Sunday 24 August 2014

उमेश चौहान की बाल-कविताएँ

हिंदी साहित्य में बड़ों के साथ-साथ, नन्हे-मुन्नों के लिए भी लेखन करने वालों की कमी नहीं है। बाल-साहित्य एक ऐसी विधा है, जहाँ बड़ों को भी बच्चा बनकर सोचना पड़ता है, अन्यथा लेखन में कृत्रिमता हावी हो जाती है।  उमेश चौहान जी  उन लोगों में से हैं, जो बड़ों के साथ-साथ बच्चों के लिए भी निरंतर लेखन कर रहे हैं। उनकी बाल-कवितायेँ जहाँ बच्चों में मनोरंजन पैदा करती हैं, वहीँ उन्हें सीख भी देती हैं।  वे अपनी बाल कविताओं के बहाने कई बार अपना बचपन भी खोजते हैं। उमेश चौहान जी लेखक के साथ-साथ एक प्रशासनिक अधिकारी भी हैं।  साहित्य उन्हें संवेदनशील बनाता है और लोगों के नजदीक भी करता है।  बाल दुनिया ब्लॉग पर हम पहले भी उनकी कवितायेँ प्रकाशित कर चुके हैं और अब उनकी कुछ और बाल-कविताएँ :

लालची चाचा

चाचा-चाची एक बार बाजार गए सज-धजकर
भोले-भाले चाचा पहुँचे सब्जी - मंडी भीतर।
गोल-गोल तरबूज वहाँ बिकते थे सुंदर-सुंदर
नहीं कभी देखा चाचा ने लगे परखने बढ़कर।

सब्जी वाले से चाचा ने पूछा, “यह क्या भाई?”
“हाथी का अंडा” कह करके उसने बात बनाई।
ऐसा सुनकर चाचा जी को अचरज हुआ भयंकर
खुशी-खुशी चाची से बोले, “चीज बड़ी यह सुंदर!

चलो इसे ले चलकर घर में सेवा खूब करेंगे
कुछ दिन में जब बच्चा होगा, खिला-पिला पालेंगे।
नहीं किसी के घर में ऐसा होते अब तक देखा
बड़े खुशी होंगे सब बच्चे, राजू, सनी, सुरेखा।”

सब्जी वाले ने चाचा को जमकर मूर्ख बनाया
काफी  पैसे  ले  करके पूरा तरबूज थमाया।
बोला, “चाचा! इसे राह में फटने कहीं न देना
किसी जगह पर इसे जोर से नीचे मत रख देना।”

सहमे-सहमे चाचा उसको चले हाथ में लेकर
डरते थे वह फूट न जाए कहीं जोर से दबकर।
बीच राह में बड़े जोर की प्यास लगी चाचा को
नीचे रखकर उसे मिटाने चले तुरत तृष्णा को।

पास एक झाड़ी थी जिसमें एक स्यार था रहता
चाचा के डर से वह भागा खुरखुर-गुरगुर करता।
समझा चाचा ने कि फट गया शायद उनका अंडा
भाग रहा हाथी का बच्चा, सोच उठाया डंडा।
दौड़े  चाचा उसे  पकड़ने पास  घना जंगल था
घुसे उसी में नहीं चैन अब उन्हें एक भी पल था।
खड़ी रह गईं चाची करतीं मना उन्हें जाने से
किन्तु न माने चाचा दौड़े जिद अपनी ठाने से।

जंगल में चाचा को पाकर एक भेड़िया आया
पकड़ मार डाला चाचा को पेट फाड़कर खाया।
फँसे मूर्खता में निज चाचा बुद्धि न उनको आई
झूठे लालच में फँस करके अपनी जान गँवाई।

डॉगी
मेरे घर में डॉगी है
थोड़ा-थोड़ा बागी है।

अंग्रेजी में बातें करता
हिन्दी सुनते ही गुर्राता,
दाल-पनीर देखकर बिचके
मटन-चिकन झट चट कर जाता’
पापा ने ला डाला इसके 
पट्टा एक गुलाबी है। मेरे घर में ……

मेरे संग फुटबाल खेलता
खुश हो-होकर पूँछ हिलाता,
किन्तु बड़े जोरों से भूँके
कोई अजनबी जब घर आता,
पूर्व परिचितों के प्रति लेकिन
यह असीम अनुरागी है। मेरे घर में ……

नाम रखा है ‘बूजो’ इसका
संकर नस्ल रंग भूरा सा,
घर की रखवाली में तत्पर
हल्की आहट सुन उठ जाता,
आया जब से है यह घर में
बिल्ली घर से भागी है। मेरे घर में ……



मस्ती

 काले-काले बादल छाए
पुरवाई संग उड़कर आए।

जमकर बरसे मेघ सलोने
भीगे धरती के सब कोने।
रिंकू ने भी शर्ट उतारी
भीग-भीग किलकारी मारी।
सिम्मी, निम्मी, रिंकी, अख़्तर
जुटे सभी पल भर में छत पर।
दौड़-दौड़ सारे बच्चों ने
मस्ती के परचम लहराए। काले-काले बादल ……

खेल-खेल में ही रिंकू ने
अख़्तर को थोड़ा धकियाया।
छत की रेलिंग पर लटका था
अख़्तर खुद से संभल न पाय।
नीचे जाकर गिरा जोर से
गिरते ही फिर होश न आया।
भागे सारे बच्चे नीचे
मम्मी-पापा भी घबराए। काले-काले बादल ……

अस्पताल ले जा अख़्तर को
डॉक्टर से उपचार कराया।
चोट नहीं गहरी थी उसकी
होश तभी अख़्तर को आया।
बहुत सभी पछताए बच्चे
पापा-मम्मी ने समझाया।
मस्ती बहुत जरूरी होती

लेकिन सबकी हैं सीमाएं। काले-काले बादल ……

अनमोल खजाना

दीपक बड़ा दुलारा था
दादा जी को प्यारा था,
पापा दूर शहर में रहते
सबका वही सहारा था।

दादा जी बिलकुल बूढ़े थे
वे घंटों पूजा करते थे,
खर्चे-पानी से जो बचता
एक तिजोरी में रखते थे।

उसे खोलना और बंद
करना दीपक को भाता था,
बेहिसाब रखवाली का वह
पूरा लाभ उठाता था।

रोज सुबह चुपके उससे वह
रुपए बीस चुराता था,
विद्यालय के इंटरवल में
चाट-पकोड़े खाता था।

खिला-पिलाकर उसने अपने
साथी खूब बनाए थे,
उनके संग ही आता-जाता
असल दोस्त कतराए थे।

दादा कभी भाँप ना पाए
थे दीपक की चालाकी,
जब-जब वे बीमार पड़े
उसने ही उनकी सेवा की।
लेकिन चमत्कार होते हैं
कभी-कभी कुछ जीवन में,
महा-चरित्रों से मिलती है
सीख अनोखी बचपन में।

उस दिन टीचर ने कक्षा में
भावुक  हो  समझाया  था,
गाँधी जी की आत्म-कथा का
हिस्सा  एक  सुनाया  था।

गाँधी जी ने भी बचपन में
घर  के  द्रव्य चुराए  थे,
किन्तु बाद में पछताकर
बीमार पिता ढिग आए थे।

सच-सच लिखकर बता दिया
चिपटे फिर जोर-जोर  रोए,
आगे अपने कर्म-क्षेत्र में
बीज  सत्य  के  ही  बोए।

पढ़ते ही यह पाठ अचानक
दीपक का मन भर आया,
लौट शाम को घर पर उसने
दादा  को  सच  बतलाया।

फूट-फूटकर दीपक रोया
दादा से माफी माँगी,
चोरी-झूठ त्यागकर उसमें
सच के प्रति निष्ठा जागी।

दादा जी ने विह्वल होकर
उसे  प्यार  से  दुलराया,
थमा तिजोरी की चाभी फिर
बड़ा  मनोबल  उकसाया।

एक पाठ की एक सीख ने
दीपक का जीवन बदला,
शिक्षा का अनमोल खजाना
करता सबका सदा भला।

-उमेश चौहान 
सम्पर्क: सी-II/ 195, सत्य मार्ग, चाणक्यपुरी, नई दिल्ली–110021 (मो. नं. +91-8826262223).

पूरा नाम: उमेश कुमार सिंह चौहान (यू. के. एस. चौहान)
जन्म: 9 अप्रैल, 1959 को उत्तर प्रदेश के लखनऊ जनपद के ग्राम दादूपुर में।
शिक्षा: एम. एससी. (वनस्पति विज्ञान), एम. ए. (हिन्दी), पी. जी. डिप्लोमा (पत्रकारिता व जनसंचार)।

साहित्यिक गतिविधियाँ:

प्रकाशित पुस्तकें: ‘गाँठ में लूँ बाँध थोड़ी चाँदनी’ (प्रेम-गीतों का संग्रह) - सत्साहित्य प्रकाशन, दिल्ली (2001), ‘दाना चुगते मुरगे’ (कविता-संग्रह) - सत्साहित्य प्रकाशन, दिल्ली (2004), ‘अक्कित्तम की प्रतिनिधि कविताएं’  (मलयालम के महाकवि अक्कित्तम की अनूदित कविताओं का संग्रह) - भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली (2009), ‘जिन्हें डर नहीं लगता’ (कविता-संग्रह) - शिल्पायन, दिल्ली (2009), एवं ‘जनतंत्र का अभिमन्यु’ (कविता – संग्रह) - भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली (2012), मई 2013 से हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र 'जनसंदेश टाइम्स' (लखनऊ, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी एवं गोरखपुर से प्रकाशित) में साप्ताहिक स्तम्भ-लेखन

संपादित पुस्तकें: 'जनमंच' (श्री सी.वी. आनन्दबोस के मलयालम उपन्यास 'नाट्टुकूट्टम' का हिन्दी अनुवाद) - शिल्पायन, दिल्ली (2013)

सम्मान: भाषा समन्वय वेदी, कालीकट द्वारा ‘अभय देव स्मारक भाषा समन्वय पुरस्कार’ (2009) तथा इफ्को द्वारा ‘राजभाषा सम्मान’ (2011)





Monday 18 August 2014

माखनचोर का जन्मदिन



मुरलीधर मथुराधिपति माधव मदनकिशोर. 
मेरे मन मन्दिर बसो मोहन माखनचोर. 

कृष्ण जन्माष्टमी पर हार्दिक बधाइयाँ !!

Sunday 16 March 2014

प्यार के रंग से भरो पिचकारी


प्यार के रंग से भरो पिचकारी
स्नेह से रँग दो दुनिया सारी 
ये रंग न जाने कोई जात न बोली
आप सभी को मुबारक हो यह होली !!

Friday 27 December 2013

चिड़िया कितनी प्यारी है


चिड़िया कितनी प्यारी है
मुझको सुबह उठाती है.
मुरगी बोले कुकड़ू-कुकड़ू
कोयल गीत सुनाती है.

तोता बोली रटता है
चोरों को डर लगता है.
छत के ऊपर बैठा कौआ
सबका स्वागत करता है.

सबसे सीधी मैना है
आँगन में इठलाती है.
गौरैया भी खूब फुदकती

हर बच्चे को भाती है.


उमेश चौहान 
सम्पर्क: सी-II195, सत्य मार्ग, चाणक्यपुरी, नई दिल्ली110021 (मो. नं. +91-8826262223)


पूरा नाम: उमेश कुमार सिंह चौहान (यू. के. एस. चौहान)
जन्म: 9 अप्रैल, 1959 को उत्तर प्रदेश के लखनऊ जनपद के ग्राम दादूपुर में।
शिक्षा: एम. एससी. (वनस्पति विज्ञान), एम.. (हिन्दी), पी. जी. डिप्लोमा (पत्रकारिता व जनसंचार)।

साहित्यिक गतिविधियाँ:

  • प्रकाशित पुस्तकें: गाँठ में लूँ बाँध थोड़ी चाँदनी (प्रेम-गीतों का संग्रह) - सत्साहित्य प्रकाशन, दिल्ली (2001), दाना चुगते मुरगे (कविता-संग्रह) - सत्साहित्य प्रकाशन, दिल्ली (2004), ‘अक्कित्तम की प्रतिनिधि कविताएं’  (मलयालम के महाकवि अक्कित्तम की अनूदित कविताओं का संग्रह) - भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली (2009),जिन्हें डर नहीं लगता (कविता-संग्रह) - शिल्पायन, दिल्ली (2009), एवं जनतंत्र का अभिमन्यु (कविता संग्रह) - भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली (2012), मई 2013 से हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र 'जनसंदेश टाइम्स' (लखनऊ, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी एवं गोरखपुर से प्रकाशित) में साप्ताहिक स्तम्भ-लेखन

  • संपादित पुस्तकें: 'जनमंच' (श्री सी.वी. आनन्दबोस के मलयालम उपन्यास 'नाट्टुकूट्टम' का हिन्दी अनुवाद) - शिल्पायन, दिल्ली (2013)

  • सम्मान: भाषा समन्वय वेदी, कालीकट द्वारा अभय देव स्मारक भाषा समन्वय पुरस्कार’ (2009) तथा इफ्को द्वारा राजभाषा सम्मान(2011)


Wednesday 13 November 2013

बच्चे बनाएंगे डाक टिकट के लिए पेंटिंग


यदि आप चाहते हैं कि आपकी बनाई हुई पेंटिंग डाक टिकट के रूप में जारी हो तो यह अवसर लेकर आया है डाक विभाग। डाक विभाग देशव्यापी स्तर पर ‘‘स्टैम्प डिजाइन‘‘ प्रतियोगिता करवा रहा है जिसमें सर्वश्रेष्ठ पेंटिंग को अगले वर्ष बाल दिवस पर डाक टिकट के रूप में जारी किया जायेगा। इस संबंध में जानकारी देते हुए इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि डाक विभाग वर्ष 1998 से यह आयोजन करवा रहा है और इसके माध्यम से डाक टिकटों के प्रति बच्चों एवं विद्यार्थियों की भागीदारी सुनिश्चित की जाती है ।

डाक निदेशक श्री यादव ने बताया कि इस वर्ष की थीम ''एक दिन अपने दादा-दादी के साथ'' है जिस पर विद्यार्थियों को पेंटिंग बनानी है। यह पेटिंग स्याही, वाटर कलर, आयल कलर या किसी अन्य माध्यम से बनायी जा सकती है। प्रतियोगी ड्रांइग पेपर, आर्ट पेपर या अन्य किसी भी प्रकार का पेपर पेंटिंग के लिए इस्तेमाल कर सकते है। प्रतिभागियों को उक्त विषय पर मौलिक डिजायन ही बनानी है। निदेशक डाक सेवाएं कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि सभी विद्यार्थियों को तीन समूहों में विभाजित किया गया है - कक्षा 4 तक के विद्यार्थी, कक्षा 5 से कक्षा 8 तक के विद्यार्थी एवं कक्षा 9 से कक्षा 12 तक के विद्यार्थी। सभी श्रेणियों में प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्तर पर क्रमशः 10,000, 6,000 एवं 4,000 रूपये के तीन-तीन पुरस्कार राष्ट्रीय स्तर पर दिये जायेंगे। राष्ट्रीय स्तर पर चुनी गयी पुरस्कृत प्रविष्टियों के आधार पर ही अगले वर्ष बाल दिवस पर डाक टिकट, प्रथम दिवस आवरण एवं मिनियेचर शीट इत्यादि का प्रकाशन किया जायेगा। 

निदेशक डाक सेवाएं, इलाहाबाद परिक्षेत्र, श्री कृष्ण कुमार यादव ने आगे बताया कि इलाहाबाद परिक्षेत्र के सभी डाक मण्डलों में उक्त प्रतियोगिता 16 नवम्बर 2013 दिन शनिवार को प्रातः 1100 बजे आयोजित होगी। यह प्रतियोगिता इलाहाबाद प्रधान डाकघर, वाराणसी प्रधान डाकघर, प्रतापगढ़ प्रधान डाकघर, जौनपुर प्रधान डाकघर, मिर्जापुर प्रधान डाकघर एवं गाजीपुर प्रधान डाकघर में आयोजित की जाएगी। 

Sunday 3 November 2013

जगमग-जगमग करते दीपक



जगमग-जगमग करते दीपक
लगते कितने मनहर प्यारे,
मानों आज उतर आये हैं
अम्बर से धरती पर तारे !

दीपों का त्योहार मनुज के
अतंर-तम को दूर करेगा,
दीपों का त्योहार मनुज के
नयनों में फिर स्नेह भरेगा!

धन आपस में बाँट-बूट कर
एक नया नाता जोड़ेंगे,
और उमंगों की फुलझड़ियाँ
घर-घर में सुख से छोड़ेंगे !

दीपावलि का स्वागत करने
आओ हम भी दीप जलाएँ,
दीपावलि का स्वागत करने
आओ हम भी नाचे गाएँ !

-महेन्द्र भटनागर-

Sunday 13 October 2013

हिन्दी बाल-काव्य को मध्यप्रदेश का योगदान

म ध्यप्रदेश साहित्य-सृजन का अत्यन्त उर्वर  क्षेत्र है। साहित्य की विविध विधाओं का    यहां निरन्तर विकास हुआ है और आज   भी हो रहा है।
मध्यप्रदेश का श्रेष्ठ बाल-साहित्य भी रेखांकित करने योग्य है। बाल-साहित्य के अन्तर्गत बाल-काव्य का उल्लेख विशेष रूप से किया जा सकता है। अनेक प्रमुख बाल-काव्य प्रणेताओं की जन्मभूमि या कर्मभूमि होने का गौरव मध्यप्रदेश को प्राप्त है। इस पर साभार प्रस्तुत है वरिष्ठ बाल-साहित्यकार  विनोद चन्द्र पाण्डेय 'विनोद' का एक महत्वपूर्ण आलेख.

कामता प्रसाद गुरु का नाम हिन्दी के प्रारंभिक बाल-काव्य के रचनाकारों में प्रमुख है। उनका जन्म सन् 1875 ई. में ग्राम परकोटा, जिला सागर में हुआ था। यद्यपि एक व्याकरणविद् के रूप में उनकी ख्याति अधिक है तथापि उन्होंने अनेक बाल-कविताओं का सृजन किया। एक उदाहरण प्रस्तुत है-
यह सुन्दर छड़ी हमारी।
है हमें बहुत ही प्यारी॥
यह खेल समय हर्षाती।
मन में है साहस लाती॥
तन में अति जोर जगाती।
उपयोगी है यह भारी।
यह सुन्दर छड़ी हमारी॥
पं. सुखराम चौबे गुणाकर का भी नाम मध्यप्रदेश के बाल-काव्य प्रणेताओं में उल्लेखनीय है। इनका जन्म सन् 1867 ई. में ग्राम रहली, जिला सागर में हुआ था। अध्यापन-कार्य करते हुए भी उन्होंने बच्चों के लिए प्रिय कविताएं लिखी थीं। एक बाल-कविता की कुछ पंक्तियां उध्दृत हैं-
यह छाता है सुखदाई। मैं इसे न दूँ भाई।
जब घर से बाहर जाता था बाहर से घर आता।
यह संग में आता जाता। रखता है सदा मिताई।
लोचन प्रसाद पाण्डेय का नाम भी मध्यप्रदेश के बाल-काव्यकारों में आदर के साथ लिया जाता है। उन्होंने बाल-विनोद, बालिका-विनोद, पद्य-पुष्पांजलि आदि बालोपयोगी कविता-पुस्तकों का प्रणयन किया एक कविता की कुछ पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं-
खेल-समय खेलो तुम सब मिल, करो समय पर अपना काम।
उद्योगी हर्षित होने की है यह प्यारी रीति ललाम।
जो कुछ करते हो मन देकर, करो सदा तुम सुखदाई।
काम अधूरे कभी जगत में ठीक नहीं होते भाई।
पं. लल्ली प्रसाद पाण्डेय का जन्म सन् 1886 ई. में सानोदा, सागर (मध्य भारत) में हुआ था। बच्चों की प्रतिष्ठित पत्रिका 'बालसखा' का सुदीर्घकाल तक सम्पादन कर अनेक बाल साहित्यकारों का निर्माण किया। वह स्वयं भी बाल साहित्य का सृजन करते रहे। एक बाल-कविता की कुछ पंक्तियाँ उध्दरणीय है-
ऑंखों पर चश्मा है सुन्दर, सिर पर गाँधी टोपी है।
और गले में पड़ा दुपट्टा, निकली बाहर चोटी है।
टेबिल लगा बैठ कुर्सी पर, लिखते हैं वानर जी लेख।
करते है कविता का कौशल, रहती जिसमें मीन न मेख।
देवी प्रसाद गुप्त 'कुसुमाकर' का जन्म सन् 1893 ई. में ग्राम बनखेड़ी, जिला होशंगाबाद में हुआ था। यद्यपि व्यवसाय से वे वकील थे तथापि बच्चों के लिए उन्होंने अनेक सुन्दर कविताएँ लिखीं। एक कविता की कुछ पंक्तियाँ उल्लेखनीय हैं-
दादा का जब मुँह चलता है, मुझे हंसी तब आती है।
अम्मा मेरे कान खींचकर, मुझको डाँट बताती है।
किन्तु हँसी बढ़ती जाती है, मेरे वश की बात नहीं।
चलते देख पपोले मुख को, रूक सकती है हँसी कहीं।

हिन्दी के बाल-काव्य प्रणेताओं में सभा मोहन अवधिया स्वर्ण सहोदर का नाम अत्यन्त सम्मानपूर्वक लिया जाता है। उनका जन्म सन् 1902 ई. में शहापुरा, जिला मण्डला (मध्यप्रदेश) में हुआ था। वह शिक्षण कार्य से जुड़े रहे और निरन्तर बाल-साहित्य में साधनारत रहे। उन्होंने मनोरंजक, प्रेरक और ज्ञानवर्धक बाल-कविताएं लिखी हैं। कुछ काव्य पंक्तियाँ उल्लेखनीय हैं-
नटखट हम हाँ, नटखट हम। करने निकले खटपट  हम।
आ गये लड़के या गये हम। बन्दर देख लुभा गये हम।
बन्दर को बिजकावें हम। बन्दर दौड़ा भागे हम।
बच गये लड़के, बच गये हम।
ठाकुर गोपाल शरणसिंह हिन्दी के प्रमुख कवि माने जाते हैं। उनका जन्म सन् 1891 ई. में रीवा (म.प्र.) में हुआ था। उन्होंने कुछ बालोपयोगी कविताएं भी लिखी हैं। एक उदाहरण प्रस्तुत है-
सुन्दर सजीला चटकीला वायुयान एक,
भैया हरे कागज का आज मैं बनाऊँगा।
चढ़ के उसी पै सैर नभ की करूँगा खूब,
बादल के साथ-साथ उसको उड़ाऊँगा।
मन्द-मन्द चाल से चलाऊँगा उसे मैं वहाँ,
चहक-चहक चिड़ियों के संग मैं गाऊंगा।
चन्द्र का खिलौना, मृग छोना वह छीन लूंगा।
भैया को गगन की तरैया तोड़ लाऊँगा।
श्रीमती सुभद्राकुमारी चौहान हिन्दी की सुप्रतिष्ठित कवयित्री हैं। यद्यपि सन् 1904 ई. में उनका जन्म प्रयाग (उ.प्र.) में हुआ था, तथापि उनका विवाह जबलपुर के सुप्रसिध्द वकील लक्ष्मणसिंह चौहान से हुआ था। उनकी बचपन शीर्षक बाल कविता अत्यधिक लोकप्रिय है। उसकी कुछ पंक्तियाँ विशेष रूप से पठनीय हैं-
मैं बचपन को बुला रही थी, बोल उठी बिटिया मेरी।
नन्दन-वन-सी फूल उठी वह, छोटी-सी कुटिया मेरी।
'माँ ओ' कहकर बुला रही थी, मिट्टी खाकर आई थी।
कुछ मुँह में कुछ लिए हाथ में, मुझे खिलाने लाई थी।
मैंने पूछा- 'यह क्या लाई', बोल उठी वह 'माँ काओ'
फूल-फूल मैं उठी खुशी से, मैंने कहा 'तुम्हीं खाओ।'
कविवर गौरीशंकर 'लहरी' का जन्म सन् 1909 ई. में सागर में हुआ था। वह मध्यप्रदेश के सूचना विभाग में कार्यरत रहे। उन्होंने बाल-कविताओं का सृजन भी किया। कुछ काव्य पंक्तियाँ उल्लिखित हैं-
बोली हवा बीज से उस दिन, चलो घू्मने मेरे साथ।
दूर-दूर के देश दिखाऊँ, जाने क्या लग जाये हाथ।
बीज आ गया इन बातों में, खुश हो घर से निकल पड़ा।
गया नहीं था बहुत दूर तब, मिट्टी ने उसको पकड़ा।

अमृतलाल दुबे का जन्म 1908 ई. में जबेरा, जिला दमोह (मध्यप्रदेश) में हुआ था। उन्होंने शिक्षा विभाग में कार्य किया और बालोपयोगी कविताओं की रचना की। एक बाल-कविता का यह अंश दृष्टव्य है-
शेर कहे मैं वन का राजा, खून पिया करता हूँ ताजा।
यह पहाड़ मेरी दहाड़ से, गूँजे, काँपे, थराए।
दुनिया मुझसे डर जाए।
साहित्यकार रामानुजलाल श्रीवास्तव का जन्म सन् 1898 ई. में सिहोरा (मध्य भारत) में हुआ था। इन्होंने बाल-कविताएँ भी लिखी हैं, जो 'बालसखा' पत्रिका में प्रकाशित होती रहती थी। बालकों को सन्देश देते हुए उन्होंने कहा था-
इसी भाँति तुम विद्या पढ़कर सुन्दर दीपक बन जाओ।
अज्ञानी के शून्य हृदय में ज्ञान-उजाला फैलाओ॥

पं. माखनलाल चतुर्वेदी 'एक भारतीय आत्मा' राष्ट्रीय भावधारा के प्रमुख कवि हैं। इनका जन्म सन् 1889 ई. में बाबई, जिला होशंगाबाद में हुआ था। खण्डवा में रहकर 'कर्मवीर' पत्रिका का सम्पादन करते थे। उनकी कुछ कविताएँ बालोपयोगी भी हैं। एक उदाहरण प्रस्तुत हैं-
ले लो दो आने के चार। लड्डू राजगिरे के यार।
यह है पृथ्वी जैसे गोल। ढुलक पड़ेंगे गोल-मटोल।
इनके मीठे स्वादों में ही बन जाता है इनका मोल।
दामों का मत करो विचार। ले लो दो आने के चार।
एकांकी सम्राट डॉ. रामकुमार वर्मा का जन्म स्थान नरसिंहपुर (मध्यभारत) था। इनका जन्म सन् 1905 ई. में हुआ था। यह इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष रहे। वहीं रहकर इन्होंने साहित्य-साधना की। इनकी बाल कविताएँ 'चमचम', 'शिश'ु और बालसखा में प्रकाशित होती थी। एक बालोपयोगी कविता उदाहरण स्वरूप उध्दृत की जा रही है-
प्रभुवर सूरज को चमकाकर, रोज सबेरे देते भेज।
काम घूमने का सिखलाकर, भर देते हो उसमें तेज॥
इसी तरह मुझको भी अब सब, काम खूब सिखला देना।
मुझमें अपना तेज डालकर, दुनिया में चमका देना॥
रामेश्वर गुरु 'कुमार हृदय' की बाल-काव्य साधना अविस्मरणीय है। उनका जन्म सन् 1914 ई. को जबलपुर में हुआ था। उनकी बाल कविताएं बालसखा, शिशु और खिलौना आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित होती थीं। उनके एक अभिनय गीत का यह अंश अवलोकनीय है-
राजा (पहले कैदी से)
क्यों तुम पड़े कैद में जाकर,
बतलाओ कारण समझाकर।
पहला कैदी (हाथ जोड़कर)
लोगों ने दी झूठ गवाही।
लाए मुझको पकड़ सिपाही।
दूसरा कैदी- (गिड़गिड़ाकर पैरों पर पड़ते हुए)
वह हाकिम था पूरा फंदी।
जिसने मुझे बनाया बंदी।
लक्ष्मी प्रसाद मिश्र 'कवि-हृदय' का जन्म सन् 1913 ई. में सागर में हुआ था। उन्होंने बाल कविताओं की रचना की जिनका प्रकाशन तत्कालीन अनेक बाल पत्रिकाओं की रचना की जिनका प्रकाशन तत्कालीन अनेक बाल-पत्रिकाओं में हुआ। उनकी बाल कविता का एक उदाहरण दृष्टव्य है-
हरे-भरे मैदान हमारे। लगते हैं हमको अति प्यारे।
खेलों की हरियाली प्यारी। बागों की है शोभा न्यारी॥
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी मध्यप्रदेश (अब छत्तीसगढ़) के खैरागढ़ के निवासी थे। सरस्वती पत्रिका का सम्पादन उन्होंने दीर्घकाल तक किया था। उनकी बाल कविताएं भी बच्चों में लोकप्रिय थीं। एक कविता का अंश प्रस्तुत है-
बुढ़िया चला रही थी चक्की। पूरे साठ वर्ष की पक्की।
दोने में थी रखी मिठाई। उस पर उड़कर मक्खी आई।
विनय मोहन शर्मा 'वीरात्मा' का जन्म सन् 1905 ई. में करकवेल मध्यप्रदेश में हुआ था। इनका वास्तविक नाम शुकदेव प्रसाद तिवारी था। उन्होंने 'वीरात्मा' नाम से अनेक बाल कविताओं का सृजन किया। एक बाल कविता उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत है-
मधुर गीत गा नींद बुलाना। थपकी दे दे मुझे सुलाना।
मेरा जरा विकल हो जाना। तेरा टप-टप अश्रु गिराना।
वह अब तो मुझे रूलाता है। माँ! तेरी याद दिलाता है।

ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी का जन्म सन् 1908 में ई. में ग्राम करेली, जिला नरसिंहपुर (मध्य प्रदेश) में हुआ था। उन्होंने बाल गीतों की भी रचना की। उनके एक बाल गीत का अंश उल्लिखित है-
अम्मा अम्मा मुझे बता दे यह चमकीले तारे।
सारी रात छिपा ही खेला करते हैं बेचारे।

सन् 1908 ई. में जन्मे रूद्रदत्त मिश्र मध्यप्रदेश के सूचना विभाग में कार्यरत रहे। उन्होंने उल्लेखनीय बाल काव्य साधना की। उनकी एक बाल कविता उध्दरणीय है-
नहीं किसी का लेना-देना, नहीं किसी का खाना।
कंकड़-पत्थर जो मिल जाए, वही हमारा खाना।
 नहीं घोंसला कहीं हमारा, नहीं हमारा घर है।
जहां बैठकर रात बितावें, वही हमारा घर है।
शांति चाहते हम दुनिया में, झगड़ा हमें न भाता।
हम सबका ही हित करते हैं, रखते अच्छा नाता।
बाबूलाल जैन 'जलज' का जन्म सन् 1909 ई. में देवरीकलां, जिला सागर मेें हुआ था। उनका बाल-काव्य सृजन भी सराहनीय है। उनकी एक बाल प्रार्थना उध्दृत है:-
प्रभुवर दीजै यह वरदान।
शीलवान विनयी हम होवें। कभी फूट के बीज न बोवें।
दीन जनों के दु:ख को खोवें। करें सदा सबका ही मान।
गुणी जनों की संगति पावें। उच्च विचार सदा मन आवें।
लोभ मोह से चित्त हटावें। समझें सबको सदा समान।
हिन्दी बाल साहित्य साधकों में नर्मदा प्रसाद खरे का नाम सुविख्यात है। उनका जन्म सन् 1913 ई. जबलपुर में हुआ था। उनकी अनेक बाल काव्य कृतियां प्रकाशित हुई हैं। तितली के संबंध में उनकी एक बाल कविता विशेष रूप से पठनीय है-
रंग-बिरंगे पंख तुम्हारे, सबके मन को भाते हैं।
कलियां देख तुम्हें खुश होतीं, फूल देख मुस्काते हैं।
रंग-बिरंगे पंख तुम्हारे, सबका मन ललचाते हैं।
तितली रानी, तितली रानी कहकर सभी बुलाते हैं।
पास नहीं क्यों आती तितली, दूर-दूर क्यों रहती हो।
फूल-फूल के कानों में तुम जा-जाकर क्या कहती हो?
सन् 1911 ई. में जिला सागर, (मध्यप्रदेश) में जन्मे देवीदयाल चतुर्वेदी 'मस्त' कुछ समय तक 'बाल सखा' पत्रिका के संपादक रहे। उन्होंने स्वयं भी बाल कविताओं की रचना की। उनकी एक बाल कविता की कुछ पंक्तियां उल्लेखनीय हैं-
टन-टन टन-टन घंटा बजता, शाला को हम जाते हैं।
वहां पहुंचकर पंडित जी को हम सब शीश झुकाते हैं।
अच्छी-अच्छी बातें हमको पंडित जी बतलाते हैं।
रोज कहानी, गीत बहुत से वह हमको सिखलाते हैं।
अब्दुल रहमान सागरी का जन्म सन् 1911 ई. में ग्राम गढ़कोटा, जिला सागर में हुआ था। बच्चों के लिए उन्होंने श्रेष्ठ कविताएं लिखी हैं। जागरण का संदेश देते हुए उन्होंने आह्वान किया है-
जागो और जगाओ।
बीत चुकीं आलस की घड़ियां,
जाग उठीं अब सारी चिड़ियां।
जागे फूल खिलीं अब कलियां॥
तुम भी जागो आओ। जागो और जगाओ।
उत्तम चन्द्र श्रीवास्तव का कार्यक्षेत्र मध्य भारत था। उनका जन्म सन् 1916 ई. में हुआ था। उनकी एक बाल कविता का अंश उध्दृत है-
नया साल आया है भाई खुशियां नई मनाने को।
अपना और सभी का जीवन सुन्दर सुखी बनाने को॥

सन् 1918 ई. में जबलपुर में जन्मे डॉ. राजेश्वर गुरु भी बच्चों के श्रेष्ठ कवि रहे हैं। उनका एक शिशुगीत प्रस्तुत है-
बिल्ली मेरी प्यारी मौसी, कौआ मेरा मामा।
बिल्ली पहने फ्राक गरारा, कौआ जी पाजामा।
लाला जगदलपुरी का जन्म सन् 1920 ई. में जगदलपुर, जिला बस्तर में हुआ था। उनका बाल-काव्य भी सराहनीय है। एक उदाहरण दृष्टव्य है-
नन्ही-सी माचिस की तीली।
रगड़े खाती आग उगलती। उजियाला देने को जलती।
कहती मुझसे सही काम लो। आग संभाले नहीं संभलती।

सन् 1922 ई. में बिलहरा, सागर (मध्यप्रदेश) में जन्मे कृष्णकान्त तेलंग ने भी बच्चों की कविताएँ लिखी हैं। एक उदाहरण देखिए-
लम्बी-लम्बी भूरी मोटी बाबा की थीं मूँछे।
मानो होठों पर रक्खी हों, ला घोड़े की पूँछें।
रामभरोसे गुप्त 'राकेश' का जन्म सन् 1925 ई. में आलमपुर जिला भिण्ड (मध्यप्रदेश) में हुआ। उनकी बाल-काव्य साधना प्रशंसनीय है। एक बाल-कविता की कुछ पंक्तियाँ अवलोकनार्थ प्रस्तुत हैं-
देशभक्ति के गीत सुनाते, वीर साहसी सैनिक हम।
कभी न कड़वे वचन बोलते, वाणी रखते सदा नरम॥
डॉ. हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य के सुप्रतिष्ठित रचनाकार हैं। उनका जन्म सन् 1940 ई. में नागोद, जिला सतना में हुआ। उन्होंने बाल-कविताएँ भी लिखी हैं। कुछ पंक्तियाँ उध्दरणीय है-
कविवर तोंदूराम बुझक्कड़ कभी-कभी आ जाते हैं।
खड़ी निरन्तर रहती चोटी, आंखें धँसी मिचमिची छोटी।
नाक चायदानी की टोंटी,
अंग-अंग की छटा निराली, भारी तोंद हिलाते हैं।
सन् 1945 ई. में ग्राम रामपुर कला, परगना सबलगढ़, जिला मुरैना (मध्यप्रदेश) में जन्मे आााद रामपुरी की भी एक बाल-कविता अवलोकनीय है-
लंगड़ा तोतापरी कठौआ खुशियों भरे दशहरी आम।
रस गुब्बारे गाल फुलाए सजधज खड़े सुनहरी आम।
राजा चौरसिया ने प्रभूत बाल-काव्य की रचना की है।
उपर्युक्त रचनाकारों के अतिरिक्त जगदीश तोमर, देवेन्द्र दीपक, परशुराम शुक्ल, अभिनव तैलंग, वीरेन्द्र मिश्र, अंशु शुक्ला, अशोक आनंद, अहद प्रकाश, गफूर स्नेही, भीष्मसिंह चौहान, गोवर्धन शर्मा, नयन कुमार राठी, ललित कुमार उपाध्याय, आशा शर्मा, नरेन्द्रनाथ लाहा, बटूक चतुर्वेदी, रमेशचन्द्र शाह, राम वल्लभ आचार्य, लक्ष्मीनारायण पयोधि, उषा जायसवाल, पदमा चौगांवकर आदि ने भी बाल काव्य की समृध्दि में अपना बहुमूल्य योगदान दिया है, किन्तु सभी की बाल कविताओं के उध्दरण देना सम्भव नहीं प्रतीत होता।
मध्यप्रदेश से प्रकाशित बाल-पत्रिकाओं शक्तिपुत्र, चकमक, समझ-झरोखा, देवपुत्र, अपना बचपन और स्नेह आदि तथा उनके संपादकों ने बाल-काव्य के विकास में महती भूमिका निभाई है। विशेष रूप से कृष्णकुमार अष्ठाना और महेश सक्सेना का योगदान सराहनीय है। भोपाल में स्थापित बाल कल्याण एवं बाल साहित्य शोध केन्द्र तथा इन्दौर में स्थापित बाल साहित्य सृजन पीठ का अवदान विस्मृत नहीं किया जा सकता। अत: इसमें कोई सन्देह नहीं कि हिन्दी बाल-काव्य को मध्यप्रदेश का योगदान रेखांकित करने योग्य है। 

(मध्यप्रदेश संदेश से साभार)

Friday 26 July 2013

इन्हें भी जानिए : रमेश तैलंग, वरिष्ठ बाल-साहित्यकार

रमेश तैलंग ( वरिष्ठ बाल-साहित्यकार)

जन्म की तारीख : दो जून, 1946

जन्मस्थान : टीकमगढ़ (मध्य प्रदेश)



पारिवारिक परिचय:

माता: श्रीमती कौशल्या

पिता: स्व. श्री हरीकृष्ण देव

पत्नी: श्रीमती कमलेश तैलंग

पुत्री: सुश्री सुष्मिता तैलंग

पुत्र: श्री सचिन तैलंग, पुत्रवधु: डॉ. गरिमा तैलंग

पौत्री: प्लाक्षा

शिक्षा: एम.ए/परास्नातक -हिंदी साहित्य, समाज शास्त्र (जीवाजी विश्विद्यालय-ग्वालियर)

कार्मिक प्रबंध एवं औद्योगिक संवंध में पी.जी.डिप्लोमा.

भाषाज्ञान: हिंदी, अंग्रेजी.



प्रकाशित कृतियाँ :

बाल/किशोर साहित्य :

हिंदी के नए बाल गीत (देवेन्द्र कुमार तथा प्रकाश मनु के साथ)-1994; उड़न खटोले आ (बालगीत)-1994; एक चपाती तथा अन्य बाल कविताएँ-1998; कनेर के फूल(बालगीत)-1998; टिन्नीजी ओ टिन्नीजी-2005, (बालगीत); इक्यावन बालगीत-2008; लड्डू मोतीचूर के-2008 (101 नटखट बालगीत); मेरे प्रिय बाल गीत-2010, (163 बालगीत); विश्व प्रसिद्ध किशोर कथाएं (देवेन्द्र कुमार के साथ)-2009 ; अमर विश्व किशोर कथाएं (देवेन्द्र कुमार के साथ)-2009

सम्मान व पुरस्कार : एक चपाती तह अन्य बाल कविताएँ पर हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ; कनेर के फूल पर हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार; हरी भरी धरती (बाल गीत संग्रह) पर प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली (भारत सरकार) द्वारा प्रथम भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार



संपर्क का पता :

सी टॉवर, फ्लेट - एच-2/1002 क्लासिक रेजीडेंसी, राजनगर एक्सटेंशन, गाजियाबाद-201003

टेलीफोन/मोबाइल नम्बर : +91-9211688748, 09716041040

ई-मेल : rtailang@gmail.com, rameshtailang@yahoo.com

ब्लॉग :http://rameshtailang.blogspot.in/, http://nanikichiththian.blogspot.com/  

Tuesday 23 July 2013

इन्हें भी जानिए : दीनदयाल शर्मा, वरिष्ठ बाल-साहित्यकार

दीनदयाल शर्मा, वरिष्ठ बाल-साहित्यकार
जन्म: 15 जुलाई 1956 (प्रमाण पत्र के अनुसार) जन्म स्थान: गांव- जसाना, तहसील- नोहर, जिला- हनुमानगढ़ (राज.) शिक्षा: एम. कॉम. (व्यावसायिक प्रशासन, 1981), पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा (राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर 1985), स्काउट मास्टर बेसिक कोर्स (1979, 1990) लेखन: हिन्दी व राजस्थानी दोनों भाषाओं में 1975 से सतत सृजन। मूल विधा: बाल साहित्य अन्य: व्यंग्य, कथा, कविता, नाटक, एकांकी, रूपक, सामयिक वार्ता आदि। विशेष: =हिन्दी व राजस्थानी में दो दर्जन पुस्तकें प्रकाशित। =देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अनेक रचनाएं प्रकाशित (1975 से) =महामहिम राष्ट्रपति डॉ. कलाम द्वारा अंग्रेजी में अनुदित बाल नाट्य कृति 'द ड्रीम्स' का 17 नवम्बर 2005 को लोकार्पण। =बाल दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली में महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल की ओर से विशेष सम्मान, 2007 =आकाशवाणी से हास्य व्यंग्य, कहानी, कविता, रूपक, नाटक आदि प्रसारित। =दूरदर्शन से साक्षात्कार एवं कविताएं प्रसारित। =काव्य गोष्ठियों एवं कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ।=गंगानगर पत्रिका (1972 से) प्रताप केसरी (23 अप्रेल 1979 से) और राजस्थान पत्रिका के लिए समाचार संकलन (1972 से 1982 के मध्य)=राष्ट्रदूत, बीकानेर, प्रताप केसरी, श्रीगंगानगर, दैनिक तेज, हनुमानगढ, और दैनिक तेज केसरी, हनुमानगढ़ के लिए स्तंभ लेखन। (1979 से 1982 के मध्य) =बी.जे.एस.रामपुरिया जैन महाविद्यालय, बीकानेर में हिन्दी संपादक, 1979=जैन पी.जी.कॉलेज, गंगाशहर, बीकानेर में हिन्दी संपादक, 1981=संस्थापक/अध्यक्ष : राजस्थान बाल कल्याण परिषद्, हनुमानगढ़, राज., 1986 =संस्थापक/अध्यक्ष : राजस्थान साहित्य परिषद, हनुमानगढ़, राज. 1984=साहित्य सम्पादक (मानद): टाबर टोल़ी पाक्षिक (बच्चों का हिन्दी अखबार), बाल दिवस 2003 से लगातार=सम्पादक (मानद): कानिया मानिया कुर्र (बच्चों का राजस्थानी अखबार) =डॉ. प्रभाकर माचवे : सौ दृष्टिकोण में एक आलेख संकलित।=शिक्षा विभाग राजस्थान के शिक्षक दिवस प्रकाशनों में रचनाएं प्रकाशित। =स्कूल एवं कॉलेज की अनेक स्मारिकाओं का सम्पादन।=बाल साहित्य की अनेक पुस्तकों के भूमिका लेखक। =जिला साक्षरता समिति हनुमानगढ़ की ओर से प्रकाशित मासिक मुख पत्र आखर भटनेर का सम्पादन। साक्षरता में उपलब्धियां : =जिला संपूर्ण साक्षरता समिति हनुमानगढ़ के 'भटनेरÓ परियोजना प्रस्ताव, =उत्तर साक्षरता परियोजना प्रस्ताव तथा सतत् शिक्षा परियोजना प्रस्ताव का निर्माण, लेखन और संपादन, =नवसाक्षरों के पठन हेतु 'आखर मेड़ीÓ भाग-1, भाग-2, भाग-3 का निर्माण - सम्पादन, =संदर्भ व्यक्ति, =मीडिया सैल एवं =कौर ग्रुप का सदस्य, =आखर गांव, =आखर राजस्थान तथा =नीले घोड़े का असवार नाम की तीन भित्ति पत्रिकाओं का निर्माण, =समय-समय पर तहसील, जिला एवं राज्य स्तरीय कार्यशालाओं तथा कला जत्थे में सक्रिय भागीदारी। =जिला साक्षरता समिति की ओर से मासिक मुख पत्र 'आखर भटनेरÓ का कई वर्षों तक सफल संपादन। प्रकाशित कृतियां: (हिन्दी में) =चिंटू-पिंटू की सूझ (बाल कहानियां चार संस्करण)=चमत्कारी चूर्ण (बाल कहानियां) =पापा झूठ नहीं बोलते (बाल कहानियां)=कर दो बस्ता हल्का (बाल काव्य)=सूरज एक सितारा है (बाल काव्य)=सपने (बाल एकांकी)=बड़ों के बचपन की कहानियां (महापुरुषों की प्रेरणाप्रद घटनाएं)=इक्यावन बाल पहेलियाँ (बाल पहेलियां)=फैसला (बाल नाटक)=नानी तू है कैसी नानी=चूं-चूं (शिशु कविताएँ)=राजस्थानी बाल साहित्य:एक दृष्टि=फैसला बदल गया (नवसाक्षर साहित्य) =मैं उल्लू हूं (हास्य व्यंग्य दो संस्करण 1987,1993) =सारी खुदाई एक तरफ (हास्य व्यंग्य संग्रह) (अंग्रेजी में) =द ड्रीम्स, राजस्थानी साहित्य:=चन्दर री चतराई (बाल कहानियां)=टाबर टोल़ी (बाल कहानियां) =शंखेसर रा सींग (बाल नाटक, दो संस्करण)=तूं कांईं बणसी (बाल एकांकी)=म्हारा गुरुजी (बाल एकांकी)=डुक पच्चीसी (हास्य काव्य) =गिदगिदी (हास्य काव्य) =सुणौ के स्याणौ (हास्य काव्य, दो संस्करण)=स्यांति (कथा)=घर बिगाड़ै गुस्सौ (हास्य)=घणी स्याणप (हास्य)=बात रा दाम (तीन बाल नाटक)=बाळपणै री बातां प्रसारित रेडियो नाटक: =मेरा कसूर क्या है=रिश्तों का मोल =अंधेरे की तस्वीर=पगली=और थाली बज उठी =अपने-अपने सुख =जंग जारी है =उसकी सजा =छोटी-छोटी बातें=और सब कहते रहे =पगड़ी की लाज=मुझे माफ कर दो =घर की रोशनी प्रसारित झलकी: =मास्टर फकीरचंद =चक्कर =गोलमाल प्रसारित बाल नाटक: =फैसला =शंखेश्वर के सींग =परीक्षा =बिगड़ग्यौ बबलू =म्हारा गुरुजी प्रसारित रूपक: =सिंधु घाटी की समकालीन सभ्यता: कालीबंगा मंचित नाटक : =बात रा दाम =जैÓरीली नागण : शराब =म्हारा गुरुजी =बिगड़ग्यौ बबलू =मास्टर फकीरचंद =सैंÓ संू बड़ी पढाई =तंू कांईं बणसी पुरस्कार और सम्मान : =राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर से हिन्दी बाल कथा संग्रह पर डॉ.शम्भूदयाल सक्सेना बाल साहित्य पुरस्कार (1988-89) =राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर से राजस्थानी बाल नाटक पर पं. जवाहरलाल नेहरू बाल साहित्य पुरस्कार (1998-99) =बाल साहित्य की उल्लेखनीय सेवाओं के लिए भारतीय बाल कल्याण संस्थान, कानपुर (उत्तरप्रदेश) की ओर से बाल साहित्य सम्मान, 1998 =हिन्दी बाल कथा पर अखिल भारतीय शकुन्तला सिरोठिया बाल कहानी पुरस्कार, इलाहाबाद (2000) =राष्ट्रीय बाल साहित्य समारोह, चित्तौडग़ढ़ से राजस्थानी बाल एकांकी पर चंद्रसिंह बिरकाली राजस्थानी बाल साहित्य का प्रथम पुरस्कार (1998-99) =हिन्दी बाल कथा पर कमला चौहान स्मृति ट्रस्ट, देहरादून (उत्तरांचल) की ओर से सर्वश्रेष्ठ बाल साहित्यकार पुरस्कार (2001) =बाल साहित्य की उल्लेखनीय सेवाओं पर अखिल भारतीय साहित्य एवं कला विकास मंच, रावतसर (1999) से सार्वजनिक सम्मान। =पंडित भूपनारायण दीक्षित बाल साहित्य पुरस्कार, हरदोई, उत्तरप्रदेश (1998-99) =नागरी बाल साहित्य संस्थान, बलिया, उत्तरप्रदेश से सम्मान (1998-99) =पं. हरप्रसाद पाठक स्मृति बाल संस्थान, कानपुर से सम्मान (1998-99) =रूचिर साहित्य समिति, सोजतशहर, पाली, राज. की ओर से बाल साहित्य की उल्लेखनीय सेवाओं के लिए सार्वजनिक सम्मान (1998-99) =ग्राम पंचायत, जण्डावाली, हनुमानगढ़, राज., (1997) नगर परिषद्, हनुमानगढ़ (1989) और जिला प्रशासन, हनुमानगढ़ (1998) की ओर से सार्वजनिक सम्मान। =रोवर स्काउट (सेवा कार्य / साइकिल हाइक) में राज्य स्तरीय पुरस्कार (1979) =महाविद्यालय में अध्ययन के दौरान कविता, कहानी, कार्टून, एकाभिनय, श्रेष्ठ हस्तलेखन व कुश्ती प्रतियोगिता में प्रथम / द्वितीय =अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस पर राज्य में सर्वाधिक पुस्तक दानदाता के राज्य स्तरीय पुरस्कार से बिड़ला सभागार, जयपुर में सार्वजनिक सम्मान (2005) =बाल साहित्य की उल्लेखनीय सेवाओं के लिए भटनेर महर्षि गौतम सेवा समिति, हनुमानगढ़ की ओर से सम्मानित (2005) =बाल साहित्य की उल्लेखनीय सेवाओं के लिए राजस्थान ब्राह्मण महासभा की ओर से सार्वजनिक सम्मान (2009) =बाल साहित्य की उल्लेखनीय सेवाओं के लिए भटनेर महर्षि गौतम सेवा समिति, हनुमानगढ़ की ओर से सम्मानित (2009) =सृजनशील बाल साहित्य रचनाकारों की राष्ट्रीय संस्था 'बाल चेतनाÓ, जयपुर की ओर से राजस्थानी बाल साहित्य की सेवाओं के लिए 'सीतादेवी अखिल भारतीय श्रीवास्तव सम्मानÓ (2006) =राजस्थानी बाल साहित्यिक सेवाओं के लिए प्रयास संस्थान, चूरू की ओर से सार्वजनिक सम्मान (2010) संपर्क: 10/22, आर.एच.बी. कॉलोनी, हनुमानगढ़ जं., पिन कोड- 335512, राजस्थान, भारत मोबाइल - 09414514666

ब्लॉग : http://deendayalsharma.blogspot.in/, http://taabartoli.blogspot.com/ 

Sunday 10 February 2013

लड्डू-बर्फी की शादी


जिस दिन होना थी लड्डू की,
बर्फीजी से शादी,
बर्फी बहुत कुरूप किसी ने,
 झूठी बात उड़ा दी|

गुस्से के मारे लड्डूजी,
जोरों से चिल्लाये|

बिना किसी से पूँछतांछ ,
वापस बारात ले आये|

लड्डू के दादा रसगुल्ला,
बर्फी के घर आये|

बर्फीजी को देख सामने ,
मन ही मन मुस्काये|

बर्फी तो इतनी सुंदर थी,
जैसे कोई परी हो|

पंख लगाकर आसमान
से, अभी अभी उतरी हो|

रसगुल्लाजी फिदा हो गये,
उस सुंदर बर्फी पर|

ब्याह कराकर उसको लाये,
वे चटपट अपने घर|

लड्डू क्वांरा बेचारा अब,
ड़ता रसगुल्ला से|

रसगुल्ला मुस्कराता रहता,
बिना किसी हल्ला के|

सुनी सुनाई बातों पर तुम,
कभी ध्यान मत देना|

क्या सच है क्या झूठ सुनिश्चित ,
खुद जाकर‌ कर लेना|

प्रभु दयाल श्रीवास्तव, छिंदवाडा, मध्य प्रदेश