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Wednesday, 10 September 2014

है न अजूबा : अब डाक टिकट पर हो सकती है आपकी फोटो


डाक टिकट पर अभी तक आपने गांँधी, नेहरू या ऐसे ही किसी महान विभूति की फोटो देखी होगी। पर अब डाक टिकट पर आप की फोटो भी हो सकती है और ऐसा संभव है डाक विभाग की ’’माई स्टैम्प’’ सेवा के तहत। 


वाराणसी  में 6 सितम्बर, 2014 को माई स्टैम्प सेवा का उद्घाटन करते हुए इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएँ कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि फिलहाल उत्तर प्रदेश में यह सेवा लखनऊ, आगरा व फतेहपुर सीकरी में उपलब्ध है और अब वाराणसी में। उन्होंने कहा कि माई स्टैम्प की थीम फिलहाल आकर्षक पर्यटन स्थलों पर आधारित रखी गई है। माई स्टैम्प फिलहाल 10 थीम के साथ उपलब्ध है, जिनमें-ग्रीटिंग्स, ताजमहल, लालकिला, कुतुब मीनार, हवा महल, मैसूर पैलेस, फेयरी क्वीन, पोर्ट ब्लेयर द्वीप, अजन्ता की गुफाएँं एवं सेंट फ्रांसिस चर्च शामिल हैं। 

डाक निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि माई स्टैम्प सेवा का लाभ उठाने के लिए एक फार्म भरकर उसके साथ अपनी फोटो और रूपय 300/- जमा करने होते हैं। एक शीट में कुल 12 डाक-टिकटों के साथ फोटो लगाई जा सकती है। इसके लिए आप अपनी अच्छी तस्वीर डाक विभाग को दे सकते हैं, जो उसे स्कैन करके आपकी खूबसूरत डाक-टिकट बना देगा। श्री यादव ने कहा कि यदि कोई तत्काल भी फोटो खिंचवाना चाहे तो उसके लिए भी प्रबंध किया गया है। पाँंच रुपए के डाक-टिकट, जिस पर आपकी तस्वीर होगी, वह देशभर में कहीं भी भेजी जा सकती है। इस पर सिर्फ जीवित व्यक्तियों की ही तस्वीर लगाई जा सकती है। 



डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव ने इसके व्यावहारिक पहलुओं की ओर इंगित करते हुए कहा कि किसी को उपहार देने का इससे नायब तरीका शायद ही हो। इसके लिए जेब भी ज्यादा नहीं ढीली करनी पड़ेगी, मात्र 300 रूपये में 12 डाक-टिकटों के साथ आपकी खूबसूरत तस्वीर। अब आप इसे चाहें अपने परिवारजनों को दें, मित्रों को या फिर अपने किसी करीबी को। यही नहीं अपनी राशि के अनुरूप भी डाक-टिकट पसंद कर उस पर अपनी फोटो लगवा सकते हैं। आप किसी से बेशुमार प्यार करते हैं, तो इस प्यार को बेशुमार दिखाने का भी मौका है। 
         
माई स्टैम्प स्कीम के आरंभ के बारे में बताते हुए निदेशक डाक सेवाएँ कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि दुनिया के कुछेक देशों में माई स्टाम्प सुविधा पहले से ही लागू है, पर भारत में इसका प्रचलन नया है। वर्ष 2011 में नई दिल्ली में विश्व डाक टिकट प्रदर्शनी (12-18 फरवरी 2011) के आयोजन के दौरान इसे औपचारिक रूप से लांच किया गया। उसके बाद इसे अन्य प्रमुख शहरों में भी जारी किया गया और लोगों ने इसे हाथों-हाथ लिया। नतीजन देखते ही देखते हजारों लोगों ने डाक टिकटों के साथ अपनी तस्वीर लगाकर इसका लुत्फ उठाया। इसकी लोकप्रियता के मद्देनजर इसे अब वाराणसी में भी आरंभ किया जा रहा है।  





Monday, 8 September 2014

गणतंत्र दिवस-2015 पर डाक टिकट के रूप में जारी हो सकता है आपका बनाया चित्र

हर किसी की चाहत होती है कि उसका बनाया चित्र डाक टिकट पर एक धरोहर के रूप में अंकित हो। भारतीय डाक विभाग ऐसे लोगों के लिए एक सुनहरा मौका लेकर आया है, जहाँ डाक टिकट पर आप द्वारा बनाया मौलिक चित्र स्थान पा सकता है। 

इस संबंध में जानकारी देते हुए इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि आगामी गणतंत्र दिवस-2015 के लिए डाक विभाग ने ’स्वच्छ भारत’ थीम पर डाक टिकट डिजाइन प्रतियोगिता की घोषणा की है, जिसके तहत कोई भी भारतीय नागरिक इस विषय पर डाक टिकट व अन्य फिलेटेलिक सामग्री हेतु अपना मौलिक डिजाइन भेज सकता है। 

डाक निदेशक श्री यादव ने बताया कि यह डिजाइन इंक, वाटर व आयल कलर इत्यादि में हो सकती है, पर कम्प्यूटर प्रिन्टेंड/प्रिंट आउट की अनुमति नहीं होगी। डिजाइन के पीछे प्रतिभागी का नाम, उम्र, राष्ट्रीयता, पिन कोड के साथ आवासीय पता, फोन/मोबाइल नं0 व ई-मेल लिखा होना चाहिए। इसके साथ ही मौलिकता का एक घोषणपत्र भी संलग्न करना होगा। संबंधित प्रतिभागी स्पीड पोस्ट के माध्यम से 15 अक्टूबर 2014 तक अपनी प्रविष्टियाँ सहायक महानिदेशक (फिलेटली), कक्ष संख्या 108 (बी), डाक भवन, पार्लियामेंट स्ट्रीट, नई दिल्ली-110001 पर भेज सकते हैं। स्पीड पोस्ट लिफाफे के ऊपर ’’गणतंत्र दिवस 2015-डाक टिकट डिजायन प्रतियोगिता’’ अवश्य अंकित होना चाहिए।

डाक निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि डाक टिकट डिजाइन हेतु राष्ट्रीय स्तर पर क्रमशः 10,000, 6000 व 4000 रूपये का प्रथम, द्वितीय व तृतीय पुरस्कार भी दिया जायेगा।

Tuesday, 13 November 2012

इको फ्रेंडली दीपावली मनाएं

दीपावली व आतिशबाजी का गहरा नाता है। लक्ष्मी पूजन के बाद शगुन के रूप में फोड़े जाने वाले पटाखे अब हमारी ही मौत का सामान बनते जा रहे हैं। हवा में जहर घोलते ये पटाखे कई प्रकार की शारीरिक व मानसिक व्याधियों को जन्म दे रहे हैं।

पटाखों की धमक हमारे चेहरे पर जरूर मुस्कान लाती है, पर यह मुस्कान हमारी बर्बादी का पूर्वाभ्यास होती है। इसका आभास हमें उस वक्त नहीं होता जब हम पटाखों की रोशनी में खो जाते हैं।

आजकल के युवा पटाखे खरीदते समय उसकी तीखे शोर व प्रकाश पर ध्यान देते हैं। पटाखे के रूप में हम पैसों की बर्बादी व जान को जोखिम में डालने का पूरा-पूरा सामान खुशी-खुशी घर लाते हैं।  
* बीमारियों को खुला न्योता :- पटाखे जब जलते हैं और तेज धमाके के साथ फूटते हैं तो हममें से हर किसी के चेहरे पर मुस्कुराहट छा जाती है। उस वक्त हम भूल जाते हैं कि इन पटाखों के काले धुएँ व शोर का हमारे शरीर पर क्या दुष्प्रभाव पड़ेगा?

जब पटाखे जलते व फूटते हैं तो उससे वायु में सल्फर डाइआक्साइड व नाइट्रोजन डाइआक्साइड आदि गैसों की मात्रा बढ़ जाती है। ये हमारे शरीर के लिए नुकसानदेह होती हैं। पटाखों के धुएँ से अस्थमा व अन्य फेफड़ों संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

* पटाखों का शोर मत कहना वन्स मोर :- पटाखों की आवाज हमारी श्रवण शक्ति पर भी प्रभाव डालती है। इससे भविष्य में हमारी श्रवण शक्ति कमजोर हो सकती है।

आम दिनों में शोर का मानक स्तर दिन में 55 व रात में 45 डेसिबल के लगभग होता है परंतु दीपावल‍ी आते-आते यह 70 से 90 डेसिबल तक पहुँच जाता है। इतना अधिक शोर हमें बहरा करने के लिए पर्याप्त है।

* पटाखे, हादसों का पर्याय :-
कोई चीज हमें नुकसान पहुँचा सकती है। यह जानते हुए भी हम उसका उपयोग करते हैं। पटाखे हादसों का पर्याय हैं। हमारी थोड़ी-सी लापरवाही हमारे अमूल्य जीवन को बर्बाद कर सकती है। यह जानते हुए भी हम अपने शौक के खातिर हँसते-हँसते अपनी जान को दाँव पर लगाते हैं।
प्रतिवर्ष दीपावली पर कई लोग पटाखों से जल जाते हैं व कई अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं। अनार, रॉकेट, रस्सी बम आदि धमाकेदार पटाखों के शौकीनों के साथ तो ये हादसे होते ही हैं। उस विध्वंसकारी चीज को आखिर हम क्यों इस्तेमाल करते हैं, जो हमें केवल क्षणिक सुख देती है?

* इकोफ्रेंडली पटाखे बेहतर विकल्प :-
पटाखों के शौकीनों के लिए इस दीपावली पर बाजार में इकोफ्रेंडली पटाखे आए हैं, जिससे आपका पटाखे जलाने का शौक भी पूरा हो जाएगा और वो भी वायुमंडल को नुकसान पहुँचाए बगैर। अब आप ही बताएँ कि है ना यह फायदे का सौदा?

जिस परिवेश में हम रहते हैं, उसी को हम प्रदूषित करके अपनी जान के लिए खतरा मोल लेते हैं। पटाखे फोड़ना कोई बुरी बात नहीं है। दीपावली खुशियों का त्योहार है तो क्यों न हम इस दीपावली पर वायुमंडल को नुकसान पहुँचाए बगैर इकोफ्रेंडली पटाखों से अपने इस शौक को पूरा करें।

Friday, 1 April 2011

अप्रैल फूल दिवस कहाँ से आया...


अप्रैल फूल दिवस पश्चिमी देशों में हर साल पहली अप्रैल को मनाया जाता है. विकिपीडिया पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार कभी-कभी ऑल फूल्स डे के रूप में जाना जाने वाला यह दिन, 1 अप्रैल एक आधिकारिक छुट्टी का दिन नहीं है लेकिन इसे व्यापक रूप से एक ऐसे दिन के रूप में जाना और मनाया जाता है जब एक दूसरे के साथ व्यावाहारिक मजाक और सामान्य तौर पर मूर्खतापूर्ण हरकतें की जाती हैं. इस दिन दोस्तों, परिजनों, शिक्षकों, पड़ोसियों, सहकर्मियों आदि के साथ अनेक प्रकार की शरारतपूर्ण हरकतें और अन्य व्यावहारिक मजाक किए जाते हैं, जिनका उद्देश्य होता है बेवकूफ और अनाड़ी लोगों को शर्मिंदा करना.

पारंपरिक तौर पर कुछ देशों जैसे न्यूजीलैंड, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका में इस तरह के मजाक केवल दोपहर तक ही किये जाते हैं, और अगर कोई दोपहर के बाद किसी तरह की कोशिश करता है तो उसे "अप्रैल फूल" कहा जाता है. ऐसा इसीलिये किया जाता है क्योंकि ब्रिटेन के अखबार जो अप्रैल फूल पर मुख्य पृष्ठ निकालते हैं वे ऐसा सिर्फ पहले (सुबह के) एडिशन के लिए ही करते हैं. इसके अलावा फ्रांस, आयरलैंड, इटली, दक्षिण कोरिया, जापान रूस, नीदरलैंड, जर्मनी, ब्राजील, कनाडा और अमेरिका में जोक्स का सिलसिला दिन भर चलता रहता है. 1 अप्रैल और मूर्खता के बीच सबसे पहला दर्ज किया गया संबंध चॉसर के कैंटरबरी टेल्स (1392) में पाया जाता है.

रोम, मध्य यूरोप और हिंदू समुदाय में 20 मार्च से लेकर 5 अप्रैल तक नया साल मनाया जाता है। इस दौरान बसंत ऋतु होती है। जूनियल कैलेंडर ने एक अप्रैल से नया साल माना जोकि सन् 1582 तक मनाया गया। इसके बाद पोप ग्रेगी 13वें ने ग्रेगियन कैलेंडर बनाया। इसके अनुसार एक जनवरी को नया साल घोषित किया गया। कई देशों ने सन 1660 में ग्रेगीयन कैलेंडर स्वीकार कर लिया।

जर्मनी, दनिश और नार्वे में सन् 1700 और इंग्लैंड में 1759 में एक जनवरी को नए साल के रूप में स्वीकार किया गया। फ्रांस के लोगों को लगा की साल का पहला दिन बदलकर उन्हें मूर्ख बनाया गया है और पुराने कैलेंडर के नववर्ष को उन्होंने मूर्ख दिवस घोषित कर दिया।

अप्रैल फूल दिवस की एक बानगी देखें कि जीमेल (gmail) के 1 अप्रैल को लांच होने को एक मज़ाक समझा गया था, क्योंकि गूगल पारंपरिक तौर पर हर 1 अप्रैल को अप्रैल फूल्स डे के होक्स जारी करती है, और घोषित किया गया 1 जीबी का ऑनलाइन स्टोरेज उस समय मौजूदा ऑनलाइन ईमेल सेवा के लिए बहुत ही ज्यादा था .

अब तो पूरी दुनिया में ही अप्रैल-फूल का प्रचलन बढ़ चला है, सो भारत भी अछूता नहीं. हर कोई एक दिन पहले से ही तैयारी करने लगता है कि किसे-किसे मूर्ख बनाना है, और कैसे बनाना है.

फ़िलहाल अप्रैल फूल दिवस का लुत्फ़ उठायें, पर किसी कि भावनाएं आहत करने से बचें. बकौल हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. वीरेन्द्र यादव इस दिन हार्ट पेशेंट का खास ख्याल रखें। उन्होंने कहा कि कई बार गंभीर मजाक से भावनाओं के उतार-चढ़ाव के कारण कोरोनरी में अवरोध पैदा होता है। यदि कोरोनरी धमनियों में पहले से ही समस्या हो तो समस्या गंभीर हो जाती है। इस स्थिति में धमनियों के अंदर की चिकनी सतह खुरदरी हो जाती है। इससे वहां पर कोलेस्ट्रॉल सरीखा तत्व जमा होने लगता है। खून जमना शुरू हो जाता है। यह हृदय के लिए बहुत घातक साबित हो सकता है।किसी का मजाक उड़ाने की बजाय मजाक-मजाक में नई सीख सिखाएं तो इस दिन का भरपूर आनंद लिया जा सकता है.

Wednesday, 16 March 2011

कहाँ से आई पंचतंत्र की कहानियाँ : आकांक्षा यादव

पंचतंत्र की कहानियाँ तो सभी ने सुनी और पढ़ी होंगी। इससे जुड़ी तमाम कहानियाँ पशु, पक्षी, पेड़, प्रकृति तथा राजा-रानी को आधार बना कर रची गयी हैं। यह जानने की जिज्ञासा हर किसी के मन में अवश्य होगी कि आखिर इन पंचतंत्र की कहानियों की रचना कब, किसने और क्यों की? अब से लगभग 1800 वर्ष पूर्व हमारे देश में अमर शक्ति नामक यशस्वी राजा हुआ। इस राजा बहुशक्ति, उग्रशक्ति एवं मंदशक्ति नामक तीन पुत्र थे। तीनों बात-बात पर झगड़ते रहते थे। उनकी बुद्धिहीनता के कारण राजा बहुत ही चिन्तित रहता था। एक दिन उसने अपनी यह चिन्ता अपने दरबार में मौजूद सभासदों के समक्ष रखी और समस्या के निदान के लिए सभासदों से सुझाव मांगा। उसी दरबार में विष्णु दत्त शर्मा भी सभासद के रूप में मौजूद थे। उन्होंने राजा अमर शक्ति से निवेदन किया कि यदि उन्हें समय दिया जाए तो वे राजकाज की चिन्ता दूर करने के लिए अपनी कुशाग्र बुद्धि एवं कौशल से राजा के तीनों पुत्रों में सुधार ला सकते हे। इसके लिए वे तीनों राजकुमारों को अपने सानिध्य में रखकर उनमें समझदारी विकसित करेंगे एवं उन्हें खुले वातावरण में रख कर छोटी-बड़ी अच्छाई-बुराई, नफा-नुकसान से उन्हें अवगत करा कर उनमें बुद्धि का विकास कर एक कुशाग्र एवं प्रबुद्ध राजकुमारों के गुण विकसित करने का पूरा प्रयत्न करेंगे।

राजा अमर शक्ति को विष्णुदत्त शर्मा का सुझाव बेहद पसंद आया। उन्होंने अपने तीनों पुत्रों को विष्णुदत्त शर्मा के सानिध्य में भेज दिया। विष्णु दत्त ने छोटी-छोटी किन्तु प्रभावकारी कथाएं बना-बना कर राजा के तीनों पुत्रों को सुनाना प्रारम्भ किया। उनकी प्रेरणादायक कहानियों का राजकुमारों पर ऐसा प्रभाव हुआ कि छह महीने के अंतराल में ही उनकी बुद्धिहीनता उड़न छू हो गयी और वे समझदार राजकुमारों की तरह परस्पर बर्ताव व व्यवहार करने लग गये। विष्णुदत्त शर्मा द्वारा राजकुमारों को सुधारने के लिए बना-बनाकर जो कहानियां सुनायी गयी थीं, वही पंचतंत्र की कहानियों के रूप में आगे चल कर प्रसिद्ध र्हुइं। आज भी ये कहानियाँ भारतीय समाज में बड़े चाव से सुनी और बुनी जाती हैं।

आकांक्षा यादव

Tuesday, 8 March 2011

101 साल का हो गया अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस


अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की शुरूआत 1900 के आरंभ में हुई थी। वर्ष 1908 में न्यूयार्क की एक कपड़ा मिल में काम करने वाली करीब 15 हजार महिलाओं ने काम के घंटे कम करने, बेहतर तनख्वाह और वोट का अधिकार देने के लिए प्रदर्शन किया था। इसी क्रम में 1909 में अमेरिका की ही सोशलिस्ट पार्टी ने पहली बार ''नेशनल वुमन-डे'' मनाया था। वर्ष 1910 में डेनमार्क के कोपेनहेगन में कामकाजी महिलाओं की अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस हुई जिसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महिला दिवस मनाने का फैसला किया गया और 1911 में पहली बार 19 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया। इसे सशक्तिकरण का रूप देने हेतु ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, जर्मनी और स्विट्जरलैंड में लाखों महिलाओं ने रैलियों में हिस्सा लिया. बाद में वर्ष 1913 में महिला दिवस की तारीख 8 मार्च कर दी गई। तब से हर 8 मार्च को विश्व भर में महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है.इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के 101 साल पूरे हो गए. अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर आप सभी को शुभकामनायें !!

Tuesday, 8 February 2011

वीणावादिनी सरस्वती की पूजा का भी दिन है वसंत पंचमी


वसंत पंचमी एक ओर जहां ऋतुराज के आगमन का दिन है, वहीं यह विद्या की देवी और वीणावादिनी सरस्वती की पूजा का भी दिन है। इस ऋतु में मन में उल्लास और मस्ती छा जाती है और उमंग भर देने वाले कई तरह के परिवर्तन देखने को मिलते हैं। वसंत पंचमी के दिन कोई भी नया काम प्रारम्भ करना शुभ माना जाता है। इसी कारण ऋषियों ने वसन्त पंचमी के दिन सरस्वती पूजा की प्रथा चली आ रही है। किसी भी कला और संगीत कि शिक्षा प्रारम्भ करने से पूर्व माता सरस्वती का पूजन करना शुभ होता है।

जो छात्र मेहनत के साथ माता सरस्वती की आराधना करते है। उन्हें ज्ञान के साथ साथ सम्मान की प्राप्ति भी होती है। वसंत पंचमी के दिन सबसे पहले श्री गणेश का पूजन किया जाता है। श्री गणेश के बाद मां सरस्वती का पूजन किया जाता है। शिक्षा, चतुरता के ऊपर विवेक का अंकुश लगाती है।वसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती के भोग में विशेष रूप से चावल का भोग लगाया जाता है। इसका कारण यह है कि मां सरस्वती को श्वेत रंग बहुत प्रिय है साथ ही चावल को सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि चावल का भोग लगाने से घर के सभी सदस्यों को मां सरस्वती के आर्शीवाद के साथ सकारात्मक बुद्धि की भी प्राप्ति होती है।

इससे शरद ऋतु की विदाई के साथ ही पेड़-पौधों और प्राणियों में नवजीवन का संचार होता है। प्रकृति नख से शिख तक सजी नजर आती है और तितलियां तथा भंवरे फूलों पर मंडराकर मस्ती का गुंजन गान करते दिखाई देते हैं। इस दिन पीले रंग के कपड़े पहनने का चलन है, क्योंकि वसंत में सरसों पर आने वाले पीले फूलों से समूची धरती पीली नजर आती है।

वसंत पंचमी की आप सभी को बधाइयाँ !!




Thursday, 20 January 2011

देश की शान बने ये वीर बच्चे...

हर साल की तरह इस साल भी गणतंत्र दिवस के मौके पर 23 बच्चों को उनकी वीरता और अदभूत साहस के लिए बहादुरी पुरस्कार से नवाजा जाएगा। इन बच्चों ने अपनी जान जोखिम में डालकर दूसरों की जान बचाई है। गणतंत्र दिवस पर हर साल दिए जाने वाले राष्ट्रीय बाल वीरता पुरस्कार की घोषणा 17 जनवरी को को भारतीय बाल कल्याण परिषद में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में परिषद की अध्यक्ष गीता सिद्धार्थ ने की. इनमें से दो को यह पुरस्कार मरणोपरांत मिलेगा। पुरस्कार पाने वाले बच्चों में नौ लड़कियां व 14 लड़के हैं।

प्रतिष्ठित गीता चोपड़ा पुरस्कार केरल की 13 वर्षीय जिस्मी पीएम को पानी में डूबते दो बच्चों को बचाने के लिए मिलेगा। इसी तरह तेंदुए से अपनी बहन को बचाने के लिए उत्तराखंड के 11 वर्षीय प्रियांशु जोशी को संजय चोपड़ा पुरस्कार से नवाजा जाएगा।

राष्ट्रीय बाल वीरता पुरस्कार पाने वाले अन्य बच्चों में मेघालय के फ्रीडी नांगसिएज, छत्तीसगढ़ के राहुल र्कुे, महाराष्ट्र के रोहित मारुति मुलीक, राजस्थान के श्रवण कुमार, केरल के अनूप एम, मिजोरम की लालमोईजुआली, उत्तरप्रदेश के उत्तम कुमार, मणिपुर के नुरूल हुड्डा, असम की रेखामनी सोनोवल व कल्पना सोनोवाल, पंजाब के गुरजीवन सिंह, सिक्किम के विवेक शर्मा, केरल के राज नारायणन, मेघालय के लवलीस्टार के सोहफोह, छत्तीसगढ़ की पार्वती अमलेश व पश्चिम बंगाल की सुनीता मुरमु शामिल हैं। केरल के बापू गैधानी पुरस्कार अरुणाचल प्रदेश की इपी बसर (16 साल), केरल के विष्णु प्रसाद (16 साल) और मध्यप्रदेश के मुनीस खान (15 साल) को दिया जाएगा। इपी ने दो लोगों को आग से बचाया तो विष्णुदास ने दो बच्चों को डूबने से बचाया जबकि मुनीस खान ने एक वृद्ध व्यक्ति को रेल से कटने से बचाया। जिन दो बच्चों को मरणोपरांत यह पुरस्कार दिया जाएगा, वे हैं राजस्थान की चंपा कंवर और उत्तराखंड की श्रुति लोधी।

हर साल गणतंत्र दिवस से पहले एक विशेष समारोह में प्रधानमंत्री बच्चों को वीरता पुरस्कार प्रदान करते हैं और इस साल भी मनमोहन सिंह जी इसे प्रदान करेंगें. पुरस्कार पाने वाले सभी बच्चे गणतंत्र दिवस की परेड में हिस्सा लेंगे। पुरस्कार के तौर पर सभी बच्चों को पदक, प्रमाणपत्र व नकद राशि मिलेगी।

इन सभी बहादुर बच्चों को बधाई और शुभकामनायें कि वे जीवन में इसी तरह लोगों के प्रेरणा स्रोत बनें और देश का नाम रोशन करें !!

Saturday, 25 December 2010

क्रिसमस की कहानी...

क्रिसमस त्यौहार बड़ा अलबेला है. पूरी दुनिया में धूमधाम से मनाया जाने वाला क्रिसमस प्रभु ईसा मसीह या यीशु के जन्म की खुशी में हर साल 25 दिसंबर को मनाया जाने वाला पर्व है।यह ईसाइयों के सबसे महत्वपूर्ण त्यौहारों में से एक है। इस दिन को बड़ा दिन भी कहते हैं. दुनिया भर के अधिकतर देशों में यह 25 दिसम्बर को मनाया जाता है, पर नव वर्ष के आगमन तक क्रिसमस उत्सव का माहौल कायम रखता है. उत्सवी परंपरा के अनुसार क्रिसमस से 12 दिन के उत्सव क्रिसमसटाइड की भी शुरुआत होती है। एन्नो डोमिनी काल प्रणाली के आधार पर यीशु का जन्म, 7 से 2 ई.पू. के बीच हुआ था। विभिन्न देश इसे अपनी परम्परानुसार मानते हैं. जर्मनी तथा कुछ अन्य देशों में क्रिसमस की पूर्व संध्या यानि 24 दिसंबर को ही इससे जुड़े समारोह शुरु हो जाते हैं जबकि ब्रिटेन और अन्य राष्ट्रमंडल देशों में क्रिसमस से अगला दिन यानि 26 दिसंबर बॉक्सिंग डे के रूप में मनाया जाता है। कुछ कैथोलिक देशों में इसे सेंट स्टीफेंस डे या फीस्ट ऑफ़ सेंट स्टीफेंस भी कहते हैं। आर्मीनियाई अपोस्टोलिक चर्च 6 जनवरी को क्रिसमस मनाता है, वहीँ पूर्वी परंपरागत गिरिजा जो जुलियन कैलेंडर को मानता है वो जुलियन वेर्सिओं के अनुसार 25 दिसम्बर को क्रिसमस मनाता है, जो ज्यादा काम में आने वाले ग्रेगोरियन कैलेंडर में 7 जनवरी का दिन होता है क्योंकि इन दोनों कैलेंडरों में 13 दिनों का अन्तर होता है।

क्रिसमस शब्द का जन्म क्राईस्टेस माइसे अथवा ‘क्राइस्टस् मास’ शब्द से हुआ है। ऐसी मान्यता है कि पहला क्रिसमस रोम में 336 ई. में मनाया गया था। क्राइस्ट के जन्म के संबंध में नए टेस्टामेंट के अनुसार व्यापक रूप से स्वीकार्य ईसाई पौराणिक कथा है। इस कथा के अनुसार प्रभु ने मैरी नामक एक कुंवारी लड़की के पास गैब्रियल नामक देवदूत भेजा। गैब्रियल ने मैरी को बताया कि वह प्रभु के पुत्र को जन्म देगी तथा बच्चे का नाम जीसस रखा जाएगा। वह बड़ा होकर राजा बनेगा, तथा उसके राज्य की कोई सीमाएं नहीं होंगी। देवदूत गैब्रियल, जोसफ के पास भी गया और उसे बताया कि मैरी एक बच्चे को जन्म देगी, और उसे सलाह दी कि वह मैरी की देखभाल करे व उसका परित्याग न करे। जिस रात को जीसस का जन्म हुआ, उस समय लागू नियमों के अनुसार अपने नाम पंजीकृत कराने के लिए मैरी और जोसफ बेथलेहेम जाने के लिए रास्ते में थे। उन्होंने एक अस्तबल में शरण ली, जहां मैरी ने आधी रात को जीसस को जन्म दिया तथा उसे एक नांद में लिटा दिया। इस प्रकार प्रभु के पुत्र जीसस का जन्म हुआ।

आजकल क्रिसमस पर्व धर्म की बंदिशों से परे पूरी दुनिया में बड़े उल्लास के साथ मनाया जाता है. क्रिसमस के दौरान एक दूसरे को आत्मीयता के साथ उपहार देना, चर्च में समारोह, और विभिन्न सजावट करना शामिल है। सजावट के दौरान क्रिसमस ट्री, रंग बिरंगी रोशनियाँ, बंडा, जन्म के झाँकी और हॉली आदि शामिल हैं। क्रिसमस ट्री तो अपने वैभव के लिए पूरे विश्व में लोकप्रिय है। लोग अपने घरों को पेड़ों से सजाते हैं तथा हर कोने में मिसलटों को टांगते हैं। चर्च मास के बाद, लोग मित्रवत् रूप से एक दूसरे के घर जाते हैं तथा दावत करते हैं और एक दूसरे को शुभकामनाएं व उपहार देते हैं। वे शांति व भाईचारे का संदेश फैलाते हैं।

सेंट बेनेडिक्ट उर्फ सान्ता क्लाज़, क्रिसमस से जुड़ी एक लोकप्रिय पौराणिक परंतु कल्पित शख्सियत है, जिसे अक्सर क्रिसमस पर बच्चों के लिए तोहफे लाने के साथ जोड़ा जाता है. मूलत: यह लाल व सफेद ड्रेस पहने हुए, एक वृद्ध मोटा पौराणिक चरित्र है, जो रेन्डियर पर सवार होता है, तथा समारोहों में, विशेष कर बच्चों के लिए एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वह बच्चों को प्यार करता है तथा उनके लिए चाकलेट, उपहार व अन्य वांछित वस्तुएं लाता है, जिन्हें वह संभवत: रात के समय उनके जुराबों में रख देता है।

आकांक्षा यादव

Thursday, 25 November 2010

गुड़ियों का संसार : आकांक्षा यादव

गुड़िया भला किसे नहीं भाती। गुडिया को लेकर न जाने कितने गीत लिखे गए हैं. गुडिया के बिना बचपन अधूरा ही कहा जायेगा. खिलौने के रूप में प्रयुक्त गुड़िया लोगों को इतना भाने लगी कि इसके नाम पर बच्चों के नाम भी रखे जाने लगे. बचपन में अपने हाथों से बने गई गुड़िया किसे नहीं याद होगी. गुड्डे-गुड़िया का खेल और फिर उनकी शादी॥न जाने क्या-क्या मनभावन चीजें इससे जुडी थीं. लोग मेले में जाते तो गुड़िया जरुर खरीदकर लाते. रोते बच्चों को भी हँसा देती है प्यारी सी गुड़िया. अब तो बाजार में तरह-तरह की गुड़िया उपलब्ध हैं. गुड़िया की बकायदा ब्रांडिंग कर मार्केटिंग भी की जा रही है.

सर्वप्रथम गुड़िया बनाने का श्रेय इजिप्ट यानी मिश्रवासियों को जाता है। इजिप्ट में लगभग 2000 साल पहले धनी परिवारों में गुड़िया होती थीं। इनका प्रयोग पूजा के लिए व कुछ अलग प्रकार की गुड़िया का प्रयोग बच्चे खेलने के लिए करते थे। पहले इस पर फ्लैट लकड़ी को पेंट करके, उस पर डिजाइन किया जाता था। बालों को वुडन बीड्स या मिट्टी से बनाया जाता था। ग्रीस और रोम के बच्चे बड़े होने पर लकड़ी से बनी अपनी गुड़िया देवी को चढ़ा देते थे। उस समय हड्डियों से भी गुड़िया बनाई जाती थीं। ये आज की तुलना में बहुत साधारण होती थीं। कुछ समय बाद वैक्स से भी गुड़िया बनाई जाने लगीं। इसके बाद गुड़िया को रंग-बिरंगी ड्रेसेस पहनाई जाने लगीं। यूरोप भी एक समय में डाॅल्स हब था। वहाँ बड़ी मात्रा में गुड़िया बनाई जाती थीं।

17वीं-18वीं शताब्दी में वैक्स और वुड की बनी गुड़िया बहुत प्रचलित थीं। धीरे-धीरे इनमें सुधार होता रहा। 1850 से 1930 के बीच इंग्लैंड में गुड़िया के बनाने में एक और परिवर्तन किया गया। इनके सिर को वैक्स या मिट्टी से बनाकर प्लास्टर से इसको मोल्ड किया गया। सबसे पहले एक बेबी के रूप में गुड़िया को बनाने का श्रेय इंग्लैंड को जाता है। 19वीं शताब्दी में इस गुड़िया को भी वैक्स से बनाया गया था। 1880 में फ्रांस की बेबे नाम की गुड़िया तो खूब प्रसिद्द हुई थी। यही वह सुन्दर गुड़िया थी जिसको 1850 में बेबी के रूप में सबसे पहले बनाया गया था। इससे पहले की लगभग सभी गुड़िया बड़े लोगों के रूप में बने जाती थीं। लेकिन ये सभी गुड़िया काफी मँहगी थीं। जर्मनी ने बच्चों में गुड़िया का बढ़ता क्रेज देखकर सस्ती गुड़िया बनाने की शुरुआत की थी। मँहगी होने की वजह से अधिकतर माँ अपने बच्चे को काटन या लिनन के कपड़े से गुड़िया बनाकर देती थीं। 1850 में अमेरिकन कंपनियों ने इस प्रकार की गुड़िया बड़ी मात्रा में बनानी शुरू कर दीं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान गुड़िया बनाने के लिए प्लास्टिक का प्रयोग शुरू किया गया. 1940 में कठोर प्लास्टिक की गुड़िया बनाई जाने लगीं। 1950 में रबड़, फोम आदि की गुड़िया भी बनाई जाने लगीं। इसके बाद तो गुड़िया को न जाने कितने रंग-रूप में ढाला गया. बार्बी गुड़िया के प्रति बच्चों का क्रेज जगजाहिर है. अब भिन्न-भिन्न प्रकार की और भिन्न-भिन्न दामों में गुड़िया बाजार में आ गई हैं. बस जरुरत है उन्हें खरीदने और फिर गुड़िया तो जीवन का अंग ही हो जाती है.

कई लोग तो तरह-तरह की गुड़िया इकठ्ठा करने का भी शौक रखते हैं. गुड़िया के बकायदा संग्रहालय भी हैं. इनमें से एक शंकर अन्तर्राष्ट्रीय गुड़िया संग्रहालय नई दिल्ली में बहादुर शाह जफर मार्ग पर चिल्ड्रन बुक ट्रस्ट के भवन में स्थित है। इस संग्रहालय की स्थापना मशहूर कार्टूनिस्ट के. शंकर पिल्लई ने की थी। विभिन्न परिधानों में सजी गुड़ियों का यह संग्रह विश्व के सबसे बड़े संग्रहों में से एक है। 1000 गुड़ियों से आरंभ इस संग्रहालय में वर्तमान में लगभग 85 देशों की करीब 6500 गुडि़यों का संग्रह देखा जा सकता है। यहाँ एक हिस्से में यूरोपियन देशों, इंग्लैंड, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, राष्ट्र मंडल देशों की गुडि़याँ रखी गई हैं तो दूसरे भाग में एशियाई देशों, मध्यपूर्व, अफ्रीका और भारत की गुड़ियाँ प्रदर्शित की गई हैं। इन गुड़ियों को खूब सजाकर रखा गया है।

Friday, 19 November 2010

कैसी दिखती थीं रानी लक्ष्मीबाई

रानी लक्ष्मीबाई के नाम से भला कौन अपरिचित होगा. आज ही के दिन उनका जन्म हुआ था. पर क्या कभी आपने सोचा है कि वे दिखती कैसी रही होंगीं. तो चलिए इस बार आपको उनका एक दुर्लभ चित्र दिखाते हैं. झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का यह दुर्लभ फोटो 159 साल पहले अर्थात वर्ष 1850 में कोलकाता में रहने वाले अंग्रेज फोटोग्राफर जॉनस्टोन एंड हॉटमैन ने खींचा था। इस फोटो को 19 अगस्त, 2009 को भोपाल में आयोजित विश्व फोटोग्राफी प्रदर्शनी में प्रदर्शित किया गया था। यह चित्र अहमदाबाद के एक पुरातत्व महत्व की वस्तुओं के संग्रहकर्ता अमित अम्बालाल ने भेजा था। माना जाता है कि रानी लक्ष्मीबाई का यही एकमात्र फोटोग्राफ उपलब्ध है !!

Saturday, 16 October 2010

यूँ आरंभ हुआ विजयदशमी पर्व - कृष्ण कुमार यादव

कल दशहरा (विजयदशमी) पर्व है. यह पर्व भारतीय संस्कृति में सबसे ज्यादा बेसब्री के साथ इंतजार किये जाने वाला त्यौहार है। दशहरा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के शब्द संयोजन "दश" व "हरा" से हुयी है, जिसका अर्थ भगवान राम द्वारा रावण के दस सिरों को काटने व तत्पश्चात रावण की मृत्यु रूप में राक्षस राज के आंतक की समाप्ति से है। यही कारण है कि इस दिन को विजयदशमी अर्थात अन्याय पर न्याय की विजय के रूप में भी मनाया जाता है। दशहरे से पूर्व हर वर्ष शारदीय नवरात्र के समय मातृरूपिणी देवी नवधान्य सहित पृथ्वी पर अवतरित होती हैं- क्रमशः शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी व सिद्धिदात्री रूप में माँ दुर्गा की लगातार नौ दिनों तक पूजा होती है। ऐसी मान्यता है कि नवरात्र के अंतिम दिन भगवान राम ने चंडी पूजा के रूप में माँ दुर्गा की उपासना की थी और माँ ने उन्हें युद्ध में विजय का आशीर्वाद दिया था। इसके अगले ही दिन दशमी को भगवान राम ने रावण का अंत कर उस पर विजय पायी, तभी से शारदीय नवरात्र के बाद दशमी को विजयदशमी के रूप में मनाया जाता है और आज भी प्रतीकात्मक रूप में रावण-पुतला का दहन कर अन्याय पर न्याय के विजय की उद्घोषणा की जाती है.

दशहरे की परम्परा भगवान राम द्वारा त्रेतायुग में रावण के वध से भले ही आरम्भ हुई हो, पर द्वापरयुग में महाभारत का प्रसिद्ध युद्ध भी इसी दिन आरम्भ हुआ था। पर विजयदशमी सिर्फ इस बात का प्रतीक नहीं है कि अन्याय पर न्याय अथवा बुराई पर अच्छाई की विजय हुई थी बल्कि यह बुराई में भी अच्छाई ढूँढ़ने का दिन होता है।

आप सभी को विजयदशमी पर्व की ढेरों शुभकामनायें !!

Wednesday, 13 October 2010

नन्हे-मुन्नों की पैनी नज़र, भेदती धरती-आकाश की खबर

प्रतिभा उम्र की मोहताज नहीं होती. यदि उचित परिवेश मिले तो बच्चे भी बड़ों जैसा कार्य कर सकते हैं. झारखण्ड में जमदेशपुर के पास मुसाबनी इलाके के नन्हें पत्रकार आजकल चर्चा में हैं. यूनिसेफ के सहयोग से चल रहे कार्यक्रम में प्रकाशित ये बच्चे किसी से पीछे नहीं हैं. वे रिपोर्टिंग करते हैं, फोटोग्राफी करते हैं और कई बार अपने कार्यों से लोगों को सचेत/सजग भी करते हैं. इनके अख़बार हैं- संथाल दर्पण, टालाडीह खबर, हालधबनी टाइम्स...और भी ढेर सारे. इस पर एक विस्तृत रिपोर्ट आउटलुक पत्रिका के सितम्बर -2010 अंक में प्रकाशित हुई है. उसे यहाँ साभार स्कैन कर प्रकाशित किया जा रहा है-




(साभार : आउटलुक, सितम्बर 2010)

Saturday, 9 October 2010

लेटर बाक्स - कृष्ण कुमार यादव

आप सभी ने लेटर-बाक्स देखा होगा...लाल-लाल. अब तो हरे, पीले, नीले लेटर-बाक्स भी दिखने लगे हैं. ये लेटर बाक्स चिट्ठियों को एक जगह से दूजी जगह ले जाने के लिए आधार का कार्य करते हैं. इनके बिना तो पत्रों की दुनिया भी सूनी हो जाएगी. मोबाईल और नेट आ जाने के बाद दुनिया भर में व्यक्तिगत पत्रों की संख्या में कमी आई है, पर अपने देश में अभी भी हर दिन डाकिया 2 करोड़ डाक बाँटता है. सुनकर विश्वास नहीं होता न...पर यही सच है. आज तो 'विश्व डाक दिवस' भी है. इसी दिन विश्व डाक संघ का 1874 में गठन हुआ था. चलिए आज के दिन लेटर-बाक्स को लेकर एक बाल-कविता-



लाल रंग का लेटर बाक्स
पेट इसका खूब बड़ा
जाड़ा, गर्मी या बरसात
रहता है अडिग खड़ा

लाल, गुलाबी, हरे, नीले
पत्र जायें देश-विदेश
हर पत्र की है महत्ता
छुपा हुआ सबका संदेश।

खूब सारे पत्र आते
पेट में इसके समाते
सब पाकर अपना संदेशा
मन ही मन खुश हो जाते।

Monday, 20 September 2010

विलक्षण विशेषताओं को समेटे हुए क्वीन्स बैटन : कृष्ण कुमार यादव

भारत इस वर्ष 3 अक्टूबर से 19 वें राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन कर रहा है। परंपरानुसार इसकी शुरूआत 29 अक्तूबर, 2009 को बकिंघम पैलेस, लंदन में महारानी एलिजाबेथ द्वितीय द्वारा भारत की राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल को क्वीन्स बैटन हस्तांतरित करके हुई। इसके बाद ओलम्पिक एयर राइफल चैंपियन, अभिनव बिंद्रा ने क्वीन विक्टोरिया माॅन्युमेंट के चारों ओर रिले करते हुए क्वीन्स बैटन की यात्रा शुरू की। क्वीन्स बैटन सभी 71 राष्ट्रमंडल देशों में घूमने के बाद 25 जून, 2010 को पाकिस्तान से बाघा बार्डर द्वारा भारत में पहुँच गई और उसे पूरे देश में 100 दिनों तक घुमाया जाएगा। इस बीच यह जिस भी शहर से गुजर रही है, वहाँ इसका रंगारंग कार्यक्रमों द्वारा स्वागत किया जा रहा है। गौरतलब है कि आस्ट्रेलिया के बाद भारत दूसरा देश है, जहाँ इसके सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में बैटन रिले ले जाया जा रहा है.

गौरतलब है कि सन् 1958 से प्रत्येक काॅमनवेल्थ खेलों का अग्रदूत रही क्वीन्स बैटन रिले इन खेलों की सर्वश्रेष्ठ परंपराओं में एक है। वस्तुतः ’रिले’, खेल और संस्कृति के इस चार वर्षीय उत्सव में राष्ट्रमंडल देशों के एकजुट होने का प्रतीक है। विगत वर्षों में, क्वीन्स बैटन रिले राष्ट्रमंडल देशों की एकता एवं अनेकता के सशक्त प्रतीक के रूप में विकसित हुआ है। प्रत्येक खेल के साथ, पैमाने और महत्व की दृष्टि से इस परम्परा का विस्तार हो रहा है एवं इसमें और देश और प्रतिभागी शामिल हो रहे हैं। दिल्ली 2010 बैटन रिले यात्रा को अब तक की सबसे बड़ी रिले यात्रा माना जा रहा है। इस बैटन को माइकल फाॅली ने डिजाइन किया है, जो नेशनल इंस्टिट्यूट आॅफ डिजाइन के स्नातक हैं। यह बैटन तिकोने आकार का अल्युमिनियम से बना हुआ है, जिसे मोड़ कर कुण्डली का आकार दिया गया है। इसे भारत के सभी क्षेत्रों से एकत्र विभिन्न रंगों की मिट्टी के रंगों से रंगा गया है। क्वीन्स बैटन को रूप प्रदान करने में विभिन्न रंगों की मिट्टी का इस्तेमाल पहली बार किया गया है। रत्नजड़ित बक्से में ब्रिटेन के महारानी के संदेश को रखा गया है और इस संदेश को प्राचीन भारतीय पत्रों के प्रतीक 18 कैरट सोने की पŸाी में लेजर से मीनिएचर के रूप में उकेरा गया है ताकि इसे आसानी से प्रयोग किया जा सके। क्वीन्स बैटन की रूपरेखा अत्यंत परिश्रम से तैयार की गई है। इसकी उंचाई 664 मिलीमीटर है, निचले हिस्से में इसकी चैड़ाई 34 मिलीमीटर है और ऊपरी हिस्से में इसकी चैड़ाई 86 मिलीमीटर है। इसका वजन 1,900 ग्राम है।

क्वीन्स बैटन अपने अंदर बहुत सी विलक्ष्ण विशेषताओं को समेटे हुए है, जिससे इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। मसलन, इसमें चित्र खींचने और ध्वनि रिकार्ड करने की क्षमता है तो इसमें ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) टेक्नोलाॅजी भी मौजूद है जिससे बैटन के स्थान की स्थिति हरदम प्राप्त की जा सकती है। यही नहीं इसमें जड़े हुए लाइट एमिटिंग डायोड (एलईडी) द्वारा जिस देश में बैटन ह,ै उस देश के झंडे के रंग में परिवर्तित हो जाता है। इसके अलावा यह टेक्स्ट मैसेजिंग क्षमता से लैस है ताकि लोग बैटन वाहकों को समूचे रिले के दौरान बधाई एवं प्रेरणादायक संदेश भेज सकें। यह अब तक की सबसे लंबी तकनीकी रूप से विकसित बैटन रिले भी है। गौरतलब है कि भारतीय डाक विभाग ने भी काॅमनवेल्थ खेल 2010 के अग्रदूत के रूप में बैटन के भारत में पहुंचने के उपलक्ष्य में इस ऐतिहासिक घटना की स्मृति में दो स्मारक डाक टिकटों का सेट जारी किया है। एक सेट में बैटन का चित्र है और दूसरे में दिल्ली के इंडिया गेट की पृष्ठभूमि में गौरवान्वित शेरा को बैटन पकड़े हुए चित्रित किया गया है।

Thursday, 16 September 2010

बच्चों से जुड़े ब्लॉग अब प्रिंट-मीडिया में भी चर्चित


बच्चों की बात ही निराली होती है. फिर बच्चों से जुड़े ब्लॉग भी तो निराले हैं. अब तो बाकायदा इनकी चर्चा प्रिंट-मीडिया में भी होने लगी है. 'हिंदुस्तान' अख़बार के दिल्ली संस्करण में 16 सितम्बर, 2010 को प्रकाशित भारत मल्होत्रा के लेख 'ब्लॉग की क्रिएटिव दुनिया' में बच्चों से जुड़े ब्लॉगों की भरपूर चर्चा की गई है. इसमें 'बाल-दुनिया' की भी चर्चा की गई है, इसके लिए आभार !!
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दोस्तो, तुम्हें याद होगा कि कुछ समय पहले हमने तुम्हें बताया था कि तुम अपना ब्लॉग कैसे बना सकते हो। जब हमने नेट पर सर्च किया तो पाया कि ऐसे बहुत से ब्लॉग बच्चों के हैं। कुछ बच्चे खुद ही अपने ब्लॉग को अपडेट करते हैं तो कुछ टेक्निकल जानकारी न होने की वजह से अपने पेरेंट्स या फिर किसी बड़े की मदद ले रहे हैं। जब हमने इन ब्लॉग्स को देखा तो वे बेहद रोचक लगे। कोई अपने पिकनिक पिक्चर नेट पर शेयर कर रहा है तो कोई बता रहा है कि किसी परिणाम से पहले उसे कैसा महसूस हुआ। पेंटिंग, कहानी, कविता, जोक्स आदि जो मन करता है, अपने ब्लॉग पर लिख रहे हैं। चलो मिलते हैं ऐसे ही कुछ बच्चों से, जो किसी स्टार से कम नहीं। भारत मल्होत्रा की रिपोर्ट।

दोस्तो, जब तुम इन ब्लॉग्स की सैर करोगे तो पाओगे कि तुम्हारी ही उम्र के बच्चे अपनी क्रिएटिविटी को कैसे दुनिया भर के लोगों तक पहुंचा रहे हैं। इसके साथ ही यहां होंगे कुछ ऐसे ब्लॉग्स, जो तुम्हारे लिये बेहद फायदेमंद होंगे और जिन्हें पढ़ना तुम्हारे लिये फायदे का सौदा होगा। इनमें कविता है, ड्रॉइंग है, मजेदार कहानियां हैं और सीखने को है बहुत कुछ। वे पापा से चॉकलेट मांगते हैं और मम्मी को तंग करते हैं। दादा-दादी के लाडले हैं और नानी के घर जाकर खूब ऊधम भी मचाते हैं। लेकिन इस सबके बाद भी ब्लॉगिंग भी करते हैं। तो चलो आज कुछ ऐसे ही नन्हे ब्लॉगर्स से मिला जाये-
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http://akshaysdream.blogspot.com/
नवीं कक्षा में पढ़ने वाले छात्र अक्षय का यह ब्लॉग है। वह कहते हैं कि ब्लॉग बनाने की प्रेरणा मुझे अपनी मम्मी से मिली। दरअसल मम्मा जब भी कंप्यूटर में ब्लॉग पर कुछ-कुछ टाइप कर रही होती थीं तो मुझे यह देख कर बहुत अच्छा लगा। मैंने मम्मा से कहा कि मुझे भी बताओ कि कैसे आप टाइप कर लेती हैं। एक खास तरह के फॉन्ट पर मम्मा ने टाइप करना मुझे सिखा दिया। फिर क्या था, मैं जो कविताएं कागज पर लिखा करता था, वह मैं अपने ब्लॉग पर करने लगा। 2007 में बने इस ब्लॉग पर मेरी कविताओं के लिए लगातार कमेंट्स आ रहे हैं। इस ब्लॉग पर मैं कविताओं के अलावा ड्रॉइंग भी बनाता हूं। मैंने अपने ब्लॉग का लिंक अपने ऑरकुट अकाउंट पर दिया हुआ है ताकि मेरे दोस्त भी ब्लॉग के लिंक पर क्लिक करें। देखा दोस्तो, अक्षय अपने ब्लॉग को लेकर कितना उत्साहित है।

http://www.pakhi-akshita.blogspot.com/
इस ब्लॉग के बाद नाम आता है अक्षिता यादव का। अक्षिता का प्यार का नाम पाखी है, यानी चिड़िया। उसकी उम्र तो बेहद कम है, लेकिन हिन्दी ब्लॉगिंग में वो एक जाना-पहचाना नाम बन चुकी है। अक्षिता के ब्लॉग पाखी की दुनिया पर क्लिक करके पहुंचा जा सकता है। इसमें उसकी रोजमर्रा की कहानी भी होती है। बात टीचर्स डे मनाने की हो या फिर जन्माष्टमी की खुशियां मनाने की, अक्षिता हर भावना को व्यक्त करने में कामयाब रही है। इसके साथ ही उसके ब्लॉग पर उसके बनाये चित्र भी देखे जा सकते हैं।

खूबसूरती से रंग भरती है अक्षिता।

अक्षिता अपने मम्मी-पापा के साथ पोर्ट-ब्लेयर में रहती है, लेकिन उसके मम्मी -पापा दोनों ब्लॉगिंग करते हैं। अक्षिता को प्लेयिंग, ड्रॉइंग के साथ-साथ घूमना-फिरना भी बेहद पसंद है, इसके साथ ब्लॉगिंग से तो उसे प्यार है ही। अक्षिता का ब्लॉग बेहद पॉपुलर है और फिलहाल हिन्दी के टॉप 150 ब्लॉगों में से एक है। तुम्हें पता है कि पाखी की तस्वीर तो बच्चों की एक मैगजीन के कवर पर भी छप चुकी है। बहुत पसंद किया जाता है पाखी को। कई अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं में पाखी के नाम का जिक्र हो चुका है।

पाखी यह भी कहती है कि ब्लॉगिंग करने से उनके बाकी कामों पर कोई असर नहीं पड़ता। वो पढ़ाई-लिखाई और खेल-कूद के लिये पूरा वक्त निकाल लेती है। ब्लॉग पर उसके काम को देखते हुए उसे एक संस्थान की ओर से 2010 की सर्वश्रेष्ठ नन्ही ब्लॉगर का इनाम भी मिल चुका है। है, न मजेदार बात। हां, एक जरूरी बात, अक्षिता क्यों कि अभी छोटी है, इसलिये अपनी बातें और विचार ब्लॉग पर उतारने के लिये उसे अपने माता-पिता की मदद लेनी पड़ती है।

http://balduniya.blogspot.com/
यूआरएल पर जाकर तुम्हें निराश नहीं होना पड़ेगा। ये ब्लॉग पूरी तरह से तुम्हारे लिये ही हैं। इस पर तुम्हारे लिये ढेरों कवितायें भरी पड़ी हैं। इसके साथ ही कई मजेदार जानकारियां भी हैं, जैसे- हैप्पी बर्थडे गीत की शुरुआत कैसे हुई? फ्रैंडशिप डे के पीछे कौन सी कहानी छुपी है? यह क्यों मनाया जाता है? इसकी शुरुआत कैसे हुई?

इसमें कई रचनायें तो तुम्हारी उम्र के बच्चों की ओर से की गयी हैं। हां, अगर तुम चाहो तो तुम भी अपनी रचना, ड्रॉइंग आदि इस ब्लॉग पर भेज सकते हो, फिर वो तुम्हारे नाम से उसे यहां लगा देंगे। क्यों, है न मजेदार।

http://riddhisingh.blogspot.com/
ब्लॉग देखने में बेहद खूबसूरत लगता है। इसे एक बार देखने से यही लगता है कि कोई बड़ा इस छोटे से बच्चे की भावनाओं को, उसकी बातों को और उसकी शरारतों को तुम तक पहुंचाता है। क्योंकि यह ब्लॉग तुम जैसे ही किसी बच्चे का है, इसलिए वहां कुछ तुम्हें पसंद आए तो कमेंट जरूर करना। मौज-मस्ती से भरपूर यह ब्लॉग तुम्हारा मनोरंजन जरूर करेगा।

http://balsajag.blogspot.com/
बाल सजग एक ऐसा ब्लॉग है, जो बना है सिर्फ तुम बच्चों के लिए। इसकी टीम में सभी मजदूर बच्चे हैं, जो काम करते हैं और साथ ही कवितायें-कहानियां भी कहते हैं। इस ब्लॉग पर आने के बाद तुम्हें अहसास होगा कि भले ही इन बच्चों के पास सुविधाओं की कमी हो, लेकिन टेलेंट की कोई कमी नहीं है। ये बच्चे पेड़ लगाने का मैसेज भी देते हैं और नेताओं पर व्यंग्य भी करते हैं। हां, इनकी भाषा बिल्कुल तुम्हारे जैसी है- सिंपल। इस ब्लॉग पर एक बार आकर देखो, तुम्हें मजा आ जायेगा।

http://saraspaayas.blogspot.com/
इस ब्लॉग को हम लोगों तक पहुंचाने के लिए यह बच्चा अपने पेरेंट्स की मदद लेता है। यह ब्लॉग है रावेंद्र कुमार रवि का, लेकिन है ये तुम्हारे लिये। इसमें कई बच्चों के ब्लॉग के लिंक हैं और साथ ही मजेदार कवितायें भी हैं। इसके साथ ही मजेदार बातें तो हैं ही।

http://nanhaman.blogspot.com/
नन्हा मन इस ब्लॉग का नाम है। ब्लॉग की दुनिया में तुम लोगों के लिये यह एक ऐसा ब्लॉग है, जहां तुम्हारे मनोरंजन का खास ख्याल रखा गया है। और अगर तुम चाहते हो कि तुम्हारी कोई रचना यहां छपे तो nanhaman@gmail.com पर उसे मेल भी कर सकते हो।

दोस्तो, हो सकता है कि तुम्हें अच्छी कहानी, कविता लिखनी आती हो। तुम में से कुछ बच्चे अच्छी पेंटिंग करना भी जानते होंगे। लेकिन जब बात आती है इन सारी चीजों को कंप्यूटर में अपलोड करने की तो हो सकता है तुम्हें इसकी टेक्निकल जानकरी न हो। इस काम के लिए बड़ों की मदद लेने में मत हिचकना। जो बच्चे कंप्यूटर में ब्लांगिग करना चाहते हैं, वे बड़ों को देख-देख एक दिन खुद-ब-खुद एक्सपर्ट हो जाएंगे। हिन्दी में बच्चों के और ब्लॉग्स के लिये क्लिक करें
http://hindikids.feedcluster.com

साभार : Live हिंदुस्तान. com

Sunday, 1 August 2010

आज फ्रैंडशिप डे ...बधाई

आज 1अगस्त को ‘फ्रेण्डशिप-डे‘ है। चलिए, आज इसके बारे में बताती हूँ। पूरी दुनिया में अगस्त माह का प्रथम रविवार फ्रेंडशिप डे के रूप में मनाया जाता है. इसके इतिहास में जाएँ तो अमेरिकी कांग्रेस द्वारा 1935 में अगस्त माह के प्रथम रविवार को दोस्तों के सम्मान में ‘राष्ट्रीय मित्रता दिवस‘ के रूप में मनाने का फैसला लिया गया था। इस अहम दिन की शुरूआत का उद्देश्य प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान उपजी कटुता को खत्म कर सबके साथ मैत्रीपूर्ण भाव कायम करना था। पर कालान्तर में यह सर्वव्यापक होता चला गया। दोस्ती का दायरा समाज और राष्ट्रों के बीच ज्यादा से ज्यादा बढ़े, इसके मद्देनजर संयुक्त राष्ट्र संघ ने बकायदा 1997 में लोकप्रिय कार्टून कैरेक्टर विन्नी और पूह को पूरी दुनिया के लिए दोस्ती के राजदूत के रूप में पेश किया।

इस दिन तो फ्रेण्डशिप कार्ड, क्यूट गिफ्ट्स और फ्रेण्डशिप बैण्ड देकर आप दोस्तों को बधाई दे सकते हैं या नई दोस्ती की शुरुआत कर सकते हैं. पर एक बात सदैव याद रखना कि सच्चा दोस्त वही होता है जो अपने दोस्त का सही मायनों में विश्वासपात्र होता है। अगर आप सच्चे दोस्त बनना चाहते हैं तो अपने दोस्त की तमाम छोटी-बड़ी, अच्छी-बुरी बातों को उसके साथ तो शेयर करो लेकिन लोगों के सामने उसकी कमजोरी या कमी का बखान कभी न करो। नही तो आपके दोस्त का विश्वास उठ जाएगा क्योंकि दोस्ती की सबसे पहली शर्त होती है विश्वास। हाँ, एक बात और। उन पुराने दोस्तों को विश करना न भूलें जो हमारे दिलों के तो करीब हैं, पर रहते दूरियों पर हैं।

Friday, 30 July 2010

कहाँ से आई 'हैप्पी बर्थडे टू यू' की पैरोडी

आज 30 जुलाई को मेरा जन्मदिन है। जन्मदिन की बात आती है तो ‘हैप्पी बर्थडे टू यू‘ गीत जरुर याद आता है. कभी सोचा है कि आखिर ये प्यारी सी पैरोडी आरम्भ कहां से हुई। आज आपने जन्मदिन पर इसी के बारे में बताती हूँ.

वस्तुतः ‘हैप्पी बर्थडे टू यू‘ की मधुर धुन ‘गुड मार्निंग टू आल‘ गीत से ली गयी है, जिसे दो अमेरिकन बहनों पैटी हिल तथा माइल्ड्रेड हिल ने 1993 में बनाया था। ये दोनों बहनें किंडर गार्टन स्कूल की शिक्षिकाएं थीं। इन्होंने ‘गुड मार्निंग टू आल‘ गीत की यह धुन इसलिए बनायी ताकि बच्चों को इसे गाने में आसानी हो और मजा आये। फिलहाल दुनिया भर में इस गीत का 18 भाषाओं में अनुवाद किया गया है। इस गाने की धुन और बोल पहली बार 1912 में लिखित रूप से प्रकाश में आये। इस गाने पर सुम्मी कंपनी चैपल ने इस कंपनी को 15 अमेरिकी मिलियन डाॅलर में खरीद लिया। उस वक्त इस धुन की कीमत करीब 5 अमेरिकी मिलियन डालर थी। गीत की सबसे प्रसिद्ध व भव्य प्रस्तुति मई 1962 में विख्यात हालीवुड अभिनेत्री मारिलियन मोनरोर्ड ने अमेरिकी राष्ट्रपति जान एफ केनेडी को समर्पित की थी। इस गीत को 8 मार्च 1969 को अपालो 9 दल के सदस्यों ने भी गया था। हजारों की संख्या में लोगों ने पोप बेनेडिक्ट सोलहवें के 81वें जन्मदिवस पर 16 अप्रैल 2008 को इसे व्हाइट हाउस में पेश किया था। 27 जून 2007 को लंदन के हाइड पार्क में सैकड़ों लोगों ने नेल्सन मंडेला के 90वें जन्मदिवस पर भी इसे गाया गया था। अब भी ‘हैप्पी बर्थडे टू यू‘ गीत प्रतिवर्ष 2 मिलियन डालर की कमाई कर रहा है। गिनीज बुक आफ वल्र्ड रिकार्ड के मुताबिक ‘हैप्पी बर्थडे टू यू‘ अंग्रेजी भाषा का सबसे परिचित गीत है।... तो आप भी गाइये- ‘हैप्पी बर्थडे टू यू‘।

Wednesday, 21 July 2010

बच्चों को स्कूल में पीटा तो...

स्कूलों में शिक्षकों द्वारा बच्चों को पीटने की घटना आम है। हालांकि अब इसमें काफी हद तक कमी आई है। बावजूद इसके अब बच्चों को पीटना आसान नहीं होगा, क्योंकि अब एक ऐसा मॉडयूल तैयार किया गया जो बच्चों को शिक्षकों की पिटाई से बचाएगा। एक प्रकार का यह टूल किट शिक्षकों को उनके सवालों के जवाब देते हुए उन्हे स्कूलों में एक सकारात्मक वातावरण तैयार करने में सहायता देगा। प्लॉन इंडिया ने राष्ट्रीय बाल संरक्षण अधिकार आयोग के सहयोग से एक पॉजिटिव डिसीपलीन मॉडयूल तैयार किया गया है।

मॉड्यूल का फाइनल ड्राफ्ट एनसीईआरटी व यूनिसेफ से प्राप्त हुए फीड बैक के आधार पर तैयार हुआ है। देश भर में वर्ष 2015 तक सात राज्यों के 2000 स्कूलों तक इसे पहुंचाने का लक्ष्य भी तैयार किया गया है। मॉडयूल तैयार करने के पीछे प्रमुख उद्देश्य स्कूलों में हर प्रकार की हिंसा को रोकने के लिए वातावरण तैयार करना है। खासकर यह मॉडयूल कक्षा एक से आठ तक के शिक्षकों व मुख्य अध्यापकों को पढ़ाने की तकनीक सिखाने में सहायक बनेगा।

भारत में यह शैक्षणिक सिस्टम से हिंसा को रोकने में काफी कारगर होगा। स्कूलों में बच्चों के साथ हिंसात्मक कार्रवाई न हो इसके संबंध में जागरूकता फैलाने की आवश्यकता है। जागरूकता फैलाने के लिए प्लॉन इंडिया 60 वॉलंटियर तैयार करेगा, जिनकी मदद से अन्य राज्यों में स्कूलों में हिंसात्मक गतिविधियों की रोकथाम की जाएगी। इसके माध्यम से स्कूल में सकारात्मक वातावरण तैयार किया जाएगा। उल्लेखनीय है कि प्लॉन इंडिया की एक स्टडी के आधार पर मॉडयूल तैयार हुआ है। दरअसल स्टडी में पाया गया है कि स्कूलों में बच्चे 33 विभिन्न प्रकार की सजा की शिकायतें करते है, जिसमें उन्हे पीटना, रस्सी से बांधना, शारीरिक प्रताड़ना जैसी घटनाएं शामिल है। हैरत की बात यह है कि इतने सारे बच्चों को यह नहीं लगा कि पीटा जाना ठीक था।
तो टीचर जी, अब संभल जाएँ...यदि बच्चों को स्कूल में पीटा तो...