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Thursday, 1 December 2016

ख़ुद में एक बच्चा जिन्दा रखिये : डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव ने किया बाल साहित्यकार दीनदयाल शर्मा की बाल पुस्तकों का लोकार्पण

आधुनिक दौर में बच्चों में अध्ययन के प्रति समर्पण के साथ-साथ रचनात्मकता होना भी बहुत जरूरी है। यह रचनात्मकता ही हमें जिज्ञासु बनाती है और संवेदनशीलता को बरकरार रखती है। इसके लिए हमारे भीतर का बचपन जिन्दा रहना चाहिए। उक्त उद्गार राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर के निदेशक डाक सेवाएँ एवं चर्चित साहित्यकार व ब्लॉगर श्री कृष्ण कुमार यादव ने राजस्थान साहित्य परिषद् की ओर से 8 नवम्बर, 2016 को को पुलकित सीनियर सैकण्डरी स्कूल, हनुमानगढ़  में आयोजित पुस्तक लोकार्पण समारोह में वरिष्ठ बाल साहित्यकार दीनदयाल शर्मा की चार बाल पुस्तकों का लोकार्पण करते हुए कहीं। 

बोधि प्रकाशन, जयपुर द्वारा  प्रकाशित चारों पुस्तकों  हिन्दी बाल गीत-‘चिडिय़ा चहके गीत सुनाए’, शिशु गीत-‘रसगुल्ला’, बाल कहानियां-‘मित्र की मदद’ तथा राजस्थानी बाल गीत-‘दिवळो कोई जगावां’ के लोकार्पण अवसर पर उपस्थित विद्यार्थियों और स्कूली बच्चों से रूबरू होते हुए  निदेशक डाक सेवाएँ एवं चर्चित साहित्यकार व ब्लॉगर श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि हमें मात्र रूटीनी गतिविधियाँ करके रोबोट नहीं बनना। किताबी पढ़ाई बहुत कुछ है लेकिन यह ही सब कुछ नहीं है। असली संसार तो इन किताबों से बाहर बसता है, जिसे कवि, लेखक और साहित्यकार अपने खूबसूरत शब्दों के माध्यम से पन्नों के दायरे में बाँधने की कोशिश करते हैं और हम सबसे रूबरू करवाते हैं। 

श्री कृष्ण कुमार यादव ने वर्तमान दौर में बच्चों के मन में चल रहे अन्तर्दन्द्धों और सपनों को बाहर लेन की बात कही। उन्होंने कहा कि समाचार पत्रों और न्यूज चैनलों पर अक्सर देखते और पढ़ते हैं कि अमुक जगह पर किसी बच्चे ने फेल होने पर आत्महत्या कर ली। आत्महत्या किसी समस्या का हल नहीं है। पढ़ाई के अलावा भी बहुत कुछ है। किसी बच्चे को खेल में, किसी को पेण्टिंग या ड्राइंग में तो किसी को संगीत आदि में रूचि होती है। हमें अपनी रूचियों को बढ़ावा देते हुए इसमें और आगे बढऩा चाहिए। 

श्री यादव ने कहा कि बाल साहित्यकार के रूप में दीनदयाल शर्मा ने तमाम खूबसूरत कृतियाँ रची हैं और इन रचनाओं में हमारा-आपका सभी का बचपन जीवंत होता है।  इनकी रचनाओं में सहजता है और बाल सुलभता है। बच्चों से संवाद करती इन बाल रचनाओं ने दीनदयाल शर्मा जी को सिर्फ राजस्थान ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान दिलाई है। श्री यादव ने आशा व्यक्त की कि सेवानिवृत्त  होने के बाद दीनदयाल शर्मा बाल-साहित्य के लिए और भी समय निकल सकेंगें और उनके मार्गदर्शन में तमाम भावी बाल साहित्यकार भी पैदा होंगे। 

लोकार्पण के मौके पर पुस्तकों के रचनाकार दीनदयाल शर्मा ने लोकार्पित पुस्तकों से कुछ कविताएं भी सुनाईं। कार्यक्रम के आरंभ में मुख्य अतिथि निदेशक डाक सेवाएं एवं वरिष्ठ साहित्यकार कृष्णकुमार यादव को माल्यार्पण करके श्रीफल भेंट किया गया तथा शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम के अंत में स्कूल के प्रधानाचार्य राजेश मिढ़ा ने अतिथियों को धन्यवाद देते हुए आभार जताया। कार्यक्रम का संचालन  सुदर्शन सामरिया, जोधपुर ने किया। 


(प्रस्तुति - दीनदयाल शर्मा, संपादक -टाबर टोली, हनुमानगढ़, राजस्थान)

Sunday, 24 August 2014

उमेश चौहान की बाल-कविताएँ

हिंदी साहित्य में बड़ों के साथ-साथ, नन्हे-मुन्नों के लिए भी लेखन करने वालों की कमी नहीं है। बाल-साहित्य एक ऐसी विधा है, जहाँ बड़ों को भी बच्चा बनकर सोचना पड़ता है, अन्यथा लेखन में कृत्रिमता हावी हो जाती है।  उमेश चौहान जी  उन लोगों में से हैं, जो बड़ों के साथ-साथ बच्चों के लिए भी निरंतर लेखन कर रहे हैं। उनकी बाल-कवितायेँ जहाँ बच्चों में मनोरंजन पैदा करती हैं, वहीँ उन्हें सीख भी देती हैं।  वे अपनी बाल कविताओं के बहाने कई बार अपना बचपन भी खोजते हैं। उमेश चौहान जी लेखक के साथ-साथ एक प्रशासनिक अधिकारी भी हैं।  साहित्य उन्हें संवेदनशील बनाता है और लोगों के नजदीक भी करता है।  बाल दुनिया ब्लॉग पर हम पहले भी उनकी कवितायेँ प्रकाशित कर चुके हैं और अब उनकी कुछ और बाल-कविताएँ :

लालची चाचा

चाचा-चाची एक बार बाजार गए सज-धजकर
भोले-भाले चाचा पहुँचे सब्जी - मंडी भीतर।
गोल-गोल तरबूज वहाँ बिकते थे सुंदर-सुंदर
नहीं कभी देखा चाचा ने लगे परखने बढ़कर।

सब्जी वाले से चाचा ने पूछा, “यह क्या भाई?”
“हाथी का अंडा” कह करके उसने बात बनाई।
ऐसा सुनकर चाचा जी को अचरज हुआ भयंकर
खुशी-खुशी चाची से बोले, “चीज बड़ी यह सुंदर!

चलो इसे ले चलकर घर में सेवा खूब करेंगे
कुछ दिन में जब बच्चा होगा, खिला-पिला पालेंगे।
नहीं किसी के घर में ऐसा होते अब तक देखा
बड़े खुशी होंगे सब बच्चे, राजू, सनी, सुरेखा।”

सब्जी वाले ने चाचा को जमकर मूर्ख बनाया
काफी  पैसे  ले  करके पूरा तरबूज थमाया।
बोला, “चाचा! इसे राह में फटने कहीं न देना
किसी जगह पर इसे जोर से नीचे मत रख देना।”

सहमे-सहमे चाचा उसको चले हाथ में लेकर
डरते थे वह फूट न जाए कहीं जोर से दबकर।
बीच राह में बड़े जोर की प्यास लगी चाचा को
नीचे रखकर उसे मिटाने चले तुरत तृष्णा को।

पास एक झाड़ी थी जिसमें एक स्यार था रहता
चाचा के डर से वह भागा खुरखुर-गुरगुर करता।
समझा चाचा ने कि फट गया शायद उनका अंडा
भाग रहा हाथी का बच्चा, सोच उठाया डंडा।
दौड़े  चाचा उसे  पकड़ने पास  घना जंगल था
घुसे उसी में नहीं चैन अब उन्हें एक भी पल था।
खड़ी रह गईं चाची करतीं मना उन्हें जाने से
किन्तु न माने चाचा दौड़े जिद अपनी ठाने से।

जंगल में चाचा को पाकर एक भेड़िया आया
पकड़ मार डाला चाचा को पेट फाड़कर खाया।
फँसे मूर्खता में निज चाचा बुद्धि न उनको आई
झूठे लालच में फँस करके अपनी जान गँवाई।

डॉगी
मेरे घर में डॉगी है
थोड़ा-थोड़ा बागी है।

अंग्रेजी में बातें करता
हिन्दी सुनते ही गुर्राता,
दाल-पनीर देखकर बिचके
मटन-चिकन झट चट कर जाता’
पापा ने ला डाला इसके 
पट्टा एक गुलाबी है। मेरे घर में ……

मेरे संग फुटबाल खेलता
खुश हो-होकर पूँछ हिलाता,
किन्तु बड़े जोरों से भूँके
कोई अजनबी जब घर आता,
पूर्व परिचितों के प्रति लेकिन
यह असीम अनुरागी है। मेरे घर में ……

नाम रखा है ‘बूजो’ इसका
संकर नस्ल रंग भूरा सा,
घर की रखवाली में तत्पर
हल्की आहट सुन उठ जाता,
आया जब से है यह घर में
बिल्ली घर से भागी है। मेरे घर में ……



मस्ती

 काले-काले बादल छाए
पुरवाई संग उड़कर आए।

जमकर बरसे मेघ सलोने
भीगे धरती के सब कोने।
रिंकू ने भी शर्ट उतारी
भीग-भीग किलकारी मारी।
सिम्मी, निम्मी, रिंकी, अख़्तर
जुटे सभी पल भर में छत पर।
दौड़-दौड़ सारे बच्चों ने
मस्ती के परचम लहराए। काले-काले बादल ……

खेल-खेल में ही रिंकू ने
अख़्तर को थोड़ा धकियाया।
छत की रेलिंग पर लटका था
अख़्तर खुद से संभल न पाय।
नीचे जाकर गिरा जोर से
गिरते ही फिर होश न आया।
भागे सारे बच्चे नीचे
मम्मी-पापा भी घबराए। काले-काले बादल ……

अस्पताल ले जा अख़्तर को
डॉक्टर से उपचार कराया।
चोट नहीं गहरी थी उसकी
होश तभी अख़्तर को आया।
बहुत सभी पछताए बच्चे
पापा-मम्मी ने समझाया।
मस्ती बहुत जरूरी होती

लेकिन सबकी हैं सीमाएं। काले-काले बादल ……

अनमोल खजाना

दीपक बड़ा दुलारा था
दादा जी को प्यारा था,
पापा दूर शहर में रहते
सबका वही सहारा था।

दादा जी बिलकुल बूढ़े थे
वे घंटों पूजा करते थे,
खर्चे-पानी से जो बचता
एक तिजोरी में रखते थे।

उसे खोलना और बंद
करना दीपक को भाता था,
बेहिसाब रखवाली का वह
पूरा लाभ उठाता था।

रोज सुबह चुपके उससे वह
रुपए बीस चुराता था,
विद्यालय के इंटरवल में
चाट-पकोड़े खाता था।

खिला-पिलाकर उसने अपने
साथी खूब बनाए थे,
उनके संग ही आता-जाता
असल दोस्त कतराए थे।

दादा कभी भाँप ना पाए
थे दीपक की चालाकी,
जब-जब वे बीमार पड़े
उसने ही उनकी सेवा की।
लेकिन चमत्कार होते हैं
कभी-कभी कुछ जीवन में,
महा-चरित्रों से मिलती है
सीख अनोखी बचपन में।

उस दिन टीचर ने कक्षा में
भावुक  हो  समझाया  था,
गाँधी जी की आत्म-कथा का
हिस्सा  एक  सुनाया  था।

गाँधी जी ने भी बचपन में
घर  के  द्रव्य चुराए  थे,
किन्तु बाद में पछताकर
बीमार पिता ढिग आए थे।

सच-सच लिखकर बता दिया
चिपटे फिर जोर-जोर  रोए,
आगे अपने कर्म-क्षेत्र में
बीज  सत्य  के  ही  बोए।

पढ़ते ही यह पाठ अचानक
दीपक का मन भर आया,
लौट शाम को घर पर उसने
दादा  को  सच  बतलाया।

फूट-फूटकर दीपक रोया
दादा से माफी माँगी,
चोरी-झूठ त्यागकर उसमें
सच के प्रति निष्ठा जागी।

दादा जी ने विह्वल होकर
उसे  प्यार  से  दुलराया,
थमा तिजोरी की चाभी फिर
बड़ा  मनोबल  उकसाया।

एक पाठ की एक सीख ने
दीपक का जीवन बदला,
शिक्षा का अनमोल खजाना
करता सबका सदा भला।

-उमेश चौहान 
सम्पर्क: सी-II/ 195, सत्य मार्ग, चाणक्यपुरी, नई दिल्ली–110021 (मो. नं. +91-8826262223).

पूरा नाम: उमेश कुमार सिंह चौहान (यू. के. एस. चौहान)
जन्म: 9 अप्रैल, 1959 को उत्तर प्रदेश के लखनऊ जनपद के ग्राम दादूपुर में।
शिक्षा: एम. एससी. (वनस्पति विज्ञान), एम. ए. (हिन्दी), पी. जी. डिप्लोमा (पत्रकारिता व जनसंचार)।

साहित्यिक गतिविधियाँ:

प्रकाशित पुस्तकें: ‘गाँठ में लूँ बाँध थोड़ी चाँदनी’ (प्रेम-गीतों का संग्रह) - सत्साहित्य प्रकाशन, दिल्ली (2001), ‘दाना चुगते मुरगे’ (कविता-संग्रह) - सत्साहित्य प्रकाशन, दिल्ली (2004), ‘अक्कित्तम की प्रतिनिधि कविताएं’  (मलयालम के महाकवि अक्कित्तम की अनूदित कविताओं का संग्रह) - भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली (2009), ‘जिन्हें डर नहीं लगता’ (कविता-संग्रह) - शिल्पायन, दिल्ली (2009), एवं ‘जनतंत्र का अभिमन्यु’ (कविता – संग्रह) - भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली (2012), मई 2013 से हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र 'जनसंदेश टाइम्स' (लखनऊ, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी एवं गोरखपुर से प्रकाशित) में साप्ताहिक स्तम्भ-लेखन

संपादित पुस्तकें: 'जनमंच' (श्री सी.वी. आनन्दबोस के मलयालम उपन्यास 'नाट्टुकूट्टम' का हिन्दी अनुवाद) - शिल्पायन, दिल्ली (2013)

सम्मान: भाषा समन्वय वेदी, कालीकट द्वारा ‘अभय देव स्मारक भाषा समन्वय पुरस्कार’ (2009) तथा इफ्को द्वारा ‘राजभाषा सम्मान’ (2011)





Friday, 27 December 2013

चिड़िया कितनी प्यारी है


चिड़िया कितनी प्यारी है
मुझको सुबह उठाती है.
मुरगी बोले कुकड़ू-कुकड़ू
कोयल गीत सुनाती है.

तोता बोली रटता है
चोरों को डर लगता है.
छत के ऊपर बैठा कौआ
सबका स्वागत करता है.

सबसे सीधी मैना है
आँगन में इठलाती है.
गौरैया भी खूब फुदकती

हर बच्चे को भाती है.


उमेश चौहान 
सम्पर्क: सी-II/ 195, सत्य मार्ग, चाणक्यपुरी, नई दिल्ली–110021 (मो. नं. +91-8826262223)


पूरा नाम: उमेश कुमार सिंह चौहान (यू. के. एस. चौहान)
जन्म: 9 अप्रैल, 1959 को उत्तर प्रदेश के लखनऊ जनपद के ग्राम दादूपुर में।
शिक्षा: एम. एससी. (वनस्पति विज्ञान), एम. ए. (हिन्दी), पी. जी. डिप्लोमा (पत्रकारिता व जनसंचार)।

साहित्यिक गतिविधियाँ:

  • प्रकाशित पुस्तकें: ‘गाँठ में लूँ बाँध थोड़ी चाँदनी’ (प्रेम-गीतों का संग्रह) - सत्साहित्य प्रकाशन, दिल्ली (2001), ‘दाना चुगते मुरगे’ (कविता-संग्रह) - सत्साहित्य प्रकाशन, दिल्ली (2004), ‘अक्कित्तम की प्रतिनिधि कविताएं’  (मलयालम के महाकवि अक्कित्तम की अनूदित कविताओं का संग्रह) - भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली (2009), ‘जिन्हें डर नहीं लगता’ (कविता-संग्रह) - शिल्पायन, दिल्ली (2009), एवं ‘जनतंत्र का अभिमन्यु’ (कविता – संग्रह) - भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली (2012), मई 2013 से हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र 'जनसंदेश टाइम्स' (लखनऊ, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी एवं गोरखपुर से प्रकाशित) में साप्ताहिक स्तम्भ-लेखन

  • संपादित पुस्तकें: 'जनमंच' (श्री सी.वी. आनन्दबोस के मलयालम उपन्यास 'नाट्टुकूट्टम' का हिन्दी अनुवाद) - शिल्पायन, दिल्ली (2013)

  • सम्मान: भाषा समन्वय वेदी, कालीकट द्वारा ‘अभय देव स्मारक भाषा समन्वय पुरस्कार’ (2009) तथा इफ्को द्वारा ‘राजभाषा सम्मान’ (2011)


Sunday, 3 November 2013

जगमग-जगमग करते दीपक



जगमग-जगमग करते दीपक
लगते कितने मनहर प्यारे,
मानों आज उतर आये हैं
अम्बर से धरती पर तारे !

दीपों का त्योहार मनुज के
अतंर-तम को दूर करेगा,
दीपों का त्योहार मनुज के
नयनों में फिर स्नेह भरेगा!

धन आपस में बाँट-बूट कर
एक नया नाता जोड़ेंगे,
और उमंगों की फुलझड़ियाँ
घर-घर में सुख से छोड़ेंगे !

दीपावलि का स्वागत करने
आओ हम भी दीप जलाएँ,
दीपावलि का स्वागत करने
आओ हम भी नाचे गाएँ !

-महेन्द्र भटनागर-

Sunday, 10 February 2013

लड्डू-बर्फी की शादी


जिस दिन होना थी लड्डू की,
बर्फीजी से शादी,
बर्फी बहुत कुरूप किसी ने,
 झूठी बात उड़ा दी|

गुस्से के मारे लड्डूजी,
जोरों से चिल्लाये|

बिना किसी से पूँछतांछ ,
वापस बारात ले आये|

लड्डू के दादा रसगुल्ला,
बर्फी के घर आये|

बर्फीजी को देख सामने ,
मन ही मन मुस्काये|

बर्फी तो इतनी सुंदर थी,
जैसे कोई परी हो|

पंख लगाकर आसमान
से, अभी अभी उतरी हो|

रसगुल्लाजी फिदा हो गये,
उस सुंदर बर्फी पर|

ब्याह कराकर उसको लाये,
वे चटपट अपने घर|

लड्डू क्वांरा बेचारा अब,
लड़ता रसगुल्ला से|

रसगुल्ला मुस्कराता रहता,
बिना किसी हल्ला के|

सुनी सुनाई बातों पर तुम,
कभी ध्यान मत देना|

क्या सच है क्या झूठ सुनिश्चित ,
खुद जाकर‌ कर लेना|

प्रभु दयाल श्रीवास्तव, छिंदवाडा, मध्य प्रदेश

Saturday, 26 January 2013

तिरंगा है शान हमारी

तीन रंग मे रंगा हुआ है,मेरे देश का झन्डा,
केसरिया,सफ़ेद और हरा,मिलकर बना तिरंगा |

इस झंडे की अजब गजब,तुम्हे सुनाऊं कहानी ,
केसरिया की शान है जग मे,युगों-युगों पुरानी |

संस्कृति का दुनिया मे,जब से है आगाज़ हुआ ,
केसरिया तब से ही है,विश्व विजयी बना रहा |

शान्ति का मार्ग बुद्ध ने,सारे जग को दिखलाया ,
धवल विचारों का प्रतीक,सफ़ेद रंग कहलाया |

महावीर ने सत्य,अहिंसा,धर्म का मार्ग बताया ,
शांत रहे सम्पूर्ण विश्व,सफ़ेद धवज फहराया |

खेती से भारत ने सबको,उन्नति का मार्ग बताया ,
हरित क्रांति जग मे फैली,हरा रंग है आया |

वसुधैव कुटुंब मे कोई.कहीं रहे न भूखा ,
मानवता जन-जन मे व्यापे,नहीं बाढ़ नहीं सुखा|

अशोक महान हुआ दुनिया मे,धर्म सन्देश सुनाया ,
सावधान चौबीसों घंटे,चक्र का महत्व बताया |

नीले रंग का बना चक्र,हमको संदेशा देता ,
नील गगन से बनो विशाल,सदा प्रेरणा भरता |

तिरंगा है शान हमारी,आंच न इस पर आये ,
अध्यात्म भारत की देन,विजय धवज फहराए |

डॉ.अ.कीर्तिवर्धन
8265821800

Sunday, 23 December 2012

फिर भी सबसे ठीक हूँ

 
पढ़ने में थोड़ा वीक हूँ
फिर भी सबसे ठीक हूँ।

कभी नहीं मै कक्षा में
करता हूँ शैतानी
दिल दुखाना नहीं किसी का
समझाती है नानी।

इसीलिए मैं किसी को
नही देता हूँ संताप
दूजों को सुख मिले सदा
ऐसे करता हूँ उत्पात।

सहन नहीं कर पता
मैं कोई अत्याचार
मीठे बोल सभी से बोलूं
है ऐसा व्यवहार।

छोटे और बड़े सभी को
देता समुचित मान
भूले से भी मैं शत्रु का
न करता अपमान।

सीखा यही, सिखाता आया
बोल-बोल मृदुबानी
हँसा-हँसा कर करता हूँ
मै ज्ञान भरी शैतानी।

-सुमित कुमार भारती, लखनऊ-

Saturday, 27 October 2012

मेरी झोली में

मेरी झोली में
सपने ही सपने भरे
ले-ले आ कर वही
जिसका भी जी करे.

एक सपना है
फूलों की बस्ती का
एक सपना है
बस मौज मस्ती का,
मुफ्त की चीज है
फिर कोई क्यों डरे?

एक सपना है
रिमझिम फुहारों का
एक सपना है
झिलमिल सितारों का
एक सपना जो
भूखे का पेट भरे.
ले-ले आ कर वही
जिसका भी जी करे.