-आकांक्षा यादव

Sunday, 22 January 2012

बहादुर बच्चों के जज्बे को सलाम..!!

कहते हैं हौसले हों तो आकाश भी छू लेता है मनुष्य. फिर बच्चे तो इस देश के भविष्य हैं. उनका जज्बा हमें प्रेरणा देता है. ऐसे ही 24 बच्चों को इस साल राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार के लिए चुना गया है. देश के 24 बहादुर बच्चों में शामिल इन नौनिहालों ने अपनी छोटी सी उम्र में जिस साहस का परिचय दिया है, वह वाकई हैरत में डालने वाला और सराहनीय है। पुरस्कार पाने वाले बच्चों में 08 लड़कियां और 16 लड़के हैं। इनमें से पांच बच्चों को मरणोपरांत यह पुरस्कार दिया जाएगा।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह गणतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर इन बच्चों को राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित करेंगे। ये बहादुर बच्चों राजधानी के ऐतिहासिक राजपथ पर होने वाले गणतंत्र दिवस परेड में भी भाग लेंगे।

इस श्रेणी में बहादुरी का सर्वश्रेष्ठ ‘भारत पुरस्कार’ उत्तराखण्ड के 15 वर्षीय कपिल नेगी को मरणोपरांत दिया जाएगा। कपिल ने बाढ़ में फंसे अपने साथियों को निकालने में मदद की लेकिन इस प्रयास में कपिल की जान चली गई। पुत्र के खोने से भावुक हुईं कपिल की माता अनीता नेगी ने कहा, "वह सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनना चाहता था। हमें अपने पुत्र पर गर्व है लेकिन वह इस दुनिया में नहीं है।"


प्रतिष्ठित गीता चोपड़ा पुरस्कार गुजरात की 13 वर्षीया मित्तल महेन्द्रभाई पताडिया को दिया जाएगा। जिसने अपने अदम्य साहस का परिचय देते हुए हथियारबंद अपराधियों का सामना किया था और डकैती के प्रयास को विफल कर दिया था।

संजय चोपडा पुरस्कार के लिए उत्तर प्रदेश के 12वर्षीय ओम प्रकाश यादव को चयनित किया गया है। ओम प्रकाश ने अत्यंत साहस का परिचय देते हुए जलती हुई वैन से अपने आठ स्कूली साथियों की जान बचाई थी और ऐसा करने के दौरान वह 70 प्रतिशत तक जल गए थे। ओम प्रकाश यादव ने कहा, "मैं काफी गर्व का अनुभव करता हूं क्योंकि मैंने अपने स्कूल के साथियों का जीवन बचाया। मैं प्रधानमंत्री के हाथों राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार पाने को लेकर काफी खुश हूं। मेरा संदेश है कि लोगों को एक-दूसरे की सहायता करनी चाहिए।"

अरुणाचल प्रदेश के 14 वर्षीय मास्टर आदित्य गोपाल (मरणोपरांत) दिल्ली के 14 वर्षीय मास्टर उमा शंकर और छत्तीसगढ़ की 15 वर्षीया अंजलि सिंह गौतम को बापू ग्यैधानी पुरस्कार के लिए चुना गया है। आदित्य गोपाल ने पानी में डूब रहे एक मित्र को बचाने के प्रयास में अपनी जान गंवा दी थी। मास्टर उमा शंकर ने बस दुर्घटना में घायल लोगों को अस्पताल पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. जबकि अंजलि ने अपने छोटे भाई को नक्सवादी हमले से बचाया था।

पुरस्कार पाने वाले अन्य बच्चों इस प्रकार हैं। मास्टर वाई अमर उदय किरण और मास्टर एस शिव प्रसाद (आंध्र प्रदेश), मास्टर रंजन प्रधान और कुमारी शीतल साध्वी सलुजा- (छत्तीसगढ़), कुमारी दिव्याबेन मनसंगभाई चौहान (गुजरात) मास्टर संदेश पी हेगडे और कुमारी सिंधुश्री बी.ए (कर्नाटक) मास्टर मोहम्मद निशाद वी पी. मास्टर अंसिफ सी के और मास्टर सहसाद के (केरल) मास्टर जॉनसन तुरंगबम एवं मास्टर क्षेत्रिमयम राकेश सिंह (मणिपुर) मास्टर सी ललदुहौमा "मरणोपरांत" (मिजोरम) कुमारी प्रशांत शांडिल्य (ओडीशा) मास्टर डुंगर सिंह (राजस्थान) मास्टर जी परमेश्वरन (तमिलनाडु) कुमारी लवली वर्मा "मरणोपरांत" उत्तर प्रदेश और कुमारी सौधिता बर्मन "मरणोपरांत" पश्चिम बंगाल।

उल्लेखनीय है कि वीरता पुरस्कार के लिए इन बहादुर बच्चों का चयन कई मंत्रालयों, गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) के प्रतिनिधियों और आईसीसीडबल्यू के सदस्यों ने किया है। गणतंत्र दिवस से पहले प्रधानमंत्री इन बहादुर बच्चों को रजत पदक, प्रमाणपत्र और नकद राशि देकर सम्मानित करेंगे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पिछले साल पुरस्कार राशि को बढ़ाने का वादा किया था और इस वर्ष दी जाने वाली राशि में तीन गुने की वृद्धि हुई है। अब तक राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित होने वाले बच्चों को सात से 10 हजार रुपये का नकद इनाम दिया जाता था लेकिन इस साल भारत अवार्ड के तहत पचास हजार, गीता चोपड़ा और संजय चोपड़ा अवार्ड के तहत चालीस हजार रूपये और बापू गैधानी अवार्ड के तहत बीस हजार रूपये प्रदान किये जायेंगें

पुरस्कार प्राप्त बच्चे गणतंत्र दिवस की परेड में भी हिस्सा लेंगे। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील पुरस्कार विजेता बच्चों के सम्मान में एक समारोह का आयोजन करेंगी।

--बाल दुनिया

Friday, 30 December 2011

नव वर्ष की शुभकामनाएं


..!!नव-वर्ष 2012 की आप सभी को अग्रिम शुभकामनाएं..!!

Sunday, 25 December 2011

क्रिसमस की कहानी...

क्रिसमस त्यौहार बड़ा अलबेला है. पूरी दुनिया में धूमधाम से मनाया जाने वाला क्रिसमस प्रभु ईसा मसीह या यीशु के जन्म की खुशी में हर साल 25 दिसंबर को मनाया जाने वाला पर्व है।यह ईसाइयों के सबसे महत्वपूर्ण त्यौहारों में से एक है। इस दिन को बड़ा दिन भी कहते हैं. दुनिया भर के अधिकतर देशों में यह 25 दिसम्बर को मनाया जाता है, पर नव वर्ष के आगमन तक क्रिसमस उत्सव का माहौल कायम रखता है. उत्सवी परंपरा के अनुसार क्रिसमस से 12 दिन के उत्सव क्रिसमसटाइड की भी शुरुआत होती है। एन्नो डोमिनी काल प्रणाली के आधार पर यीशु का जन्म, 7 से 2 ई.पू. के बीच हुआ था। विभिन्न देश इसे अपनी परम्परानुसार मानते हैं. जर्मनी तथा कुछ अन्य देशों में क्रिसमस की पूर्व संध्या यानि 24 दिसंबर को ही इससे जुड़े समारोह शुरु हो जाते हैं जबकि ब्रिटेन और अन्य राष्ट्रमंडल देशों में क्रिसमस से अगला दिन यानि 26 दिसंबर बॉक्सिंग डे के रूप में मनाया जाता है। कुछ कैथोलिक देशों में इसे सेंट स्टीफेंस डे या फीस्ट ऑफ़ सेंट स्टीफेंस भी कहते हैं। आर्मीनियाई अपोस्टोलिक चर्च 6 जनवरी को क्रिसमस मनाता है, वहीँ पूर्वी परंपरागत गिरिजा जो जुलियन कैलेंडर को मानता है वो जुलियन वेर्सिओं के अनुसार 25 दिसम्बर को क्रिसमस मनाता है, जो ज्यादा काम में आने वाले ग्रेगोरियन कैलेंडर में 7 जनवरी का दिन होता है क्योंकि इन दोनों कैलेंडरों में 13 दिनों का अन्तर होता है।

क्रिसमस शब्द का जन्म क्राईस्टेस माइसे अथवा ‘क्राइस्टस् मास’ शब्द से हुआ है। ऐसी मान्यता है कि पहला क्रिसमस रोम में 336 ई. में मनाया गया था। क्राइस्ट के जन्म के संबंध में नए टेस्टामेंट के अनुसार व्यापक रूप से स्वीकार्य ईसाई पौराणिक कथा है। इस कथा के अनुसार प्रभु ने मैरी नामक एक कुंवारी लड़की के पास गैब्रियल नामक देवदूत भेजा। गैब्रियल ने मैरी को बताया कि वह प्रभु के पुत्र को जन्म देगी तथा बच्चे का नाम जीसस रखा जाएगा। वह बड़ा होकर राजा बनेगा, तथा उसके राज्य की कोई सीमाएं नहीं होंगी। देवदूत गैब्रियल, जोसफ के पास भी गया और उसे बताया कि मैरी एक बच्चे को जन्म देगी, और उसे सलाह दी कि वह मैरी की देखभाल करे व उसका परित्याग न करे। जिस रात को जीसस का जन्म हुआ, उस समय लागू नियमों के अनुसार अपने नाम पंजीकृत कराने के लिए मैरी और जोसफ बेथलेहेम जाने के लिए रास्ते में थे। उन्होंने एक अस्तबल में शरण ली, जहां मैरी ने आधी रात को जीसस को जन्म दिया तथा उसे एक नांद में लिटा दिया। इस प्रकार प्रभु के पुत्र जीसस का जन्म हुआ।

आजकल क्रिसमस पर्व धर्म की बंदिशों से परे पूरी दुनिया में बड़े उल्लास के साथ मनाया जाता है. क्रिसमस के दौरान एक दूसरे को आत्मीयता के साथ उपहार देना, चर्च में समारोह, और विभिन्न सजावट करना शामिल है। सजावट के दौरान क्रिसमस ट्री, रंग बिरंगी रोशनियाँ, बंडा, जन्म के झाँकी और हॉली आदि शामिल हैं। क्रिसमस ट्री तो अपने वैभव के लिए पूरे विश्व में लोकप्रिय है। लोग अपने घरों को पेड़ों से सजाते हैं तथा हर कोने में मिसलटों को टांगते हैं। चर्च मास के बाद, लोग मित्रवत् रूप से एक दूसरे के घर जाते हैं तथा दावत करते हैं और एक दूसरे को शुभकामनाएं व उपहार देते हैं। वे शांति व भाईचारे का संदेश फैलाते हैं।

सेंट बेनेडिक्ट उर्फ सान्ता क्लाज़, क्रिसमस से जुड़ी एक लोकप्रिय पौराणिक परंतु कल्पित शख्सियत है, जिसे अक्सर क्रिसमस पर बच्चों के लिए तोहफे लाने के साथ जोड़ा जाता है. मूलत: यह लाल व सफेद ड्रेस पहने हुए, एक वृद्ध मोटा पौराणिक चरित्र है, जो रेन्डियर पर सवार होता है, तथा समारोहों में, विशेष कर बच्चों के लिए एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वह बच्चों को प्यार करता है तथा उनके लिए चाकलेट, उपहार व अन्य वांछित वस्तुएं लाता है, जिन्हें वह संभवत: रात के समय उनके जुराबों में रख देता है।

क्रिसमस पर्व पर आप सभी को बधाई और शुभकामनाएं !!

आकांक्षा यादव

Sunday, 18 December 2011

विश्व की सबसे छोटे कद की महिला : ज्योति

इनसे मिलिए..ये हैं ज्योति. यह भारतीय किशोरी अब विश्व की सबसे छोटे कद की महिला बन गई है। हिवरी नगर निवासी ज्योति ने विश्व की सबसे सबसे छोटे कद की महिला होने का खिताब हासिल किया है। ज्योति की लंबाई केवल 62 . 8 सेंटीमीटर या तकरीबन दो फुट एक इंच लंबी है। ज्योति की उम्र 18 साल हो गई है।


ज्योति ने अमेरिका की ब्रिजेट जार्डन का इस साल की शुरूआत में बना रिकार्ड तोडा। दो साल पहले भी ज्योति ने इस खिताब के लिए दावा किया था लेकिन उस समय वह 16 वर्ष की थी इसलिए उसे यह खिताब नहीं दिया गया। अब 18 साल की होने पर ज्योति को इस खिताब से नवाजा गया है।

Wednesday, 16 November 2011

सबसे कम उम्र में 'राष्ट्रीय बाल पुरस्कार' का कीर्तिमान अक्षिता (पाखी) के नाम

(बाल दिवस, 14 नवम्बर पर विज्ञान भवन, नई दिल्ली में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम में महिला और बाल विकास मंत्री माननीया कृष्णा तीरथ जी ने हमारी बिटिया अक्षिता (पाखी) को राष्ट्रीय बाल पुरस्कार-2011 से पुरस्कृत किया. अक्षिता इस पुरस्कार को प्राप्त करने वाली सबसे कम उम्र की प्रतिभा है.यही नहीं यह प्रथम अवसर था, जब किसी प्रतिभा को सरकारी स्तर पर हिंदी ब्लागिंग के लिए पुरस्कृत-सम्मानित किया गया.प्रस्तुत है इस पर एक रिपोर्ट-





आज के आधुनिक दौर में बच्चों का सृजनात्मक दायरा बढ़ रहा है. वे न सिर्फ देश के भविष्य हैं, बल्कि हमारे देश के विकास और समृद्धि के संवाहक भी. जीवन के हर क्षेत्र में वे अपनी प्रतिभा का डंका बजा रहे हैं. बेटों के साथ-साथ बेटियाँ भी जीवन की हर ऊँचाइयों को छू रही हैं. ऐसे में वर्ष 1996 से हर वर्ष शिक्षा, संस्कृति, कला, खेल-कूद तथा संगीत आदि के क्षेत्रों में उत्कृष्ट उपलब्धि हासिल करने वाले बच्चों हेतु हेतु महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 'राष्ट्रीय बाल पुरस्कार' आरम्भ किये गए हैं। चार वर्ष से पन्द्रह वर्ष की आयु-वर्ग के बच्चे इस पुरस्कार को प्राप्त करने के पात्र हैं.

वर्ष 2011 के लिए 'राष्ट्रीय बाल पुरस्कार' 14 नवम्बर 2011 को विज्ञानं भवन, नई दिल्ली में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम में भारत सरकार की महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती कृष्णा तीरथ द्वारा प्रदान किये गए. विभिन्न राज्यों से चयनित कुल 27 बच्चों को ये पुरस्कार दिए गए, जिनमें मात्र 4 साल 8 माह की आयु में सबसे कम उम्र में पुरस्कार प्राप्त कर अक्षिता (पाखी) ने एक कीर्तिमान स्थापित किया. गौरतलब है कि इन 27 प्रतिभाओं में से 13 लडकियाँ चुनी गई हैं. सम्प्रति अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में भारतीय डाक सेवा के निदेशक और चर्चित लेखक, साहित्यकार, व ब्लागर कृष्ण कुमार यादव एवं लेखिका व ब्लागर आकांक्षा यादव की सुपुत्री और पोर्टब्लेयर में कारमेल सीनियर सेकेंडरी स्कूल में के. जी.- प्रथम की छात्रा अक्षिता (पाखी) को यह पुरस्कार कला और ब्लागिंग के क्षेत्र में उसकी विलक्षण उपलब्धि के लिए दिया गया है. इस अवसर पर जारी बुक आफ रिकार्ड्स के अनुसार- ''25 मार्च, 2007 को जन्मी अक्षिता में रचनात्मकता कूट-कूट कर भरी हुई है। ड्राइंग, संगीत, यात्रा इत्यादि से सम्बंधित उनकी गतिविधियाँ उनके ब्लाॅग ’पाखी की दुनिया (http://pakhi-akshita.blogspot.com/) पर उपलब्ध हैं, जो 24 जून, 2009 को आरंभ हुआ था। इस पर उन्हें अकल्पनीय प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुईं। 175 से अधिक ब्लाॅगर इससे जुडे़ हैं। इनके ब्लाॅग 70 देशों के 27000 से अधिक लोगों द्वारा देखे गए हैं। अक्षिता ने नई दिल्ली में अप्रैल, 2011 में हुए अंतर्राष्ट्रीय ब्लाॅगर सम्मेलन में 2010 का ’हिंदी साहित्य निकेतन परिकल्पना का सर्वोत्कृष्ट पुरस्कार’ भी जीता है।इतनी कम उम्र में अक्षिता के एक कलाकार एवं एक ब्लाॅगर के रूप में असाधारण प्रदर्शन ने उन्हें उत्कृष्ट उपलब्धि हेतु 'राष्ट्रीय बाल पुरस्कार, 2011' दिलाया।''इसके तहत अक्षिता को भारत सरकार की महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती कृष्णा तीरथ द्वारा 10,000 रूपये नकद राशि, एक मेडल और प्रमाण-पत्र प्रदान किया गया.

यही नहीं यह प्रथम अवसर था, जब किसी प्रतिभा को सरकारी स्तर पर हिंदी ब्लागिंग के लिए पुरस्कृत-सम्मानित किया गया. अक्षिता का ब्लॉग 'पाखी की दुनिया' (www.pakhi-akshita.blogspot.com/) हिंदी के चर्चित ब्लॉग में से है और इस ब्लॉग का सञ्चालन उनके माता-पिता द्वारा किया जाता है, पर इस पर जिस रूप में अक्षिता द्वारा बनाये चित्र, पेंटिंग्स, फोटोग्राफ और अक्षिता की बातों को प्रस्तुत किया जाता है, वह इस ब्लॉग को रोचक बनता है.

नन्हीं बिटिया अक्षिता (पाखी) को इस गौरवमयी उपलब्धि पर ढेरों प्यार और शुभाशीष व बधाइयाँ !!
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मंत्री जी भी अक्षिता (पाखी) के प्रति अपना प्यार और स्नेह न छुपा सकीं, कुछ चित्रमय झलकियाँ....
















Wednesday, 9 November 2011

'बाल-दिवस' पर नन्हीं ब्लागर अक्षिता (पाखी) को राष्ट्रीय बाल पुरस्कार


प्रतिभा उम्र की मोहताज नहीं होती. तभी तो पाँच वर्षीया नन्हीं ब्लागर अक्षिता (पाखी) को वर्ष 2011 हेतु राष्ट्रीय बाल पुरस्कार (National Child Award) के लिए चयनित किया गया है. सम्प्रति अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में भारतीय डाक सेवा के निदेशक और चर्चित लेखक, साहित्यकार, व ब्लागर कृष्ण कुमार यादव एवं लेखिका व ब्लागर आकांक्षा यादव की सुपुत्री अक्षिता को यह पुरस्कार 'कला और ब्लागिंग' (Excellence in the Field of Art and Blogging) के क्षेत्र में शानदार उपलब्धि के लिए बाल दिवस, 14 नवम्बर 2011 को विज्ञानं भवन, नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में भारत सरकार की महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती कृष्णा तीर्थ जी द्वारा प्रदान किया जायेगा. इसके तहत अक्षिता को 10,000 रूपये नकद राशि, एक मेडल और प्रमाण-पत्र दिया जायेगा.

यह प्रथम अवसर होगा, जब किसी प्रतिभा को सरकारी स्तर पर हिंदी ब्लागिंग के लिए पुरस्कृत-सम्मानित किया जायेगा. अक्षिता का ब्लॉग 'पाखी की दुनिया' (www.pakhi-akshita.blogspot.com/) हिंदी के चर्चित ब्लॉग में से है. फ़िलहाल अक्षिता पोर्टब्लेयर में कारमेल सीनियर सेकेंडरी स्कूल में के. जी.- प्रथम की छात्रा हैं और उनके इस ब्लॉग का सञ्चालन उनके माता-पिता द्वारा किया जाता है, पर इस पर जिस रूप में अक्षिता द्वारा बनाये चित्र, पेंटिंग्स, फोटोग्राफ और अक्षिता की बातों को प्रस्तुत किया जाता है, वह इस ब्लॉग को रोचक बनता है.

नन्हीं ब्लागर अक्षिता (पाखी) को इस गौरवमयी उपलब्धि पर अनेकोंनेक शुभकामनायें और बधाइयाँ !!

- दुर्ग विजय सिंह 'दीप'
उपनिदेशक-आकाशवाणी (समाचार प्रभाग)
, आल इण्डिया रेडियो, पोर्टब्लेयर
अंडमान-निकोबार द्वीप समूह.

Wednesday, 2 November 2011

जय हो वीर जवानों की- डॉ० राष्ट्रबंधु

वीर जवानों की जय हो
भारतमाता की जय हो

जो कि सत्य के लिए अड़े
जो कि न्याय के लिए लड़े
भारत माँ की रक्षा में
प्राणदान के लिए बढ़े।
सत्कर्मों का संचय हो
भारतमाता की जय हो।

सर्दी में जो पड़े रहे
मोर्चे पर जो अड़े रहे
नेफा में कश्मीर में
ले बन्दूकें खड़े रहे
पराधीनता का क्षय हो
भारतमाता की जय हो।

उनसे सबकी आजादी
उनसे सबकी खुशहाली
राणा शिवा सुभाष वे
युग उनसे गौरवशाली
परंपरा यह अक्षय हो
भारतमाता की जय हो।


-डॉ० राष्ट्रबंधु
संपादक-बाल साहित्य समीक्षा
रामकृष्ण नगर, कानपुर (यू. पी.)

Wednesday, 26 October 2011

जंगल में दीवाली - कृष्ण कुमार यादव


जंगल में मनी दीवाली
चारों तरफ फैली खुशहाली
शेर ने पटाखे छुड़ाये
लोमड़ी ने दिये जलाये

बन्दर करता खूब धमाल
भालू नाचे अपनी चाल
हाथी सब खा गया मिठाई
गिलहरी ने रोनी सूरत बनाई

शेर गरजे पानी बरसे
होती हाथी की ढुंढ़ाई
तब तक लोमड़ी मिठाई लाई
मिल-बाँट कर सबने खाई।


कृष्ण कुमार यादव

Tuesday, 11 October 2011

चिड़िया रानी


ची- ची करती चिड़िया रानी,
बच्चों के संग रहती है,
खेल-कूद कर उनके संग,
दाना चुनकर लाती है,
कित्ती मेहनत करती देखो,
श्रम का पाठ पढ़ाती है,
शाम-सवेरे चिड़िया रानी,
नील गगन पर उड़ती है,
बच्चों, तुम भी ऐसे बन जाओ,
मेहनत करो, सफलता पाओ।।

-वृंदा गांधी

Saturday, 8 October 2011

माँ - दीनदयाल शर्मा


माँ तू आंगन मैं किलकारी,
माँ ममता की तुम फुलवारी।
सब पर छिड़के जान,
माँ तू बहुत महान।।

दुनिया का दरसन करवाया,
कैसे बात करें बतलाया।

दिया गुरु का ज्ञान,
माँ तू बहुत महान।।

मैं तेरी काया का टुकड़ा,
मुझको तेरा भाता मुखड़ा।
दिया है जीवनदान,
माँ तू बहुत महान।।

कैसे तेरा कर्ज चुकाऊं,
मैं तो अपना फर्ज निभाऊं।
तुझ पर मैं कुर्बान,
माँ तू बहुत महान।।

-दीनदयाल शर्मा,

10/22 आर.एच.बी. कॉलोनी,
हनुमानगढ़ जंक्शन-335512
राजस्थान, भारत

Thursday, 15 September 2011

हिंदी है यह हिंदी है...(कृष्ण कुमार यादव)


हिन्दी है यह हिन्दी है
राष्ट्र-भाल की बिन्दी है
भाषाओं की जान है
भारत का अरमान है।

अमर शहीदों ने अपनाया
अंग्रेजों को मार भगाया
बापू थे इसके पैरोकार
संविधान में मिला स्थान।

हम सबकी है यह अभिलाषा
हिन्दी बने राष्ट्र की भाषा
आओ सब गुणगान करें
सब मिलकर सम्मान करें।




Monday, 5 September 2011

शिक्षक दिवस पर हार्दिक बधाइयाँ


आज डा0 सर्वपल्ली राधाकृष्ण का जन्म-दिवस है. इस तिथि को शिक्षक-दिवस के रूप में मनाया जाता है. शिक्षक दिवस की आप सभी को हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनायें !!

Monday, 22 August 2011

भयो नन्द लाल


माचो गोकुल में है त्यौहार, भयो नन्द लाल
खुशिया छाई है अपरम्पार, भयो नन्द लाल

मात यशोदा का है दुलारा,
सबकी आँखों का है तारा
अपनों गोविन्द मदन गोपाल
......... भयो नन्द लाल

मात यशोदा झूम रही है
कृष्णा को वो चूम रही है
झूले पलना मदन गोपाल
......... भयो नन्द लाल

देख के उसकी भोली सुरतिया
बोल रही है सारी सखिया
कितनो सुंदर है मदन गोपाल
......... भयो नन्द लाल

!! कृष्ण जन्माष्टमी की आप सभी को शुभकामनायें !!

जनोक्ति : निर्भय जैन

Monday, 15 August 2011

तिरंगे की शान : कृष्ण कुमार यादव


तीन रंगों का प्यारा झण्डा
राष्ट्रीय ध्वज है कहलाता
केसरिया, सफेद और हरा
आन-बान से यह लहराता

चौबीस तीलियों से बना चक्र
प्रगति की राह है दिखाता
समृद्धि और विकास के सपने
ले ऊँचे नभ में सदा फहराता

अमर शहीदों की वीरता और
बलिदान की याद दिलाता
कैसे स्वयं को किया समर्पित
इसकी झलक दिखलाता

आओ हम यह खायें कसम
शान न होगी इसकी कम
वीरों के बलिदानों को
व्यर्थ न जानें देंगे हम।

कृष्ण कुमार यादव

Saturday, 13 August 2011

राखी का त्यौहार : कृष्ण कुमार यादव



राखी का त्यौहार अनोखा
भाई-बहन का प्यार अनोखा

आओ भैया, आओ भैया
जल्दी से तुम हाथ बढ़ाओ

रंग-बिरंगी राखी लायी
अपने हाथों में बंधवाओ

करूँ आरती, तिलक लगाऊँ
और मिठाई तुम्हें खिलाऊँ

जल्दी से दे दो उपहार
बहना का है यह त्यौहार

भैया मेरे भूल न जाना
रक्षा का कर्तव्य निभाना।