Sunday 16 March 2014

प्यार के रंग से भरो पिचकारी


प्यार के रंग से भरो पिचकारी
स्नेह से रँग दो दुनिया सारी 
ये रंग न जाने कोई जात न बोली
आप सभी को मुबारक हो यह होली !!

Friday 27 December 2013

चिड़िया कितनी प्यारी है


चिड़िया कितनी प्यारी है
मुझको सुबह उठाती है.
मुरगी बोले कुकड़ू-कुकड़ू
कोयल गीत सुनाती है.

तोता बोली रटता है
चोरों को डर लगता है.
छत के ऊपर बैठा कौआ
सबका स्वागत करता है.

सबसे सीधी मैना है
आँगन में इठलाती है.
गौरैया भी खूब फुदकती

हर बच्चे को भाती है.


उमेश चौहान 
सम्पर्क: सी-II195, सत्य मार्ग, चाणक्यपुरी, नई दिल्ली110021 (मो. नं. +91-8826262223).

पूरा नाम: उमेश कुमार सिंह चौहान (यू. के. एस. चौहान)
जन्म: 9 अप्रैल, 1959 को उत्तर प्रदेश के लखनऊ जनपद के ग्राम दादूपुर में।
शिक्षा: एम. एससी. (वनस्पति विज्ञान), एम.. (हिन्दी), पी. जी. डिप्लोमा (पत्रकारिता व जनसंचार)।

साहित्यिक गतिविधियाँ:

  • प्रकाशित पुस्तकें: गाँठ में लूँ बाँध थोड़ी चाँदनी (प्रेम-गीतों का संग्रह) - सत्साहित्य प्रकाशन, दिल्ली (2001), दाना चुगते मुरगे (कविता-संग्रह) - सत्साहित्य प्रकाशन, दिल्ली (2004), ‘अक्कित्तम की प्रतिनिधि कविताएं’  (मलयालम के महाकवि अक्कित्तम की अनूदित कविताओं का संग्रह) - भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली (2009),जिन्हें डर नहीं लगता (कविता-संग्रह) - शिल्पायन, दिल्ली (2009), एवं जनतंत्र का अभिमन्यु (कविता संग्रह) - भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली (2012), मई 2013 से हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र 'जनसंदेश टाइम्स' (लखनऊ, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी एवं गोरखपुर से प्रकाशित) में साप्ताहिक स्तम्भ-लेखन

  • संपादित पुस्तकें: 'जनमंच' (श्री सी.वी. आनन्दबोस के मलयालम उपन्यास 'नाट्टुकूट्टम' का हिन्दी अनुवाद) - शिल्पायन, दिल्ली (2013)

  • सम्मान: भाषा समन्वय वेदी, कालीकट द्वारा अभय देव स्मारक भाषा समन्वय पुरस्कार’ (2009) तथा इफ्को द्वारा राजभाषा सम्मान(2011)


Wednesday 13 November 2013

बच्चे बनाएंगे डाक टिकट के लिए पेंटिंग


यदि आप चाहते हैं कि आपकी बनाई हुई पेंटिंग डाक टिकट के रूप में जारी हो तो यह अवसर लेकर आया है डाक विभाग। डाक विभाग देशव्यापी स्तर पर ‘‘स्टैम्प डिजाइन‘‘ प्रतियोगिता करवा रहा है जिसमें सर्वश्रेष्ठ पेंटिंग को अगले वर्ष बाल दिवस पर डाक टिकट के रूप में जारी किया जायेगा। इस संबंध में जानकारी देते हुए इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि डाक विभाग वर्ष 1998 से यह आयोजन करवा रहा है और इसके माध्यम से डाक टिकटों के प्रति बच्चों एवं विद्यार्थियों की भागीदारी सुनिश्चित की जाती है ।

डाक निदेशक श्री यादव ने बताया कि इस वर्ष की थीम ''एक दिन अपने दादा-दादी के साथ'' है जिस पर विद्यार्थियों को पेंटिंग बनानी है। यह पेटिंग स्याही, वाटर कलर, आयल कलर या किसी अन्य माध्यम से बनायी जा सकती है। प्रतियोगी ड्रांइग पेपर, आर्ट पेपर या अन्य किसी भी प्रकार का पेपर पेंटिंग के लिए इस्तेमाल कर सकते है। प्रतिभागियों को उक्त विषय पर मौलिक डिजायन ही बनानी है। निदेशक डाक सेवाएं कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि सभी विद्यार्थियों को तीन समूहों में विभाजित किया गया है - कक्षा 4 तक के विद्यार्थी, कक्षा 5 से कक्षा 8 तक के विद्यार्थी एवं कक्षा 9 से कक्षा 12 तक के विद्यार्थी। सभी श्रेणियों में प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्तर पर क्रमशः 10,000, 6,000 एवं 4,000 रूपये के तीन-तीन पुरस्कार राष्ट्रीय स्तर पर दिये जायेंगे। राष्ट्रीय स्तर पर चुनी गयी पुरस्कृत प्रविष्टियों के आधार पर ही अगले वर्ष बाल दिवस पर डाक टिकट, प्रथम दिवस आवरण एवं मिनियेचर शीट इत्यादि का प्रकाशन किया जायेगा। 

निदेशक डाक सेवाएं, इलाहाबाद परिक्षेत्र, श्री कृष्ण कुमार यादव ने आगे बताया कि इलाहाबाद परिक्षेत्र के सभी डाक मण्डलों में उक्त प्रतियोगिता 16 नवम्बर 2013 दिन शनिवार को प्रातः 1100 बजे आयोजित होगी। यह प्रतियोगिता इलाहाबाद प्रधान डाकघर, वाराणसी प्रधान डाकघर, प्रतापगढ़ प्रधान डाकघर, जौनपुर प्रधान डाकघर, मिर्जापुर प्रधान डाकघर एवं गाजीपुर प्रधान डाकघर में आयोजित की जाएगी। 

Sunday 3 November 2013

जगमग-जगमग करते दीपक



जगमग-जगमग करते दीपक
लगते कितने मनहर प्यारे,
मानों आज उतर आये हैं
अम्बर से धरती पर तारे !

दीपों का त्योहार मनुज के
अतंर-तम को दूर करेगा,
दीपों का त्योहार मनुज के
नयनों में फिर स्नेह भरेगा!

धन आपस में बाँट-बूट कर
एक नया नाता जोड़ेंगे,
और उमंगों की फुलझड़ियाँ
घर-घर में सुख से छोड़ेंगे !

दीपावलि का स्वागत करने
आओ हम भी दीप जलाएँ,
दीपावलि का स्वागत करने
आओ हम भी नाचे गाएँ !

-महेन्द्र भटनागर-

Sunday 13 October 2013

हिन्दी बाल-काव्य को मध्यप्रदेश का योगदान

म ध्यप्रदेश साहित्य-सृजन का अत्यन्त उर्वर  क्षेत्र है। साहित्य की विविध विधाओं का    यहां निरन्तर विकास हुआ है और आज   भी हो रहा है।
मध्यप्रदेश का श्रेष्ठ बाल-साहित्य भी रेखांकित करने योग्य है। बाल-साहित्य के अन्तर्गत बाल-काव्य का उल्लेख विशेष रूप से किया जा सकता है। अनेक प्रमुख बाल-काव्य प्रणेताओं की जन्मभूमि या कर्मभूमि होने का गौरव मध्यप्रदेश को प्राप्त है। इस पर साभार प्रस्तुत है वरिष्ठ बाल-साहित्यकार  विनोद चन्द्र पाण्डेय 'विनोद' का एक महत्वपूर्ण आलेख.

कामता प्रसाद गुरु का नाम हिन्दी के प्रारंभिक बाल-काव्य के रचनाकारों में प्रमुख है। उनका जन्म सन् 1875 ई. में ग्राम परकोटा, जिला सागर में हुआ था। यद्यपि एक व्याकरणविद् के रूप में उनकी ख्याति अधिक है तथापि उन्होंने अनेक बाल-कविताओं का सृजन किया। एक उदाहरण प्रस्तुत है-
यह सुन्दर छड़ी हमारी।
है हमें बहुत ही प्यारी॥
यह खेल समय हर्षाती।
मन में है साहस लाती॥
तन में अति जोर जगाती।
उपयोगी है यह भारी।
यह सुन्दर छड़ी हमारी॥
पं. सुखराम चौबे गुणाकर का भी नाम मध्यप्रदेश के बाल-काव्य प्रणेताओं में उल्लेखनीय है। इनका जन्म सन् 1867 ई. में ग्राम रहली, जिला सागर में हुआ था। अध्यापन-कार्य करते हुए भी उन्होंने बच्चों के लिए प्रिय कविताएं लिखी थीं। एक बाल-कविता की कुछ पंक्तियां उध्दृत हैं-
यह छाता है सुखदाई। मैं इसे न दूँ भाई।
जब घर से बाहर जाता था बाहर से घर आता।
यह संग में आता जाता। रखता है सदा मिताई।
लोचन प्रसाद पाण्डेय का नाम भी मध्यप्रदेश के बाल-काव्यकारों में आदर के साथ लिया जाता है। उन्होंने बाल-विनोद, बालिका-विनोद, पद्य-पुष्पांजलि आदि बालोपयोगी कविता-पुस्तकों का प्रणयन किया एक कविता की कुछ पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं-
खेल-समय खेलो तुम सब मिल, करो समय पर अपना काम।
उद्योगी हर्षित होने की है यह प्यारी रीति ललाम।
जो कुछ करते हो मन देकर, करो सदा तुम सुखदाई।
काम अधूरे कभी जगत में ठीक नहीं होते भाई।
पं. लल्ली प्रसाद पाण्डेय का जन्म सन् 1886 ई. में सानोदा, सागर (मध्य भारत) में हुआ था। बच्चों की प्रतिष्ठित पत्रिका 'बालसखा' का सुदीर्घकाल तक सम्पादन कर अनेक बाल साहित्यकारों का निर्माण किया। वह स्वयं भी बाल साहित्य का सृजन करते रहे। एक बाल-कविता की कुछ पंक्तियाँ उध्दरणीय है-
ऑंखों पर चश्मा है सुन्दर, सिर पर गाँधी टोपी है।
और गले में पड़ा दुपट्टा, निकली बाहर चोटी है।
टेबिल लगा बैठ कुर्सी पर, लिखते हैं वानर जी लेख।
करते है कविता का कौशल, रहती जिसमें मीन न मेख।
देवी प्रसाद गुप्त 'कुसुमाकर' का जन्म सन् 1893 ई. में ग्राम बनखेड़ी, जिला होशंगाबाद में हुआ था। यद्यपि व्यवसाय से वे वकील थे तथापि बच्चों के लिए उन्होंने अनेक सुन्दर कविताएँ लिखीं। एक कविता की कुछ पंक्तियाँ उल्लेखनीय हैं-
दादा का जब मुँह चलता है, मुझे हंसी तब आती है।
अम्मा मेरे कान खींचकर, मुझको डाँट बताती है।
किन्तु हँसी बढ़ती जाती है, मेरे वश की बात नहीं।
चलते देख पपोले मुख को, रूक सकती है हँसी कहीं।

हिन्दी के बाल-काव्य प्रणेताओं में सभा मोहन अवधिया स्वर्ण सहोदर का नाम अत्यन्त सम्मानपूर्वक लिया जाता है। उनका जन्म सन् 1902 ई. में शहापुरा, जिला मण्डला (मध्यप्रदेश) में हुआ था। वह शिक्षण कार्य से जुड़े रहे और निरन्तर बाल-साहित्य में साधनारत रहे। उन्होंने मनोरंजक, प्रेरक और ज्ञानवर्धक बाल-कविताएं लिखी हैं। कुछ काव्य पंक्तियाँ उल्लेखनीय हैं-
नटखट हम हाँ, नटखट हम। करने निकले खटपट  हम।
आ गये लड़के या गये हम। बन्दर देख लुभा गये हम।
बन्दर को बिजकावें हम। बन्दर दौड़ा भागे हम।
बच गये लड़के, बच गये हम।
ठाकुर गोपाल शरणसिंह हिन्दी के प्रमुख कवि माने जाते हैं। उनका जन्म सन् 1891 ई. में रीवा (म.प्र.) में हुआ था। उन्होंने कुछ बालोपयोगी कविताएं भी लिखी हैं। एक उदाहरण प्रस्तुत है-
सुन्दर सजीला चटकीला वायुयान एक,
भैया हरे कागज का आज मैं बनाऊँगा।
चढ़ के उसी पै सैर नभ की करूँगा खूब,
बादल के साथ-साथ उसको उड़ाऊँगा।
मन्द-मन्द चाल से चलाऊँगा उसे मैं वहाँ,
चहक-चहक चिड़ियों के संग मैं गाऊंगा।
चन्द्र का खिलौना, मृग छोना वह छीन लूंगा।
भैया को गगन की तरैया तोड़ लाऊँगा।
श्रीमती सुभद्राकुमारी चौहान हिन्दी की सुप्रतिष्ठित कवयित्री हैं। यद्यपि सन् 1904 ई. में उनका जन्म प्रयाग (उ.प्र.) में हुआ था, तथापि उनका विवाह जबलपुर के सुप्रसिध्द वकील लक्ष्मणसिंह चौहान से हुआ था। उनकी बचपन शीर्षक बाल कविता अत्यधिक लोकप्रिय है। उसकी कुछ पंक्तियाँ विशेष रूप से पठनीय हैं-
मैं बचपन को बुला रही थी, बोल उठी बिटिया मेरी।
नन्दन-वन-सी फूल उठी वह, छोटी-सी कुटिया मेरी।
'माँ ओ' कहकर बुला रही थी, मिट्टी खाकर आई थी।
कुछ मुँह में कुछ लिए हाथ में, मुझे खिलाने लाई थी।
मैंने पूछा- 'यह क्या लाई', बोल उठी वह 'माँ काओ'
फूल-फूल मैं उठी खुशी से, मैंने कहा 'तुम्हीं खाओ।'
कविवर गौरीशंकर 'लहरी' का जन्म सन् 1909 ई. में सागर में हुआ था। वह मध्यप्रदेश के सूचना विभाग में कार्यरत रहे। उन्होंने बाल-कविताओं का सृजन भी किया। कुछ काव्य पंक्तियाँ उल्लिखित हैं-
बोली हवा बीज से उस दिन, चलो घू्मने मेरे साथ।
दूर-दूर के देश दिखाऊँ, जाने क्या लग जाये हाथ।
बीज आ गया इन बातों में, खुश हो घर से निकल पड़ा।
गया नहीं था बहुत दूर तब, मिट्टी ने उसको पकड़ा।

अमृतलाल दुबे का जन्म 1908 ई. में जबेरा, जिला दमोह (मध्यप्रदेश) में हुआ था। उन्होंने शिक्षा विभाग में कार्य किया और बालोपयोगी कविताओं की रचना की। एक बाल-कविता का यह अंश दृष्टव्य है-
शेर कहे मैं वन का राजा, खून पिया करता हूँ ताजा।
यह पहाड़ मेरी दहाड़ से, गूँजे, काँपे, थराए।
दुनिया मुझसे डर जाए।
साहित्यकार रामानुजलाल श्रीवास्तव का जन्म सन् 1898 ई. में सिहोरा (मध्य भारत) में हुआ था। इन्होंने बाल-कविताएँ भी लिखी हैं, जो 'बालसखा' पत्रिका में प्रकाशित होती रहती थी। बालकों को सन्देश देते हुए उन्होंने कहा था-
इसी भाँति तुम विद्या पढ़कर सुन्दर दीपक बन जाओ।
अज्ञानी के शून्य हृदय में ज्ञान-उजाला फैलाओ॥

पं. माखनलाल चतुर्वेदी 'एक भारतीय आत्मा' राष्ट्रीय भावधारा के प्रमुख कवि हैं। इनका जन्म सन् 1889 ई. में बाबई, जिला होशंगाबाद में हुआ था। खण्डवा में रहकर 'कर्मवीर' पत्रिका का सम्पादन करते थे। उनकी कुछ कविताएँ बालोपयोगी भी हैं। एक उदाहरण प्रस्तुत हैं-
ले लो दो आने के चार। लड्डू राजगिरे के यार।
यह है पृथ्वी जैसे गोल। ढुलक पड़ेंगे गोल-मटोल।
इनके मीठे स्वादों में ही बन जाता है इनका मोल।
दामों का मत करो विचार। ले लो दो आने के चार।
एकांकी सम्राट डॉ. रामकुमार वर्मा का जन्म स्थान नरसिंहपुर (मध्यभारत) था। इनका जन्म सन् 1905 ई. में हुआ था। यह इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष रहे। वहीं रहकर इन्होंने साहित्य-साधना की। इनकी बाल कविताएँ 'चमचम', 'शिश'ु और बालसखा में प्रकाशित होती थी। एक बालोपयोगी कविता उदाहरण स्वरूप उध्दृत की जा रही है-
प्रभुवर सूरज को चमकाकर, रोज सबेरे देते भेज।
काम घूमने का सिखलाकर, भर देते हो उसमें तेज॥
इसी तरह मुझको भी अब सब, काम खूब सिखला देना।
मुझमें अपना तेज डालकर, दुनिया में चमका देना॥
रामेश्वर गुरु 'कुमार हृदय' की बाल-काव्य साधना अविस्मरणीय है। उनका जन्म सन् 1914 ई. को जबलपुर में हुआ था। उनकी बाल कविताएं बालसखा, शिशु और खिलौना आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित होती थीं। उनके एक अभिनय गीत का यह अंश अवलोकनीय है-
राजा (पहले कैदी से)
क्यों तुम पड़े कैद में जाकर,
बतलाओ कारण समझाकर।
पहला कैदी (हाथ जोड़कर)
लोगों ने दी झूठ गवाही।
लाए मुझको पकड़ सिपाही।
दूसरा कैदी- (गिड़गिड़ाकर पैरों पर पड़ते हुए)
वह हाकिम था पूरा फंदी।
जिसने मुझे बनाया बंदी।
लक्ष्मी प्रसाद मिश्र 'कवि-हृदय' का जन्म सन् 1913 ई. में सागर में हुआ था। उन्होंने बाल कविताओं की रचना की जिनका प्रकाशन तत्कालीन अनेक बाल पत्रिकाओं की रचना की जिनका प्रकाशन तत्कालीन अनेक बाल-पत्रिकाओं में हुआ। उनकी बाल कविता का एक उदाहरण दृष्टव्य है-
हरे-भरे मैदान हमारे। लगते हैं हमको अति प्यारे।
खेलों की हरियाली प्यारी। बागों की है शोभा न्यारी॥
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी मध्यप्रदेश (अब छत्तीसगढ़) के खैरागढ़ के निवासी थे। सरस्वती पत्रिका का सम्पादन उन्होंने दीर्घकाल तक किया था। उनकी बाल कविताएं भी बच्चों में लोकप्रिय थीं। एक कविता का अंश प्रस्तुत है-
बुढ़िया चला रही थी चक्की। पूरे साठ वर्ष की पक्की।
दोने में थी रखी मिठाई। उस पर उड़कर मक्खी आई।
विनय मोहन शर्मा 'वीरात्मा' का जन्म सन् 1905 ई. में करकवेल मध्यप्रदेश में हुआ था। इनका वास्तविक नाम शुकदेव प्रसाद तिवारी था। उन्होंने 'वीरात्मा' नाम से अनेक बाल कविताओं का सृजन किया। एक बाल कविता उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत है-
मधुर गीत गा नींद बुलाना। थपकी दे दे मुझे सुलाना।
मेरा जरा विकल हो जाना। तेरा टप-टप अश्रु गिराना।
वह अब तो मुझे रूलाता है। माँ! तेरी याद दिलाता है।

ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी का जन्म सन् 1908 में ई. में ग्राम करेली, जिला नरसिंहपुर (मध्य प्रदेश) में हुआ था। उन्होंने बाल गीतों की भी रचना की। उनके एक बाल गीत का अंश उल्लिखित है-
अम्मा अम्मा मुझे बता दे यह चमकीले तारे।
सारी रात छिपा ही खेला करते हैं बेचारे।

सन् 1908 ई. में जन्मे रूद्रदत्त मिश्र मध्यप्रदेश के सूचना विभाग में कार्यरत रहे। उन्होंने उल्लेखनीय बाल काव्य साधना की। उनकी एक बाल कविता उध्दरणीय है-
नहीं किसी का लेना-देना, नहीं किसी का खाना।
कंकड़-पत्थर जो मिल जाए, वही हमारा खाना।
 नहीं घोंसला कहीं हमारा, नहीं हमारा घर है।
जहां बैठकर रात बितावें, वही हमारा घर है।
शांति चाहते हम दुनिया में, झगड़ा हमें न भाता।
हम सबका ही हित करते हैं, रखते अच्छा नाता।
बाबूलाल जैन 'जलज' का जन्म सन् 1909 ई. में देवरीकलां, जिला सागर मेें हुआ था। उनका बाल-काव्य सृजन भी सराहनीय है। उनकी एक बाल प्रार्थना उध्दृत है:-
प्रभुवर दीजै यह वरदान।
शीलवान विनयी हम होवें। कभी फूट के बीज न बोवें।
दीन जनों के दु:ख को खोवें। करें सदा सबका ही मान।
गुणी जनों की संगति पावें। उच्च विचार सदा मन आवें।
लोभ मोह से चित्त हटावें। समझें सबको सदा समान।
हिन्दी बाल साहित्य साधकों में नर्मदा प्रसाद खरे का नाम सुविख्यात है। उनका जन्म सन् 1913 ई. जबलपुर में हुआ था। उनकी अनेक बाल काव्य कृतियां प्रकाशित हुई हैं। तितली के संबंध में उनकी एक बाल कविता विशेष रूप से पठनीय है-
रंग-बिरंगे पंख तुम्हारे, सबके मन को भाते हैं।
कलियां देख तुम्हें खुश होतीं, फूल देख मुस्काते हैं।
रंग-बिरंगे पंख तुम्हारे, सबका मन ललचाते हैं।
तितली रानी, तितली रानी कहकर सभी बुलाते हैं।
पास नहीं क्यों आती तितली, दूर-दूर क्यों रहती हो।
फूल-फूल के कानों में तुम जा-जाकर क्या कहती हो?
सन् 1911 ई. में जिला सागर, (मध्यप्रदेश) में जन्मे देवीदयाल चतुर्वेदी 'मस्त' कुछ समय तक 'बाल सखा' पत्रिका के संपादक रहे। उन्होंने स्वयं भी बाल कविताओं की रचना की। उनकी एक बाल कविता की कुछ पंक्तियां उल्लेखनीय हैं-
टन-टन टन-टन घंटा बजता, शाला को हम जाते हैं।
वहां पहुंचकर पंडित जी को हम सब शीश झुकाते हैं।
अच्छी-अच्छी बातें हमको पंडित जी बतलाते हैं।
रोज कहानी, गीत बहुत से वह हमको सिखलाते हैं।
अब्दुल रहमान सागरी का जन्म सन् 1911 ई. में ग्राम गढ़कोटा, जिला सागर में हुआ था। बच्चों के लिए उन्होंने श्रेष्ठ कविताएं लिखी हैं। जागरण का संदेश देते हुए उन्होंने आह्वान किया है-
जागो और जगाओ।
बीत चुकीं आलस की घड़ियां,
जाग उठीं अब सारी चिड़ियां।
जागे फूल खिलीं अब कलियां॥
तुम भी जागो आओ। जागो और जगाओ।
उत्तम चन्द्र श्रीवास्तव का कार्यक्षेत्र मध्य भारत था। उनका जन्म सन् 1916 ई. में हुआ था। उनकी एक बाल कविता का अंश उध्दृत है-
नया साल आया है भाई खुशियां नई मनाने को।
अपना और सभी का जीवन सुन्दर सुखी बनाने को॥

सन् 1918 ई. में जबलपुर में जन्मे डॉ. राजेश्वर गुरु भी बच्चों के श्रेष्ठ कवि रहे हैं। उनका एक शिशुगीत प्रस्तुत है-
बिल्ली मेरी प्यारी मौसी, कौआ मेरा मामा।
बिल्ली पहने फ्राक गरारा, कौआ जी पाजामा।
लाला जगदलपुरी का जन्म सन् 1920 ई. में जगदलपुर, जिला बस्तर में हुआ था। उनका बाल-काव्य भी सराहनीय है। एक उदाहरण दृष्टव्य है-
नन्ही-सी माचिस की तीली।
रगड़े खाती आग उगलती। उजियाला देने को जलती।
कहती मुझसे सही काम लो। आग संभाले नहीं संभलती।

सन् 1922 ई. में बिलहरा, सागर (मध्यप्रदेश) में जन्मे कृष्णकान्त तेलंग ने भी बच्चों की कविताएँ लिखी हैं। एक उदाहरण देखिए-
लम्बी-लम्बी भूरी मोटी बाबा की थीं मूँछे।
मानो होठों पर रक्खी हों, ला घोड़े की पूँछें।
रामभरोसे गुप्त 'राकेश' का जन्म सन् 1925 ई. में आलमपुर जिला भिण्ड (मध्यप्रदेश) में हुआ। उनकी बाल-काव्य साधना प्रशंसनीय है। एक बाल-कविता की कुछ पंक्तियाँ अवलोकनार्थ प्रस्तुत हैं-
देशभक्ति के गीत सुनाते, वीर साहसी सैनिक हम।
कभी न कड़वे वचन बोलते, वाणी रखते सदा नरम॥
डॉ. हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य के सुप्रतिष्ठित रचनाकार हैं। उनका जन्म सन् 1940 ई. में नागोद, जिला सतना में हुआ। उन्होंने बाल-कविताएँ भी लिखी हैं। कुछ पंक्तियाँ उध्दरणीय है-
कविवर तोंदूराम बुझक्कड़ कभी-कभी आ जाते हैं।
खड़ी निरन्तर रहती चोटी, आंखें धँसी मिचमिची छोटी।
नाक चायदानी की टोंटी,
अंग-अंग की छटा निराली, भारी तोंद हिलाते हैं।
सन् 1945 ई. में ग्राम रामपुर कला, परगना सबलगढ़, जिला मुरैना (मध्यप्रदेश) में जन्मे आााद रामपुरी की भी एक बाल-कविता अवलोकनीय है-
लंगड़ा तोतापरी कठौआ खुशियों भरे दशहरी आम।
रस गुब्बारे गाल फुलाए सजधज खड़े सुनहरी आम।
राजा चौरसिया ने प्रभूत बाल-काव्य की रचना की है।
उपर्युक्त रचनाकारों के अतिरिक्त जगदीश तोमर, देवेन्द्र दीपक, परशुराम शुक्ल, अभिनव तैलंग, वीरेन्द्र मिश्र, अंशु शुक्ला, अशोक आनंद, अहद प्रकाश, गफूर स्नेही, भीष्मसिंह चौहान, गोवर्धन शर्मा, नयन कुमार राठी, ललित कुमार उपाध्याय, आशा शर्मा, नरेन्द्रनाथ लाहा, बटूक चतुर्वेदी, रमेशचन्द्र शाह, राम वल्लभ आचार्य, लक्ष्मीनारायण पयोधि, उषा जायसवाल, पदमा चौगांवकर आदि ने भी बाल काव्य की समृध्दि में अपना बहुमूल्य योगदान दिया है, किन्तु सभी की बाल कविताओं के उध्दरण देना सम्भव नहीं प्रतीत होता।
मध्यप्रदेश से प्रकाशित बाल-पत्रिकाओं शक्तिपुत्र, चकमक, समझ-झरोखा, देवपुत्र, अपना बचपन और स्नेह आदि तथा उनके संपादकों ने बाल-काव्य के विकास में महती भूमिका निभाई है। विशेष रूप से कृष्णकुमार अष्ठाना और महेश सक्सेना का योगदान सराहनीय है। भोपाल में स्थापित बाल कल्याण एवं बाल साहित्य शोध केन्द्र तथा इन्दौर में स्थापित बाल साहित्य सृजन पीठ का अवदान विस्मृत नहीं किया जा सकता। अत: इसमें कोई सन्देह नहीं कि हिन्दी बाल-काव्य को मध्यप्रदेश का योगदान रेखांकित करने योग्य है। 

(मध्यप्रदेश संदेश से साभार)

Friday 26 July 2013

इन्हें भी जानिए : रमेश तैलंग, वरिष्ठ बाल-साहित्यकार

रमेश तैलंग ( वरिष्ठ बाल-साहित्यकार)

जन्म की तारीख : दो जून, 1946

जन्मस्थान : टीकमगढ़ (मध्य प्रदेश)



पारिवारिक परिचय:

माता: श्रीमती कौशल्या

पिता: स्व. श्री हरीकृष्ण देव

पत्नी: श्रीमती कमलेश तैलंग

पुत्री: सुश्री सुष्मिता तैलंग

पुत्र: श्री सचिन तैलंग, पुत्रवधु: डॉ. गरिमा तैलंग

पौत्री: प्लाक्षा

शिक्षा: एम.ए/परास्नातक -हिंदी साहित्य, समाज शास्त्र (जीवाजी विश्विद्यालय-ग्वालियर)

कार्मिक प्रबंध एवं औद्योगिक संवंध में पी.जी.डिप्लोमा.

भाषाज्ञान: हिंदी, अंग्रेजी.



प्रकाशित कृतियाँ :

बाल/किशोर साहित्य :

हिंदी के नए बाल गीत (देवेन्द्र कुमार तथा प्रकाश मनु के साथ)-1994; उड़न खटोले आ (बालगीत)-1994; एक चपाती तथा अन्य बाल कविताएँ-1998; कनेर के फूल(बालगीत)-1998; टिन्नीजी ओ टिन्नीजी-2005, (बालगीत); इक्यावन बालगीत-2008; लड्डू मोतीचूर के-2008 (101 नटखट बालगीत); मेरे प्रिय बाल गीत-2010, (163 बालगीत); विश्व प्रसिद्ध किशोर कथाएं (देवेन्द्र कुमार के साथ)-2009 ; अमर विश्व किशोर कथाएं (देवेन्द्र कुमार के साथ)-2009

सम्मान व पुरस्कार : एक चपाती तह अन्य बाल कविताएँ पर हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ; कनेर के फूल पर हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार; हरी भरी धरती (बाल गीत संग्रह) पर प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली (भारत सरकार) द्वारा प्रथम भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार



संपर्क का पता :

सी टॉवर, फ्लेट - एच-2/1002 क्लासिक रेजीडेंसी, राजनगर एक्सटेंशन, गाजियाबाद-201003

टेलीफोन/मोबाइल नम्बर : +91-9211688748, 09716041040

ई-मेल : rtailang@gmail.com, rameshtailang@yahoo.com

ब्लॉग :http://rameshtailang.blogspot.in/, http://nanikichiththian.blogspot.com/  

Tuesday 23 July 2013

इन्हें भी जानिए : दीनदयाल शर्मा, वरिष्ठ बाल-साहित्यकार

दीनदयाल शर्मा, वरिष्ठ बाल-साहित्यकार
जन्म: 15 जुलाई 1956 (प्रमाण पत्र के अनुसार) जन्म स्थान: गांव- जसाना, तहसील- नोहर, जिला- हनुमानगढ़ (राज.) शिक्षा: एम. कॉम. (व्यावसायिक प्रशासन, 1981), पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा (राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर 1985), स्काउट मास्टर बेसिक कोर्स (1979, 1990) लेखन: हिन्दी व राजस्थानी दोनों भाषाओं में 1975 से सतत सृजन। मूल विधा: बाल साहित्य अन्य: व्यंग्य, कथा, कविता, नाटक, एकांकी, रूपक, सामयिक वार्ता आदि। विशेष: =हिन्दी व राजस्थानी में दो दर्जन पुस्तकें प्रकाशित। =देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में अनेक रचनाएं प्रकाशित (1975 से) =महामहिम राष्ट्रपति डॉ. कलाम द्वारा अंग्रेजी में अनुदित बाल नाट्य कृति 'द ड्रीम्स' का 17 नवम्बर 2005 को लोकार्पण। =बाल दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली में महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल की ओर से विशेष सम्मान, 2007 =आकाशवाणी से हास्य व्यंग्य, कहानी, कविता, रूपक, नाटक आदि प्रसारित। =दूरदर्शन से साक्षात्कार एवं कविताएं प्रसारित। =काव्य गोष्ठियों एवं कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ।=गंगानगर पत्रिका (1972 से) प्रताप केसरी (23 अप्रेल 1979 से) और राजस्थान पत्रिका के लिए समाचार संकलन (1972 से 1982 के मध्य)=राष्ट्रदूत, बीकानेर, प्रताप केसरी, श्रीगंगानगर, दैनिक तेज, हनुमानगढ, और दैनिक तेज केसरी, हनुमानगढ़ के लिए स्तंभ लेखन। (1979 से 1982 के मध्य) =बी.जे.एस.रामपुरिया जैन महाविद्यालय, बीकानेर में हिन्दी संपादक, 1979=जैन पी.जी.कॉलेज, गंगाशहर, बीकानेर में हिन्दी संपादक, 1981=संस्थापक/अध्यक्ष : राजस्थान बाल कल्याण परिषद्, हनुमानगढ़, राज., 1986 =संस्थापक/अध्यक्ष : राजस्थान साहित्य परिषद, हनुमानगढ़, राज. 1984=साहित्य सम्पादक (मानद): टाबर टोल़ी पाक्षिक (बच्चों का हिन्दी अखबार), बाल दिवस 2003 से लगातार=सम्पादक (मानद): कानिया मानिया कुर्र (बच्चों का राजस्थानी अखबार) =डॉ. प्रभाकर माचवे : सौ दृष्टिकोण में एक आलेख संकलित।=शिक्षा विभाग राजस्थान के शिक्षक दिवस प्रकाशनों में रचनाएं प्रकाशित। =स्कूल एवं कॉलेज की अनेक स्मारिकाओं का सम्पादन।=बाल साहित्य की अनेक पुस्तकों के भूमिका लेखक। =जिला साक्षरता समिति हनुमानगढ़ की ओर से प्रकाशित मासिक मुख पत्र आखर भटनेर का सम्पादन। साक्षरता में उपलब्धियां : =जिला संपूर्ण साक्षरता समिति हनुमानगढ़ के 'भटनेरÓ परियोजना प्रस्ताव, =उत्तर साक्षरता परियोजना प्रस्ताव तथा सतत् शिक्षा परियोजना प्रस्ताव का निर्माण, लेखन और संपादन, =नवसाक्षरों के पठन हेतु 'आखर मेड़ीÓ भाग-1, भाग-2, भाग-3 का निर्माण - सम्पादन, =संदर्भ व्यक्ति, =मीडिया सैल एवं =कौर ग्रुप का सदस्य, =आखर गांव, =आखर राजस्थान तथा =नीले घोड़े का असवार नाम की तीन भित्ति पत्रिकाओं का निर्माण, =समय-समय पर तहसील, जिला एवं राज्य स्तरीय कार्यशालाओं तथा कला जत्थे में सक्रिय भागीदारी। =जिला साक्षरता समिति की ओर से मासिक मुख पत्र 'आखर भटनेरÓ का कई वर्षों तक सफल संपादन। प्रकाशित कृतियां: (हिन्दी में) =चिंटू-पिंटू की सूझ (बाल कहानियां चार संस्करण)=चमत्कारी चूर्ण (बाल कहानियां) =पापा झूठ नहीं बोलते (बाल कहानियां)=कर दो बस्ता हल्का (बाल काव्य)=सूरज एक सितारा है (बाल काव्य)=सपने (बाल एकांकी)=बड़ों के बचपन की कहानियां (महापुरुषों की प्रेरणाप्रद घटनाएं)=इक्यावन बाल पहेलियाँ (बाल पहेलियां)=फैसला (बाल नाटक)=नानी तू है कैसी नानी=चूं-चूं (शिशु कविताएँ)=राजस्थानी बाल साहित्य:एक दृष्टि=फैसला बदल गया (नवसाक्षर साहित्य) =मैं उल्लू हूं (हास्य व्यंग्य दो संस्करण 1987,1993) =सारी खुदाई एक तरफ (हास्य व्यंग्य संग्रह) (अंग्रेजी में) =द ड्रीम्स, राजस्थानी साहित्य:=चन्दर री चतराई (बाल कहानियां)=टाबर टोल़ी (बाल कहानियां) =शंखेसर रा सींग (बाल नाटक, दो संस्करण)=तूं कांईं बणसी (बाल एकांकी)=म्हारा गुरुजी (बाल एकांकी)=डुक पच्चीसी (हास्य काव्य) =गिदगिदी (हास्य काव्य) =सुणौ के स्याणौ (हास्य काव्य, दो संस्करण)=स्यांति (कथा)=घर बिगाड़ै गुस्सौ (हास्य)=घणी स्याणप (हास्य)=बात रा दाम (तीन बाल नाटक)=बाळपणै री बातां प्रसारित रेडियो नाटक: =मेरा कसूर क्या है=रिश्तों का मोल =अंधेरे की तस्वीर=पगली=और थाली बज उठी =अपने-अपने सुख =जंग जारी है =उसकी सजा =छोटी-छोटी बातें=और सब कहते रहे =पगड़ी की लाज=मुझे माफ कर दो =घर की रोशनी प्रसारित झलकी: =मास्टर फकीरचंद =चक्कर =गोलमाल प्रसारित बाल नाटक: =फैसला =शंखेश्वर के सींग =परीक्षा =बिगड़ग्यौ बबलू =म्हारा गुरुजी प्रसारित रूपक: =सिंधु घाटी की समकालीन सभ्यता: कालीबंगा मंचित नाटक : =बात रा दाम =जैÓरीली नागण : शराब =म्हारा गुरुजी =बिगड़ग्यौ बबलू =मास्टर फकीरचंद =सैंÓ संू बड़ी पढाई =तंू कांईं बणसी पुरस्कार और सम्मान : =राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर से हिन्दी बाल कथा संग्रह पर डॉ.शम्भूदयाल सक्सेना बाल साहित्य पुरस्कार (1988-89) =राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर से राजस्थानी बाल नाटक पर पं. जवाहरलाल नेहरू बाल साहित्य पुरस्कार (1998-99) =बाल साहित्य की उल्लेखनीय सेवाओं के लिए भारतीय बाल कल्याण संस्थान, कानपुर (उत्तरप्रदेश) की ओर से बाल साहित्य सम्मान, 1998 =हिन्दी बाल कथा पर अखिल भारतीय शकुन्तला सिरोठिया बाल कहानी पुरस्कार, इलाहाबाद (2000) =राष्ट्रीय बाल साहित्य समारोह, चित्तौडग़ढ़ से राजस्थानी बाल एकांकी पर चंद्रसिंह बिरकाली राजस्थानी बाल साहित्य का प्रथम पुरस्कार (1998-99) =हिन्दी बाल कथा पर कमला चौहान स्मृति ट्रस्ट, देहरादून (उत्तरांचल) की ओर से सर्वश्रेष्ठ बाल साहित्यकार पुरस्कार (2001) =बाल साहित्य की उल्लेखनीय सेवाओं पर अखिल भारतीय साहित्य एवं कला विकास मंच, रावतसर (1999) से सार्वजनिक सम्मान। =पंडित भूपनारायण दीक्षित बाल साहित्य पुरस्कार, हरदोई, उत्तरप्रदेश (1998-99) =नागरी बाल साहित्य संस्थान, बलिया, उत्तरप्रदेश से सम्मान (1998-99) =पं. हरप्रसाद पाठक स्मृति बाल संस्थान, कानपुर से सम्मान (1998-99) =रूचिर साहित्य समिति, सोजतशहर, पाली, राज. की ओर से बाल साहित्य की उल्लेखनीय सेवाओं के लिए सार्वजनिक सम्मान (1998-99) =ग्राम पंचायत, जण्डावाली, हनुमानगढ़, राज., (1997) नगर परिषद्, हनुमानगढ़ (1989) और जिला प्रशासन, हनुमानगढ़ (1998) की ओर से सार्वजनिक सम्मान। =रोवर स्काउट (सेवा कार्य / साइकिल हाइक) में राज्य स्तरीय पुरस्कार (1979) =महाविद्यालय में अध्ययन के दौरान कविता, कहानी, कार्टून, एकाभिनय, श्रेष्ठ हस्तलेखन व कुश्ती प्रतियोगिता में प्रथम / द्वितीय =अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस पर राज्य में सर्वाधिक पुस्तक दानदाता के राज्य स्तरीय पुरस्कार से बिड़ला सभागार, जयपुर में सार्वजनिक सम्मान (2005) =बाल साहित्य की उल्लेखनीय सेवाओं के लिए भटनेर महर्षि गौतम सेवा समिति, हनुमानगढ़ की ओर से सम्मानित (2005) =बाल साहित्य की उल्लेखनीय सेवाओं के लिए राजस्थान ब्राह्मण महासभा की ओर से सार्वजनिक सम्मान (2009) =बाल साहित्य की उल्लेखनीय सेवाओं के लिए भटनेर महर्षि गौतम सेवा समिति, हनुमानगढ़ की ओर से सम्मानित (2009) =सृजनशील बाल साहित्य रचनाकारों की राष्ट्रीय संस्था 'बाल चेतनाÓ, जयपुर की ओर से राजस्थानी बाल साहित्य की सेवाओं के लिए 'सीतादेवी अखिल भारतीय श्रीवास्तव सम्मानÓ (2006) =राजस्थानी बाल साहित्यिक सेवाओं के लिए प्रयास संस्थान, चूरू की ओर से सार्वजनिक सम्मान (2010) संपर्क: 10/22, आर.एच.बी. कॉलोनी, हनुमानगढ़ जं., पिन कोड- 335512, राजस्थान, भारत मोबाइल - 09414514666

ब्लॉग : http://deendayalsharma.blogspot.in/, http://taabartoli.blogspot.com/ 

Sunday 10 February 2013

लड्डू-बर्फी की शादी


जिस दिन होना थी लड्डू की,
बर्फीजी से शादी,
बर्फी बहुत कुरूप किसी ने,
 झूठी बात उड़ा दी|

गुस्से के मारे लड्डूजी,
जोरों से चिल्लाये|

बिना किसी से पूँछतांछ ,
वापस बारात ले आये|

लड्डू के दादा रसगुल्ला,
बर्फी के घर आये|

बर्फीजी को देख सामने ,
मन ही मन मुस्काये|

बर्फी तो इतनी सुंदर थी,
जैसे कोई परी हो|

पंख लगाकर आसमान
से, अभी अभी उतरी हो|

रसगुल्लाजी फिदा हो गये,
उस सुंदर बर्फी पर|

ब्याह कराकर उसको लाये,
वे चटपट अपने घर|

लड्डू क्वांरा बेचारा अब,
ड़ता रसगुल्ला से|

रसगुल्ला मुस्कराता रहता,
बिना किसी हल्ला के|

सुनी सुनाई बातों पर तुम,
कभी ध्यान मत देना|

क्या सच है क्या झूठ सुनिश्चित ,
खुद जाकर‌ कर लेना|

प्रभु दयाल श्रीवास्तव, छिंदवाडा, मध्य प्रदेश

Saturday 26 January 2013

तिरंगा है शान हमारी

तीन रंग मे रंगा हुआ है,मेरे देश का झन्डा,
केसरिया,सफ़ेद और हरा,मिलकर बना तिरंगा |

इस झंडे की अजब गजब,तुम्हे सुनाऊं कहानी ,
केसरिया की शान है जग मे,युगों-युगों पुरानी |

संस्कृति का दुनिया मे,जब से है आगाज़ हुआ ,
केसरिया तब से ही है,विश्व विजयी बना रहा |

शान्ति का मार्ग बुद्ध ने,सारे जग को दिखलाया ,
धवल विचारों का प्रतीक,सफ़ेद रंग कहलाया |

महावीर ने सत्य,अहिंसा,धर्म का मार्ग बताया ,
शांत रहे सम्पूर्ण विश्व,सफ़ेद धवज फहराया |

खेती से भारत ने सबको,उन्नति का मार्ग बताया ,
हरित क्रांति जग मे फैली,हरा रंग है आया |

वसुधैव कुटुंब मे कोई.कहीं रहे न भूखा ,
मानवता जन-जन मे व्यापे,नहीं बाढ़ नहीं सुखा|

अशोक महान हुआ दुनिया मे,धर्म सन्देश सुनाया ,
सावधान चौबीसों घंटे,चक्र का महत्व बताया |

नीले रंग का बना चक्र,हमको संदेशा देता ,
नील गगन से बनो विशाल,सदा प्रेरणा भरता |

तिरंगा है शान हमारी,आंच न इस पर आये ,
अध्यात्म भारत की देन,विजय धवज फहराए |

डॉ.अ.कीर्तिवर्धन
8265821800

Sunday 20 January 2013

जब 'दिया' चले कंप्यूटर से भी तेज

उसकी उम्र सात साल है और कक्षा तीन में पढ़ती है लेकिन दिमाग कंप्यूटर से भी तेज है। उसे आईआईटी स्तर के फिजिक्स के पांच सौ से अधिक फार्मूले याद हैं। बीएससी स्तर के गणित के सूत्रों को पलक झपकते हल कर देती है। कंप्यूटर के की-बोर्ड को आंख बंद करके बता देती है। उसकी प्रतिभा को देखते हुए उसके परिजन इस साल बारहवीं या बीएससी की परीक्षा दिलवाना चाहते हैं।
 
इस अनोखी प्रतिभा का नाम है दिया। उत्तर प्रदेश के शिवपुर की निवासी दिया के पिता मनोज नेगी कहते हैं मोटिवेट करने के लिए दिया को आगे बढ़ाना जरूरी है। मेरा प्रयास है कि इस साल वह कक्षा बारहवीं या बीएससी स्तर की परीक्षा में बैठे। वह बताते हैं कि गणित और विज्ञान में दिया की प्रतिभा गजब की है। एक बार वह जो फार्मूला सुन या पढ़ लेती है उसे कभी नहीं भूलती।
 
तीन साल पहले जाना
कक्षा तीन में पढ़ने वाली दिया नेगी के पिता मनोज नेगी बताते हैं कि वह कोचिंग क्लास चलाते हैं। तीन साल पहले ट्यूशन के दौरान दसवीं के विद्यार्थियों को गुणांक के सूत्र पूछ रहा था, तभी दिया ने कहा कि यह मुझे आते हैं। फिर उसने सारे सूत्र सही-सही बता दिए।
 
कभी नहीं की सुनियोजित पढ़ाई
मनोज नेगी बताते हैं कि बिना पढ़े इतने सूत्र बताने के बाद मैं दिया की प्रतिभा को देखना चाहता था। इसके बाद मैंने उसे कुछ सूत्र दिए और 24 घंटे में बताने को कहा। लेकिन उसने पांच घंटे बाद ही सब बता दिए। इस बीच उसका ध्यान पढ़ने में कम खेलने में अधिक था। फिर मैंने कुछ सूत्रों की डायरी बनाई। डायरी में आईआईटी से लेकर हर स्तर के गणित और भौतिक विज्ञान के सूत्र हैं। दिया को ये सभी सूत्र याद हैं। उसने इन्हें कब पढ़ा मुझे नहीं मालूम। न ही मैंने कभी उस पर ऐसी किसी किताब या सूत्र को पढ़ने के लिए जोर दिया। जब मैं कोचिंग क्लास चलाता हूं तो वह सूत्रों को सुन लेती है, जो उसे याद हो जाते हैं। अपने विषय को वह परीक्षा से कुछ समय पहले सिर्फ आधा घंटा पढ़ती है। दोस्तों के साथ वह अन्य बच्चों की तरह खेलती है।
 
इंजीनियर बनने का सपना
विद्यात्री पब्लिक स्कूल ग्रास्टनगंज में कक्षा तीन में पढ़ने वाली सात साल की दिया का कहना है कि वह साफ्टवेयर इंजीनियर बनना चाहती है। इतने सूत्र याद करने के बारे में वह बताती है कि कुछ देखकर सीखे हैं और कुछ सुनकर याद हो गए हैं।
 
दिया को क्या-क्या है याद
- कक्षा बारहवीं और बीएससी स्तर के गणित के त्रिकोणमिति के सभी सूत्र।
- भौतिक विज्ञान में आईआईटी स्तर के पांच सौ से अधिक सूत्र, जिसमें चुंबकीय क्षेत्र, इलेक्ट्रोस्टेटिक्स, मैगनेटिक्स शामिल हैं। किसी फार्मूले का मात्रक बता देने पर वह फार्मूला बता देती है। विमीय विश्लेषण से फार्मूला और फार्मूले से विमीय विश्लेषण निकालना उसके लिए बाएं हाथ का खेल है।
- रसायन विज्ञान में आवर्त सारणी को कहीं से भी किसी भी तरह बता देती है। सभी 112 एलिमेंट के भार और संख्या उसके सूत्र और पूरे नाम सहित बताती है।
- कंप्यूटर का पूरा की-बोर्ड आंख बंद करके बताती है।
- दसवीं के गणित के सूत्रों को आसानी से बता देती है।

Friday 11 January 2013

हमारी माँ अगर होती


हमारी माँ अगर होती, हमारे साथ में पापा|
फटकने दुख नहीं देती ,हमारे पास में पापा|


सुबह उठकर हमें वह दूध ,हँस हँस कर पिलाती थी|

डबल रोटी या बिस्कुट ,साथ में ,हमको खिलाती थी|

अगर होती सुबह से ही ,कभी की उठ चुकी होती|

हमें रहने नहीं देती, कभी उपवास में पापा|


हमारे स्वप्न जो होते, उन्हें साकार करती थी|

किसी भी और माता से,अधिक वह प्यार करती थी|

नहीं अब साथ में तो यह,जहां बेकार लगता है|

नहीं अब कुछ बचा बाकी,हमारे हाथ में पापा|


सदा सोने से पहले लोरियाँ ,हमको सुनाती थी|

इशारे से कभी चंदा, कभी तारे दिखाती थी|

हमें जब है जरूरत है,प्यार के बादल बरसने की|

पड़ा है किस तरह सूखा भरी बरसात में पापा|


हमें यूं छोड़कर जाने की,उसको क्या जरूरत थी|

उसी के साथ जीवन भर, हमें रहने की हसरत थी|
हमें लगता किसी ने,यूं नज़र हमको लगाई है|

छुपा बैठा हमारे घर,हमारी घात में पापा|
 

- प्रभुदयाल श्रीवास्तव : pdayal_shrivastava@yahoo.com


लेखन विगत दो दशकों से अधिक समय से कहानी,कवितायें व्यंग्य ,लघु कथाएं लेख, बुंदेली लोकगीत,बुंदेली लघु कथाए,बुंदेली गज़लों का लेखन प्रकाशन लोकमत समाचार नागपुर में तीन वर्षों तक व्यंग्य स्तंभ तीर तुक्का, रंग बेरंग में प्रकाशन,दैनिक भास्कर ,नवभारत,अमृत संदेश, जबलपुर एक्सप्रेस,पंजाब केसरी,एवं देश के लगभग सभी हिंदी समाचार पत्रों में व्यंग्योँ का प्रकाशन, कविताएं बालगीतों क्षणिकांओं का भी प्रकाशन हुआ|पत्रिकाओं हम सब साथ साथ दिल्ली,शुभ तारिका अंबाला,न्यामती फरीदाबाद ,कादंबिनी दिल्ली बाईसा उज्जैन मसी कागद इत्यादि में कई रचनाएं प्रकाशित|

Tuesday 1 January 2013

नव वर्ष- 2013 का अभिनन्दन !!

नव वर्ष का त्यौहार आया ! प्यार का पैगाम लाया !! भोर हुयी, कली मुस्कुराई ! नव वर्ष की शुभ बेला आई !!
  नई सुबह का आगमन होगा !
नव वर्ष का अभिनन्दन होगा !!

Sunday 23 December 2012

फिर भी सबसे ठीक हूँ

 
पढ़ने में थोड़ा वीक हूँ
फिर भी सबसे ठीक हूँ।

कभी नहीं मै कक्षा में
करता हूँ शैतानी
दिल दुखाना नहीं किसी का
समझाती है नानी।

इसीलिए मैं किसी को
नही देता हूँ संताप
दूजों को सुख मिले सदा
ऐसे करता हूँ उत्पात।

सहन नहीं कर पता
मैं कोई अत्याचार
मीठे बोल सभी से बोलूं
है ऐसा व्यवहार।

छोटे और बड़े सभी को
देता समुचित मान
भूले से भी मैं शत्रु का
न करता अपमान।

सीखा यही, सिखाता आया
बोल-बोल मृदुबानी
हँसा-हँसा कर करता हूँ
मै ज्ञान भरी शैतानी।

-सुमित कुमार भारती, लखनऊ-

Sunday 25 November 2012

बच्चों की बनाई पेंटिंग उभरेगी डाक-टिकट पर

हॉलिडे भला किसे नहीं भाता। हर बच्चे की अपनी कल्पनाएँ होती हैं कि हॉलिडे को कैसे खूबसूरत और यादगार बनाया जाय। और जब मौका इन्हें पेंटिंग के रूप में चित्रित करने का हो तो कैनवास पर कई तरह के रंग उभर कर आते हैं।  डाक विभाग द्वारा 23 नवम्बर, 2012 को आयोजित “डिजाईन ए  स्टाम्प” प्रतियोगिता में हॉलिडे विषय पर बच्चों ने पेंटिंग में ऐसे ही रंग बिखेरे।
 
       इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि इस प्रतियोगिता में इलाहबाद परिक्षेत्र में कुल 389 बच्चों ने भाग लिया, जिनमे इलाहाबाद में 37, प्रतापगढ़ में 78, जौनपुर में 79, व वाराणसी में 192 प्रतिभागी बच्चे  शामिल हैं।  इलाहाबाद  में कुल 18 स्कूलों के बच्चों ने प्रतियोगिता में हिस्सा लिया, जिनमे सैंट एंथोनी  गर्ल्स इन्टर कॉलेज, बिशप जॉन्सन इंटर कालेज, डा. के. एन. काटजू इंटर कालेज, ज्वाला देवी सरस्वती विद्या मंदिर, वशिष्ठ वात्सल्य पब्लिक स्कूल, पतंजलि ऋषिकुल इत्यादि शामिल हैं। सभी विद्यार्थियों को तीन समूहों में विभाजित किया गया - कक्षा 4 तक के विद्यार्थी, कक्षा 5 से कक्षा 8 तक के विद्याथी एवं कक्षा 9 से कक्षा 12 तक के विद्यार्थी ।
 
 निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि इन सभी प्रविष्टियों का मूल्यांकन रीजनल स्तर पर करने के बाद तीनों वर्गों में श्रेष्ठ प्रविष्टि को निदेशालय स्तर पर राष्ट्रीय प्रतियोगिता में शामिल करने हेतु परिमंडलीय कार्यालय लखनऊ भेजा जायेगा और  सभी श्रेणियों में प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्तर पर क्रमशः 10,000, 6,000 एवं 4,000 रूप्ये के तीन-तीन पुरस्कार राष्ट्रीय स्तर पर दिये जायेगें । राष्ट्रीय स्तर पर चुनी गयी पुरस्कृत प्रविष्टियों के आधार पर ही अगले वर्ष बाल दिवस पर डाक टिकट, प्रथम दिवस आवरण एवं मिनियेचर शीट इत्यादि का प्रकाशन किया जायेगा। इस अवसर पर स्कूली बच्चों , शिक्षको व अभिभावकों ने फिलाटेलिक डिपाजिट अकाउंट खोलने में भी रूचि दिखाई जिसके तहत उन्हें हर माह घर बैठे डाक टिकटें प्राप्त हो सकेंगी

Tuesday 13 November 2012

इको फ्रेंडली दीपावली मनाएं

दीपावली व आतिशबाजी का गहरा नाता है। लक्ष्मी पूजन के बाद शगुन के रूप में फोड़े जाने वाले पटाखे अब हमारी ही मौत का सामान बनते जा रहे हैं। हवा में जहर घोलते ये पटाखे कई प्रकार की शारीरिक व मानसिक व्याधियों को जन्म दे रहे हैं।

पटाखों की धमक हमारे चेहरे पर जरूर मुस्कान लाती है, पर यह मुस्कान हमारी बर्बादी का पूर्वाभ्यास होती है। इसका आभास हमें उस वक्त नहीं होता जब हम पटाखों की रोशनी में खो जाते हैं।

आजकल के युवा पटाखे खरीदते समय उसकी तीखे शोर व प्रकाश पर ध्यान देते हैं। पटाखे के रूप में हम पैसों की बर्बादी व जान को जोखिम में डालने का पूरा-पूरा सामान खुशी-खुशी घर लाते हैं।  
* बीमारियों को खुला न्योता :- पटाखे जब जलते हैं और तेज धमाके के साथ फूटते हैं तो हममें से हर किसी के चेहरे पर मुस्कुराहट छा जाती है। उस वक्त हम भूल जाते हैं कि इन पटाखों के काले धुएँ व शोर का हमारे शरीर पर क्या दुष्प्रभाव पड़ेगा?

जब पटाखे जलते व फूटते हैं तो उससे वायु में सल्फर डाइआक्साइड व नाइट्रोजन डाइआक्साइड आदि गैसों की मात्रा बढ़ जाती है। ये हमारे शरीर के लिए नुकसानदेह होती हैं। पटाखों के धुएँ से अस्थमा व अन्य फेफड़ों संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

* पटाखों का शोर मत कहना वन्स मोर :- पटाखों की आवाज हमारी श्रवण शक्ति पर भी प्रभाव डालती है। इससे भविष्य में हमारी श्रवण शक्ति कमजोर हो सकती है।

आम दिनों में शोर का मानक स्तर दिन में 55 व रात में 45 डेसिबल के लगभग होता है परंतु दीपावल‍ी आते-आते यह 70 से 90 डेसिबल तक पहुँच जाता है। इतना अधिक शोर हमें बहरा करने के लिए पर्याप्त है।

* पटाखे, हादसों का पर्याय :-
कोई चीज हमें नुकसान पहुँचा सकती है। यह जानते हुए भी हम उसका उपयोग करते हैं। पटाखे हादसों का पर्याय हैं। हमारी थोड़ी-सी लापरवाही हमारे अमूल्य जीवन को बर्बाद कर सकती है। यह जानते हुए भी हम अपने शौक के खातिर हँसते-हँसते अपनी जान को दाँव पर लगाते हैं।
प्रतिवर्ष दीपावली पर कई लोग पटाखों से जल जाते हैं व कई अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं। अनार, रॉकेट, रस्सी बम आदि धमाकेदार पटाखों के शौकीनों के साथ तो ये हादसे होते ही हैं। उस विध्वंसकारी चीज को आखिर हम क्यों इस्तेमाल करते हैं, जो हमें केवल क्षणिक सुख देती है?

* इकोफ्रेंडली पटाखे बेहतर विकल्प :-
पटाखों के शौकीनों के लिए इस दीपावली पर बाजार में इकोफ्रेंडली पटाखे आए हैं, जिससे आपका पटाखे जलाने का शौक भी पूरा हो जाएगा और वो भी वायुमंडल को नुकसान पहुँचाए बगैर। अब आप ही बताएँ कि है ना यह फायदे का सौदा?

जिस परिवेश में हम रहते हैं, उसी को हम प्रदूषित करके अपनी जान के लिए खतरा मोल लेते हैं। पटाखे फोड़ना कोई बुरी बात नहीं है। दीपावली खुशियों का त्योहार है तो क्यों न हम इस दीपावली पर वायुमंडल को नुकसान पहुँचाए बगैर इकोफ्रेंडली पटाखों से अपने इस शौक को पूरा करें।

डूडल फार गूगल कांटेस्ट के विजेता बने अरुण कुमार यादव

प्रतिभा उम्र की मोहताज़ नहीं होती, बशर्ते उसे उचित परिवेश मिले। गूगल इंडिया ने चंडीगढ़ केंद्रीय विद्यालय के 9वीं क्लास के स्‍टूडेंट अरुण कुमार यादव को डुडल 4 गुगल कंपीटीशन-2012 का विजेता घोषित किया है। कंपीटीशन में विनिंग डुडल टाइटल इंडिया - प्रिज्म ऑफ मल्‍टीपलसिटी को 14 नवंबर चिल्ड्रन डे पर गुगल इंडिया के होम पेज पर लाइव डिस्प्ले किया जाएगा। ये डुडल क्लासमेट कंपनी की ओर से स्पेशल कलर पैक और बच्चें की ड्राइंग बुक्स पर भी चित्रित किया जाएगा। कंपीटीशन में फाइनल में पहुंचने वाले सभी प्रतिभागियों को सैमसंग टैबलेट और गुगल गुड डी बैग्स दिए जाएंगे।

इस साल के कंपीटीशन का थीम एकता में अनेकता था जिसमें दो लाख के करीब एंट्रीज मिली थी। कंपनी ने गुगल लोगो पर 5 से 16 साल के बच्‍चों को डुडलिंग के जरिए अपनी सृजन क्षमता दिखाने के लिए आमंत्रित किया था। प्रतियोगिता को तीन अलग -अलग कैटेगरीज में बांटा गया था। पहली कैटेगरी पहली से तीसरी क्लास, दूसरी में चौथी से छठी क्लास के और तीसरी कैटेगरी में 7वीं से 10वीं कक्षा के बच्‍चों को शामिल किया गया था। यादव के अलावा पहली से तीसरी क्लास की कैटेगरी में श्री अरबिंदो स्‍कूल ऑफ इंटरनेशनल एजुकेशन की सौभाग्‍य कालिया शामिल है। जबकि गुडग़ांव की अदिति तिवारी को चौथी से छठी क्लास वाली कैटेगरी में अंतिम तेरह में शामिल किया गया है। सभी को हार्दिक बधाइयाँ !!

Wednesday 31 October 2012

बढ़ते बच्चों के लिए सही खुराक...

बच्चों की ग्रोइंग एज में उन्हें राइट डाइट देना वाकई बहुत जरूरी है। लेकिन इसके लिए आप उनसे जबर्दस्ती न करें। बेहतर होगा कि आप पहले हर चीज के न्यूट्रिएंट्स के बारे में जानकर बच्चों को स्मार्ट तरीके से वे आइटम सर्व करें:

बच्चों की ग्रोइंग एज में उनके लिए न्यूट्रिशंस बहुत जरूरी हैं। लेकिन आजकल लाइफस्टाइल और फूड ऑप्शंस के चलते बच्चे जंक फूड की तरफ ज्यादा अट्रैक्ट होते हैं। न्यूट्रिशनिस्ट डॉ. सुनीता दुबे कहती हैं, 'पैरंट्स को बच्चों में खाने-पीने की अच्छी आदतें डालनी चाहिए। अगर ये शुरुआत से ही इन आदतों के हिसाब से पाला जाए, तो ये पूरी जिंदगी बरकरार रहती हैं। फिर अगर बच्चों की डाइट सही हो, तो इससे बच्चों को एनर्जी मिलने के साथ ही उनका दिमाग भी बहुत शार्प होता है। यहां तक कि उनके मूड पर भी इसका पॉजिटिव असर पड़ता है।'

क्लिनिकल साइकॉलजिस्ट डॉ. नूपुर कृष्णन कहती हैं, 'बच्चों को एनर्जी की बहुत ज्यादा जरूरत होती है, क्योंकि वे इस टाइम पर वे अपनी ग्रोइंग एज में होते हैं। अगर इस स्टेज पर कोई डेफिशिएंसी रह जाए, तो इससे उनकी ग्रोथ पर बहुत असर होता है।' देखा जाए, तो प्रति किलोग्राम के हिसाब से एक बच्चे को एडल्ट्स की तुलना में ज्यादा कैलरीज की जरूरत होती है। बच्चों में मेटाबॉलिज्म रेट बहुत ज्यादा होता है और एज बढ़ने के साथ धीरे-धीरे यह कम होने लगता है। फिर बड़ों की तुलना में बच्चों की फिजिकल ऐक्टिविटी ज्यादा होती है।

एक बच्चे को बड़े की तुलना में ज्यादा प्रोटीन चाहिए होता है। यह न सिर्फ टिशूज को रिपेयर करने के लिए चाहिए होता है, बल्कि प्रॉपर ग्रोथ के लिए भी इसकी जरूरत होती है। कैलरीज के कुल हिस्से में से 14 से 15 पर्सेंट तक प्रोटीन होता है। प्रोटीन का मेन सोर्स दूध और दूध से बने प्रॉडक्ट्स हैं, मसलन दही, पनीर, लस्सी, श्रीखंड वगैरह। इसके अलावा मीट, फिश, ऐग, पल्सेज वगैरह को भी बच्चों की डाइट में शामिल किया जाना चाहिए। डॉ. कृष्णन के मुताबिक, किस बच्चे को दिन में कितनी कैलरीज की जरूरत है, यह उसकी हाइट, बिल्ट, जेंडर और ऐक्टिविटी लेवल पर डिपेंड करता है। वैसे, यह काम पैरंट्स का होगा कि वह इस बात का ध्यान रखें कि बच्चों को पूरी कैलरीज मिल रही हैं या नहीं।

न्यूट्रिशंस हैं जरूरी
डाइटिशियन और न्यूट्रिशनिस्ट वैशाली एम. कहती हैं, 'बच्चों के ग्रोइंग पीरियड में फिजिकल, बॉयोकेमिकल और इमोशनल डिवेलपमेंट तेजी से होता है। इस दौरान वे एडल्ट हाइट का 20 पर्सेंट और वेट का 50 पर्सेंट गेन कर लेते हैं। इस टाइम पर उनकी ग्रोथ बहुत तेजी से होती है, इसलिए उन्हें न्यूट्रिएंट्स की जरूरत भी ज्यादा होती है। इसके लिए उसकी डाइट में ऐसी चीजें शामिल करें, जिनसे उसे एनर्जी, प्रोटीन, मिनरल्स और विटामिन्स सभी सही अमाउंट्स में मिलें।'

ये हैं फूड सोर्स
कैल्शियम- मिल्क एंड मिल्क प्रॉडक्ट, स्प्राउट्स, नचनी, बाजरा, ज्वार, ब्लैक ग्राम दाल, सीड्स, ग्राउंडनट चिक्की, आलमंड, सोयाबीन, मेथी, बीटरूट। आयरन- सोयाबीन, पालक, गोभी, रेड मीट, ब्रोकली। विटामिन सी- ब्रोकली, कैप्सिकम, गोभी, स्ट्रॉबेरी, लेमन, मस्टर्ड, टनिर्प, ग्रीन पापाया, कैबेज, पालक। विटामिन ए- डार्क ग्रीन, येलो वेजिटेबल एंड फ्रूट्स, गाजर, टमाटर, दूध, मक्खन, चीज और अंडे।

ईटिंग हैबिट्स
- जहां तक हो सके, खाना घर पर बनाने की कोशिश करें।
- बच्चों को भी इसमें इन्वॉल्व करें। बच्चों को ये सिलेक्ट करने में मजा आता है कि उन्हें लंच में क्या खाना है और डिनर में क्या खाना है। इस दौरान आप उन्हें खाने की न्यूट्रिशनल वैल्यूज के बारे में बता सकती हैं।
- आप खाने को इनाम या सजा के तौर पर यूज न करें।
- बच्चे पर प्लेट में रखा खाना पूरा खाने के लिए दबाव न डालें।
- बच्चे को खाना तभी दें, जब उसे वाकई भूख लगी हो। अगर बेवजह प्रेशर डालेंगी, तो वह खाना से मन चुराने लगेगा.

(साभार : नवभारत टाइम्स-दिल्ली , 29 दिसंबर2011)

Saturday 27 October 2012

मेरी झोली में

मेरी झोली में
सपने ही सपने भरे
ले-ले आ कर वही
जिसका भी जी करे.

एक सपना है
फूलों की बस्ती का
एक सपना है
बस मौज मस्ती का,
मुफ्त की चीज है
फिर कोई क्यों डरे?

एक सपना है
रिमझिम फुहारों का
एक सपना है
झिलमिल सितारों का
एक सपना जो
भूखे का पेट भरे.
ले-ले आ कर वही
जिसका भी जी करे.


 


Wednesday 24 October 2012

यूँ आरंभ हुआ विजयदशमी पर्व

आज दशहरा (विजयदशमी) पर्व है. यह पर्व भारतीय संस्कृति में सबसे ज्यादा बेसब्री के साथ इंतजार किये जाने वाला त्यौहार है। दशहरा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के शब्द संयोजन "दश" व "हरा" से हुयी है, जिसका अर्थ भगवान राम द्वारा रावण के दस सिरों को काटने व तत्पश्चात रावण की मृत्यु रूप में राक्षस राज के आंतक की समाप्ति से है। यही कारण है कि इस दिन को विजयदशमी अर्थात अन्याय पर न्याय की विजय के रूप में भी मनाया जाता है। दशहरे से पूर्व हर वर्ष शारदीय नवरात्र के समय मातृरूपिणी देवी नवधान्य सहित पृथ्वी पर अवतरित होती हैं- क्रमशः शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी व सिद्धिदात्री रूप में माँ दुर्गा की लगातार नौ दिनों तक पूजा होती है।

ऐसी मान्यता है कि नवरात्र के अंतिम दिन भगवान राम ने चंडी पूजा के रूप में माँ दुर्गा की उपासना की थी और माँ ने उन्हें युद्ध में विजय का आशीर्वाद दिया था। इसके अगले ही दिन दशमी को भगवान राम ने रावण का अंत कर उस पर विजय पायी, तभी से शारदीय नवरात्र के बाद दशमी को विजयदशमी के रूप में मनाया जाता है और आज भी प्रतीकात्मक रूप में रावण-पुतला का दहन कर अन्याय पर न्याय के विजय की उद्घोषणा की जाती है.

दशहरे की परम्परा भगवान राम द्वारा त्रेतायुग में रावण के वध से भले ही आरम्भ हुई हो, पर द्वापरयुग में महाभारत का प्रसिद्ध युद्ध भी इसी दिन आरम्भ हुआ था। पर विजयदशमी सिर्फ इस बात का प्रतीक नहीं है कि अन्याय पर न्याय अथवा बुराई पर अच्छाई की विजय हुई थी बल्कि यह बुराई में भी अच्छाई ढूँढ़ने का दिन होता है।

आप सभी को विजयदशमी पर्व की ढेरों शुभकामनायें !!

कृष्ण कुमार यादव

Sunday 21 October 2012

हिंदी के श्रेष्ठ शिशु-बाल गीत

हिन्दी के श्रेष्ठ शिशु और बाल गीतों की यदि चर्चा हो तो सर्वप्रथम हमारा ध्यान लोक-साहित्य पर जाता है। जिसमें न केवल अनेक लोककथाओं को पिरोते हुए बच्चों के लिए कविताएँ मिलती हैं बल्कि स्वर, लय और ध्वनि के चमत्कार से सुसाित बाल-मन को लुभाने वाले अनेक खेल गीत भी विद्यमान हैं। बाल लोकगीतकारों ने शिशु-मानस को बहुत आत्मीयता से देखा है और उसके अनुरूप ही गीत रचे हैं। इन गीतों के रचयिताओं के नाम कोई नहीं जानता लेकिन ये बाल और शिशु गीत हिंदी समाज में बच्चों के मन को वर्षों से गुदगुदाते आए हैं।

अक्कड़-बक्कड़ बंबे बोअस्सी नब्बे पूरे सौ।
सौ में लगा धागाचोर निकल के भागा।
 
यह एक ऐसा लोक खेल-गीत है जिसे गाकर बच्चे अपना कोई भी खेल आरंभ करते हैं।
बच्चों के लिए लोक-साहित्य में चंदा को हमेशा बच्चों के मामा की तरह प्रस्तुत किया गया है और चंदा मामा को लेकर अनेक बाल तथा शिशु-गीत प्रचलित हैं।

चंदा-मामा दूर केपुए पकाए पूर के
आप खाए थाली मेंमुन्ने को दें प्याली में
प्याली गई टूटमुन्ना गया रूठ!

ये प्लालियाँ, कटोरियाँ जिसमें बच्चे दूध-दही-भात, मनपसंद व्यंजन खाते हैं-बच्चों के मन में बसी रहती हैं।

लल्ला लल्ला लोरीदूध की कटोरी
दूध में बताशालल्ला करें तमासा।


या फिर,

अटकन-बटकन दही चटाकनमामा लाए चार कटोरी
एक कटोरी टूट गईमामा की बहू रूठ गई।


लोक-साहित्य अलिखित साहित्य है। पर हिंदी में लिखित बाल-साहित्य का प्रारंभ हम भारतेन्दु-युग से मान सकते हैं। इससे पहले बाल-साहित्य के नाम पर संस्कृत से हिंदी में अनुवादित केवल पंचतंत्र और हितोपदेश जैसी कृतियाँ ही थीं। इसमें बेशक बच्चों की अस्मिता झलकती है। भारतेंदु हरिश्चन्द्र की प्रेरणा से बाल-दर्पण (1862) तथा बालबोधिनी (1874) पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ। इन पत्रिकाओं से ही हिंदी में बाल-साहित्य का जन्म हुआ। भारतेंदु-युग के प्रमुख बाल साहित्यकारों में सबसे पहले स्वयं भारतेन्दु हरिशचन्द्र का ही नाम आता है। आपकी बालोपयोगी पुस्तकों में सत्य हरिश्चन्द्र, अंधेर नगरी, बादशाह दर्पण और कश्मीर कुसुम प्रमुख हैं। अंधेर नगरी की ये पंक्तियाँ तो आज भी बच्चों का ही नहीं, बड़ों-बड़ों का भी केवल मनोरंजन ही नहीं करतीं, उन्हें सोचने के लिए भी बाध्य करती हैं।

अंधेर नगरी चौपट राजा।
टके सेर भाजी, टके सेर खाजा॥


पूर्व स्वतंत्रता युग, जिसे हम 1901 से 1947 तक मान सकते हैं, में हिन्दी बाल साहित्य में काफी बढ़ोतरी हुई। इस काल के बाल साहित्यकारों में कामताप्रसाद गुरु, मैथिलीशरण गुप्त, रामनरेश त्रिपाठी, सुखदेव चौबे, विद्याभूषण, विशु, गिरजा दत्त शुक्ल, श्रीनाथ सिंह, सोहनलाल द्विवेदी, रामेश्वर गुरु, आदि प्रमुख हैं। इनमें से कई ऐसे कविलेखक हैं जो स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े रहे और जिनमें राष्ट्रीय भावना की प्रमुखता रही। इनकी बाल कविताएं भी राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत रहीं। सोहनलाल द्विवेदी इनमें प्रमुख कवि कहे जा सकते हैं। हजारी प्रसाद द्विवेदी का कहना था कि हिंदी में बड़े-बड़े साहित्यकार तो हैं किंतु बच्चों के माई-बाप तो केवल सोहनलाल द्विवेदी हैं। द्विवेदी जी ने राष्ट्रभाव को विकसित और प्रेरित करने के लिए अनेकानेक बाल गीत लिखे और इनमें उपदेश भी कुछ इस तरह दिया कि बच्चों का अपना स्वाद बरकरार रहे-

मीठा होता खस्ता खाजा
मीठा होता हलुआ ताजा
मीठे होते गट्टे गोल
सबसे मीठे, मीठे बोल
मैंने पाले बहुत कबूतर
भोले भाले बहुत कबूतर
पहने हैं पैंजनी कबूतर





बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दौर में जिन्हें और शिशु गीतकारों के रूप में प्रथम कवियों में सम्मिलित किया जा सकता है वे हैं, श्रीधर पाठक, बालमुकुंद गुप्त, सत्यनारायण कविरत्न आदि। बालमुकुंद गुप्त ने रेलगाड़ी नाम से एक अत्यंत सुंदर कविता लिखीं-

हिस हिस हिस हिस हिस हिस करती
रेल धड़ाधड़ जाती है
जिन जंजीरों से जकड़ी है
उन्हें खूब खड़काती है।





इस बाल गीत में स्पष्ट ही स्वतंत्रता के लिए प्रयत्न करने का उपदेश भी निहित है। इस काल प्रसंग में यदि अयोध्यासिंह उपाध्याय का नाम न लिया जाय तो यह उनके साथ बड़ा अन्याय होगा। हरिऔघ एक गंभीर कवि थे, लेकिन उन्होंने कई बालोपयोगी कविताएं लिखीं। उन्हें भी हिंदी के प्रथम बालकवियों में नि:संदेह रखा जा सकता है। उनकी एक प्रसिद्ध कविता बंदर शीर्षक से है-

देखो लड़कों बंदर आयाएक मदारी उसको लाया।
उसका है कुछ ढंग निरालाकानों में पहने वो बाला॥




पूर्व स्वतंत्रता युग के कुछ अन्य कवियों ने अत्यंत रोचक और बाल-मन में अपनी पैठ बनाती कविताएं रची हैं जिन्हें हम न केवल उत्कृष्ट कविताएं कह सकते हैं, बल्कि जो शिशु-बाल गीत लेखन के लिए एक मापदंड बनाती हैं। श्रीनाथ सिंह की एक कविता है-

नानी का संदूक
नानी का संदूक निरालाहुआ धुएं से बेहद काला
पीछे से वह खुल जाता हैआगे लटका रहता ताला
चंदन चौकी देखी उसमेंसूखी लौकी देखी उसमें
बाली जौ की देखी उसमेंखाली जगहों में है ताला।


भावपूर्ण, संवेदनशील और श्रेष्ठ गीतों को लिखने में जिस कवि ने सचमुच एक बड़ा और युगांतर काम किया है, वह है निरंकार देव सेवक। उन्होंने ही सच पूछा जाय, शिशु गीतों की असली पहचान कराई, उनकी खूबियों पर प्रकाश डाला और साथ ही उन्हें एक आधुनिक मुहावरा दिया। उनका एक मजेदार बाल गीत इस प्रकार है-

अगर मगर दो भाई थे, लड़ते खूब लड़ाई थे।
अगर मगर से छोटा था, मगर मगर से खोटा था.


-


अभी तक चिड़िया हिंदी शिशुबाल कविताओं में चीं चीं चूं चूं ही बोलती थी। एक प्रसिद्धि कविता है- चिडिया है चीं चीं बोल रही कानों में अमृत घोल रही वे फुदक-फुदक इठलाती हैं वे सबका मन बहलाती हैं। निरंकार जी ने चिड़ियों की बोली को एक नया आकार दिया। चिड़ियों की यह नई बोली हिंदी को अंग्रेजी अक्षरों और उनके संयोजन से मिली

टी-टुट टुट
चिड़िया कहती टी-टुट टुट, मुझको भी दे दो बिस्कुट
भूखी हूं, मैं खाऊंगी, खा पीकर उड़ जाऊंगी





यह वह समय था जब अंग्रेजी साहित्य का हिंदी पर गहरा प्रभाव पड़ रहा था। वस्तुत: हिंदी का सारा छायावादी साहित्य अंग्रेजी रोमेटिज्म से प्रभावित और प्रेरित था। इसी प्रभाव में सुमित्रानन्दन पंत ने यह कविता लिखी-

संध्या का झुटपुटबांसों का झुरमुट
थीं चहक रहीं चिड़ियां टी वी टी टुट टुट





ये पंक्तियां एक गंभीर कविता का अंश है। लेकिन सेवक जी ने चिड़ियों की इस अंग्रेजी बोली को स्पष्ट ही शिशु गीत में पिरोया है।

पूर्व स्वतंत्रता युग ने यदि हिंदी शिशु बाल गीतों के लिए एक सुदृढ़ आधार तैयार किया तो स्वतंत्रता के बाद के युग में ऐसे गीतों के लिए एक अच्छी और मजबूत इमारत बनी। इस युग के कवियों में दामोदर अग्रवाल, शेर जंग गर्ग, बाल स्वरूप राही, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, योगेन्द्र कुमार लल्ला, सूर्य कुमार पांडे, शंकुतला सिरोठिया आदि नाम सम्मान से लिए जा सकते हैं।
सेवक जी के बाद शिशु गीतों को और भी अधिक ऊंचाई पर ले जाने वालों में शेर जंग गर्ग का नाम सर्वोच्च शिखर पर है। बाल-मन को लुभाने वाले उनके नटखट और चुटीले गीत बहुत ही प्यारे बन पड़े है
कितनी अच्छी कितनी प्यारीसब दुनिया से न्यारी गाय
सारा दूध हमें दे देतीआओ इसे पिलाएं चाय
अथवा
गुड़िया है आफत की पुड़ियाबोले हिंदी कन्नड़ उड़िया।
नानी के संग भी खेली थीकिंतु अभी तक हुई न बुढ़िया॥
इन गीतों में जहां बच्चों के लिए मनोरंजन है, वहीं एक खिलंदडेपन के साथ विचार को प्रेरित करने वाले तत्व भी हैं। यही बात हमें दामोदर अग्रवाल के बाल-गीतों में भी दिखाई देती है। उन्होंने प्रकृति के कई रंग-बिरंगे चित्र तो खींचे ही हैं
कुछ रंग भरे फूलकुछ खट्टे मीठे फलथोड़ी बांसुरी की धुनथोड़ा जामुन का जल- परंतु उनके गीतों में कहीं न कहीं विचार भी समाहित है।
सड़क पर मिले जो मुझे एक पैसा
मैं झट से उसे अपनी मुट्ठी में ले लूं
मैं झट से उसे अपने भाई को दे दूं
मैं झट सेउसे अपनी मां को दिखाऊं
मैं सबको चलूं ले के मेला दिखाऊं
मैं राजा बनूं और हाथी पे घूमूं
मैं वो पैसा पूरा का पूरा लूटा दूं
मैं पैसा लुटाकर गरीबी मिटा दूं
योगेन्द्र कमार लल्ला और सूर्य कुमार पांडे के शिशु-गीत भी उल्लेखनीय हैं। उन्हें बिना किसी विवाद के श्रेष्ठ गीतों में रखा जा सकता है। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना एक बड़े कवि हैं। लेकिन बाल मन में उनकी पैठ देखते ही बनती है। उनकी प्रसिद्ध कविता-इब्नबतूतापहन के जूता-हमारा ध्यान तो खींचती ही है, बच्चों के दिल को भी आकर्षित करती है। हाल ही में इसकी प्रथम पंक्ति को टेक बनाकर एक फिल्मी गाना काफी चर्चा में रहा और गीतकार गुलजार पर आरोप लगाए गए। पर मुद्दे की बात यह है कि गुलजार जैसे कवि भी इस गीत के आकर्षण से बच नहीं पाए। सर्वेश्वर जी का पूरा गीत इस प्रकार है
इब्नबतूता पहन के जूता निकल पड़े तूफान में
थोड़ी हवा नाक में घुस गई
थोड़ी घुस गई कान में
कभी नाक को कभी कान को
मलते इब्नेबतूता
इसी बीच में निकल पड़ा
उनके पैरों का जूता
उड़ते-उड़ते जूता उनका
जा पहुंचा जापान में
इब्नबतूता खड़े रह गए मोची की दुकान में।

यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि हिन्दी जगत में कोई भी कवि अपने को बाल कवि के रूप में स्थापित करने के लिए उत्सुक नहीं हैं। बड़े-बड़े कवियों ने तमाम अच्छे शिशु और बाल गीत लिखे हैं। बाल साहित्य रचा है। कुछ ने तो अपना लेखन ही बाल साहित्य से आरंभ किया है। लेकिन आगे चलकर वे प्रौढ़ साहित्य की ओर प्रवृत्त हो गए। बाल साहित्य उनके लिए गौण हो गया। यह ध्यातव्य है कि हिंदी के अनेक बड़े और प्रतिष्ठित कवियों ने बाल साहित्य की रचना की। उनमें मुंशी प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, निराला, सुमित्रानंदन पंत, सुभद्राकुमारी चौहान, मैथिलीशरण गुप्त, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना आदि साहित्यकारों का नाम लिया जा सकता है। किंतु क्योंकि हिंदी में बाल साहित्य हमेशा ही दोयम दर्जे का साहित्य माना गया अत: बड़े साहित्यकार इससे विमुख हो गए। आज जरूरत है कि प्रतिभा संपन्न साहित्यकार बाल लेखन की ओर प्रवृत्त हों और अपने को बाल साहित्यकार कहलाने में गौरवान्वित महसूस करें।

-डा. सुरेन्द्र वर्मा
10 एचआईजी-1, 29 कलर रोड, इलाहाबाद-11001

(साभार: लोक गंगा)