Tuesday 14 October 2014

'स्वच्छ भारत' को लेकर बच्चों ने बनाया डाक टिकट

 'स्वच्छ भारत' की संकल्पना को लेकर राष्ट्रीय डाक सप्ताह दौरान आयोजित फिलेटली दिवस पर स्कूली बच्चों ने  डाक टिकट बनाया। इलाहाबाद में 13 अक्टूबर, 2014 को आयोजित इस कार्यक्रम में बच्चों ने 'स्वच्छ भारत' के प्रति अपनी भावनाओं को खूबसूरत चित्रों में ढालते हुए भिन्न-भिन्न रंग भरे।  रंग भी इतने करीने से कि स्वच्छ्ता का अहसास करायें।  किसी ने भारत का नक्शा बनाकर तो किसी ने बापू जी माध्यम से स्वच्छ्ता का सन्देश दिया। इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि  इसका उद्देश्य डाक-टिकट संग्रह के प्रति बच्चों में अभिरूचि विकसित करना और डाक टिकटों के माध्यम से युवा पीढी को डाक सेवाओं के इतिहास से जोड़ते हुए 'राष्ट्रीय स्वच्छ्ता अभियान' से जोड़ना था।


(राष्ट्रीय बालश्री विजेता एलिस अंशु फिलिप को पुरस्कृत करते निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव)


डाक निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने डाक टिकट डिजायन प्रतियोगिता के विजेताओं को पुरस्कृत भी किया। इनमें सीनियर वर्ग में सेंट एंथनी गर्ल्स  कान्वेंट की छात्रा एवं राष्ट्रीय बाल-श्री विजेता एलिस अंशु फिलिप ने प्रथम, श्रेया डे ने द्वितीय तथा ज्वाला देवी विद्या मंदिर के आशीष कुमार यादव को तृतीय स्थान प्राप्त हुआ। जूनियर वर्ग में ज्वाला देवी विद्या मंदिर के ईशू सेठ व प्रखर खरे ने क्रमशः प्रथम व द्वितीय स्थान प्राप्त किया।  

Wednesday 10 September 2014

है न अजूबा : अब डाक टिकट पर हो सकती है आपकी फोटो


डाक टिकट पर अभी तक आपने गांँधी, नेहरू या ऐसे ही किसी महान विभूति की फोटो देखी होगी। पर अब डाक टिकट पर आप की फोटो भी हो सकती है और ऐसा संभव है डाक विभाग की ’’माई स्टैम्प’’ सेवा के तहत। 


वाराणसी  में 6 सितम्बर, 2014 को माई स्टैम्प सेवा का उद्घाटन करते हुए इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएँ कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि फिलहाल उत्तर प्रदेश में यह सेवा लखनऊ, आगरा व फतेहपुर सीकरी में उपलब्ध है और अब वाराणसी में। उन्होंने कहा कि माई स्टैम्प की थीम फिलहाल आकर्षक पर्यटन स्थलों पर आधारित रखी गई है। माई स्टैम्प फिलहाल 10 थीम के साथ उपलब्ध है, जिनमें-ग्रीटिंग्स, ताजमहल, लालकिला, कुतुब मीनार, हवा महल, मैसूर पैलेस, फेयरी क्वीन, पोर्ट ब्लेयर द्वीप, अजन्ता की गुफाएँं एवं सेंट फ्रांसिस चर्च शामिल हैं। 

डाक निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि माई स्टैम्प सेवा का लाभ उठाने के लिए एक फार्म भरकर उसके साथ अपनी फोटो और रूपय 300/- जमा करने होते हैं। एक शीट में कुल 12 डाक-टिकटों के साथ फोटो लगाई जा सकती है। इसके लिए आप अपनी अच्छी तस्वीर डाक विभाग को दे सकते हैं, जो उसे स्कैन करके आपकी खूबसूरत डाक-टिकट बना देगा। श्री यादव ने कहा कि यदि कोई तत्काल भी फोटो खिंचवाना चाहे तो उसके लिए भी प्रबंध किया गया है। पाँंच रुपए के डाक-टिकट, जिस पर आपकी तस्वीर होगी, वह देशभर में कहीं भी भेजी जा सकती है। इस पर सिर्फ जीवित व्यक्तियों की ही तस्वीर लगाई जा सकती है। 



डाक निदेशक कृष्ण कुमार यादव ने इसके व्यावहारिक पहलुओं की ओर इंगित करते हुए कहा कि किसी को उपहार देने का इससे नायब तरीका शायद ही हो। इसके लिए जेब भी ज्यादा नहीं ढीली करनी पड़ेगी, मात्र 300 रूपये में 12 डाक-टिकटों के साथ आपकी खूबसूरत तस्वीर। अब आप इसे चाहें अपने परिवारजनों को दें, मित्रों को या फिर अपने किसी करीबी को। यही नहीं अपनी राशि के अनुरूप भी डाक-टिकट पसंद कर उस पर अपनी फोटो लगवा सकते हैं। आप किसी से बेशुमार प्यार करते हैं, तो इस प्यार को बेशुमार दिखाने का भी मौका है। 
         
माई स्टैम्प स्कीम के आरंभ के बारे में बताते हुए निदेशक डाक सेवाएँ कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि दुनिया के कुछेक देशों में माई स्टाम्प सुविधा पहले से ही लागू है, पर भारत में इसका प्रचलन नया है। वर्ष 2011 में नई दिल्ली में विश्व डाक टिकट प्रदर्शनी (12-18 फरवरी 2011) के आयोजन के दौरान इसे औपचारिक रूप से लांच किया गया। उसके बाद इसे अन्य प्रमुख शहरों में भी जारी किया गया और लोगों ने इसे हाथों-हाथ लिया। नतीजन देखते ही देखते हजारों लोगों ने डाक टिकटों के साथ अपनी तस्वीर लगाकर इसका लुत्फ उठाया। इसकी लोकप्रियता के मद्देनजर इसे अब वाराणसी में भी आरंभ किया जा रहा है।  





Monday 8 September 2014

गणतंत्र दिवस-2015 पर डाक टिकट के रूप में जारी हो सकता है आपका बनाया चित्र

हर किसी की चाहत होती है कि उसका बनाया चित्र डाक टिकट पर एक धरोहर के रूप में अंकित हो। भारतीय डाक विभाग ऐसे लोगों के लिए एक सुनहरा मौका लेकर आया है, जहाँ डाक टिकट पर आप द्वारा बनाया मौलिक चित्र स्थान पा सकता है। 

इस संबंध में जानकारी देते हुए इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि आगामी गणतंत्र दिवस-2015 के लिए डाक विभाग ने ’स्वच्छ भारत’ थीम पर डाक टिकट डिजाइन प्रतियोगिता की घोषणा की है, जिसके तहत कोई भी भारतीय नागरिक इस विषय पर डाक टिकट व अन्य फिलेटेलिक सामग्री हेतु अपना मौलिक डिजाइन भेज सकता है। 

डाक निदेशक श्री यादव ने बताया कि यह डिजाइन इंक, वाटर व आयल कलर इत्यादि में हो सकती है, पर कम्प्यूटर प्रिन्टेंड/प्रिंट आउट की अनुमति नहीं होगी। डिजाइन के पीछे प्रतिभागी का नाम, उम्र, राष्ट्रीयता, पिन कोड के साथ आवासीय पता, फोन/मोबाइल नं0 व ई-मेल लिखा होना चाहिए। इसके साथ ही मौलिकता का एक घोषणपत्र भी संलग्न करना होगा। संबंधित प्रतिभागी स्पीड पोस्ट के माध्यम से 15 अक्टूबर 2014 तक अपनी प्रविष्टियाँ सहायक महानिदेशक (फिलेटली), कक्ष संख्या 108 (बी), डाक भवन, पार्लियामेंट स्ट्रीट, नई दिल्ली-110001 पर भेज सकते हैं। स्पीड पोस्ट लिफाफे के ऊपर ’’गणतंत्र दिवस 2015-डाक टिकट डिजायन प्रतियोगिता’’ अवश्य अंकित होना चाहिए।

डाक निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि डाक टिकट डिजाइन हेतु राष्ट्रीय स्तर पर क्रमशः 10,000, 6000 व 4000 रूपये का प्रथम, द्वितीय व तृतीय पुरस्कार भी दिया जायेगा।

Sunday 7 September 2014

शिक्षक दिवस के बहाने बाल-मन से रूबरू हुए प्रधानमंत्री मोदी

शिक्षक दिवस पर पहली बार हुआ कि देश के प्रधानमंत्री ने स्कूली बच्चों को सम्बोधित किया हो। देशभर के बच्चों के साथ संवाद के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि यह मेरे लिए एक सौभाग्‍य की घड़ी है, कि मुझे उन बालकों के साथ बातचीत करने का अवसर मिला है, जिनकी आंखों में भारत के भावी सपने सवार हैं, मगर धीरे-धीरे इस प्रेरक प्रसंग की अहमियत कम होती जा रही है। प्रधानमंत्री ने कहा कि शायद, बहुत सारे ऐसे स्‍कूल होंगे, जहां 5 सितंबर को याद भी नहीं किया जाता होगा, शिक्षकों को अवार्ड मिलना, उनका समारोह होना, यह ज्‍यादातर वहीं तक ही सीमित हो गया है। उन्होंने कहा कि आवश्‍यकता है कि हम इस बात को उजागर करें कि समाजिक जीवन में शिक्षक का महात्‍म्‍य क्‍या है और जब तक हम उस महात्‍म्‍य को स्‍वीकार नहीं करेंगे, न उस शिक्षक के प्रति गौरव पैदा होगा, न शिक्षक के माध्‍यम से नई पीढ़ी में परिवर्तन में कोई ज्‍यादा सफलता प्राप्त होगी, इस एक महान परंपरा को समयानुकूल परिवर्तन करके उसे अधिक प्राणवान एवं और अधिक तेजस्‍वी कैसे बनाया जाए इस पर एक चिंतन बहस होने की आवश्‍यकता है। प्रधानमंत्री ने सवाल उछाला कि क्‍या कारण है कि बहुत ही सामर्थ्यवान विद्यार्थी, टीचर बनना पसंद क्‍यों नहीं करते? इस सवाल का जवाब हम सबको खोजना होगा। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि एक वैश्विक परिवेश में ऐसा माना जाता है कि सारी दुनिया में अच्‍छे टीचरों की बहुत बड़ी मांग है, अच्‍छे टीचर मिल नहीं रहे हैं, भारत एक युवा देश है, क्‍या भारत यह सपना नहीं दे सकता कि हम देश से उत्‍तम प्रकार के टीचर्स एक्‍सपोर्ट करेंगे? आज जो बालक हैं, उनके मन में हम यह इच्‍छा नहीं जगा सकते कि मैं भी एक अच्‍छा टीचर बनकर देश और समाज के लिए काम आऊंगा, ये भाव कैसे जगे? प्रधानमंत्री ने कहा कि डॉ सर्वपल्‍ली राधाकृष्‍णन ने इस देश की उत्‍तम सेवा की है, वह अपना जन्‍मदिन नहीं मनाते थे, व‍ह शिक्षक का जन्‍म दिन मनाने का आग्रह करते थे, ये शिक्षक दिवस की कल्‍पना ऐसे पैदा हुई है, खैर अब तो दुनिया के कई देशों में इस परंपरा को जन्‍म मिला है। उन्होंने कहा किदुनिया में किसी भी बड़े व्‍यक्ति से पूछिए, अपने जीवन में सफलता के बारे में वह दो बातें अवश्‍य बताएगा, एक कहेगा कि मेरी मां का योगदान है और दूसरी कहेगा कि मेरे शिक्षक का योगदान है, करीब-करीब सभी महापुरूषों के जीवन में ये बात हमें सुनने को मिलती हैं, लेकिन क्या हम जहां हैं, वहां यही बात हम सजगतापूर्वक करने का प्रयास करते हैं? 

नरेंद्र मोदी ने कहा कि एक जमाने में शिक्षक के प्रति ऐसा भाव था कि गांव में सबसे आदरणीय कोई व्‍यक्ति हुआ करता था, तो वह शिक्षक हुआ करता था-‘नहीं मास्‍टर जी ने बता दिया है, मास्‍टर जी ने कह दिया है, ऐसा एक भाव था’ धीरे-धीरे स्थिति काफी बदल गई है, उस स्थिति को हम पुन: प्रतिस्‍थापित कर सकते हैं। उन्होंने बच्चों से कहा कि एक बालक के नाते आपके मन में काफी सवाल होगें, आपमें से कई बालक ऐसे होंगे, जिनको छुट्टी के दिन परेशानी होती होगी कि सोमवार कैसे आए और संडे को हमने क्‍या-क्‍या किया, जिसे स्कूल जाकर टीचर को बताऊंगा, जो अपनी मां को नहीं बता सकता, अपने भाई-बहन को नहीं बता सकता, वो बात अपने टीचर को बताने के लिए वह इतना लालायित रहता है, उसको टीचर से इतना आपनापन हो जाता है, कि वही उसके जीवन को बदलता है, फिर उसका शब्‍द उसके जीवन में बहुत बड़ा बदलाव लाता है। उन्होंने कहा कि मैंने कई ऐसे विद्यार्थी देखें हैं, जो बात भी ऐसे बनाएंगे, जैसे उसका टीचर बनाता है, कपड़े भी ऐसे पहनेंगे जैसे उनका टीचर पहनता है, वो उनका हीरो होता है, ये जो अवस्‍था है, उस अवस्‍था को जितना हम प्राणवान बनाएंगे, उतनी ही अच्छी हमारी नई पीढ़ी तैयार होगी। 

प्रधानमंत्री ने कहा कि चीन में एक कहावत है कि जो लोग साल का सोचते हैं, वो अनाज बोते हैं, जो दस साल का सोचते हैं, वो फलों के वृक्ष बोते हैं, लेकिन जो पीढ़ियों को सोचते हैं वो इंसान बोते हैं, मतलब उसको शिक्षित करना, संस्‍कारित करना उसके जीवन को तैयार करना, हमारी शिक्षा प्रणाली को जीवन निर्माण के साथ कैसे हम जीवंत बनाएं ये सोचना और करना बहुत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि मैंने 15 अगस्‍त को एक बात कही थी, कि मेरी इच्‍छा है कि हमारे देश में इस वर्ष जितने स्‍कूल हैं, उनमें कोई स्‍कूल ऐसा न हो, जिसमें बालिकाओं के लिए अलग टायलेट न हो, आज कई स्‍कूल ऐसे हैं, जहां बालिकाओं के लिए अलग टायलेट नहीं हैं, कुछ स्‍कूल ऐसे भी हैं, जहां बालक के लिए भी नहीं और बालिका के लिए भी टायलेट नहीं है, अब यूं तो लगेगा कि ये भी कोई काम है कि जो प्रधानमंत्री के लिये महत्वपूर्ण है, लेकिन जब मैं डिटेल में गया तो मुझे लगा कि यह बड़ा महत्‍वपूर्ण काम है, करने जैसा काम है, लेकिन देशभर के जो भी टीचर मुझे सुन रहे हैं, उनसे मुझे हर स्‍कूल में मदद चाहिए, इसके लिए एक माहौल बनना चाहिए। 

उन्होंने कहा कि मैं अभी जापान गया था, वहां एक भारतीय परिवार मुझसे मिला, लेकिन उनकी पत्‍नी जापानी है, पतिदेव इंडियन हैं वो मेरे पास आकर बोले कि एक बात करनी है, मैंने कहा बताओ, बोले कि आपका 15 अगस्‍त का भाषण भी सुना था, आप जो साफ-सफाई पर बड़ा आग्रह कर रहे हैं, हमारे यहां नियम है कि जापान में हम सभी टीचर और स्‍टूडेंट मिलकर के स्‍कूल में सफाई करते हैं, टायलेट वगैरह की सब मिलकर सफाई करते हैं, हमारे स्‍कूल में ये हमारे चरित्र निर्माण का एक हिस्‍सा है, आप हिंदुस्‍तान में ऐसा क्‍यों नहीं कर सकते हैं? मैंने कहा कि मुझे जाकर मीडिया वालों से पूछना पड़ेगा, वरना इसका उलटा 24 घंटे चल पड़ता है, क्‍योंकि मैंने एक दिन ऐसा देखा था, जब मैं गुजरात में था तो टीवी पर समाचार आ रहा था और समाचार ये था कि गुजरात में बच्‍चे स्‍कूल में सफाई करते हैं और क्या तूफान खड़ा कर दिया था ये कैसा स्‍कूल हैं?, ये कैसा मैनेजमेंट है? ये कैसे टीचर हैं? बच्‍चों का दमन करते हैं, मैने उस दिन टीवी पर ये सब कुछ देखा था, लेकिन हम इसको एक राष्‍ट्रीय चरित्र कैसे बनाएं? ये बन सकता है और इसे बनाया जा सकता है। 

प्रधानमंत्री ने देश के गणमान्‍य लोगों से आग्रह करते हुए कहा कि वे डाक्‍टर बने होंगे, व‍कील बने होंगे, इंजीनियर बने होंगे, आईएएस अफसर बने होंगे, आईपीएस अफसर बने होंगे, बहुत कुछ होंगे, मगर क्‍या आप अपने निकट का कोई स्‍कूल पसंद करके सप्‍ताह में एक पीरियड, उन बच्‍चे को पढ़ाने का काम कर सकते हैं? स्‍कूल के साथ बैठ करके आप विषय तय करें, आप कितने ही पढ़े-लिखे या बड़े अफसर क्‍यों न हों, सप्‍ताह में पास के स्कूल जाकर एक पीरियड बच्‍चों के साथ बिताएं, उनको कुछ सिखाएं। उन्होंने कहा कि शिक्षा में कहीं कोई शिकायत है कि अच्‍छे टीचर नहीं हैं, ये फलाना नहीं है, ढिकाना नहीं है, इसको ठीक किया जा सकता है, हम राष्‍ट्र निमार्ण को एक जनांदोलन में परिवर्तित करें, हर किसी की शक्ति को जोड़ें, हम ऐसा देश नहीं हैं कि जिसको इतना पीछे रहने की जरूरत है, हम बहुत आगे जा सकते हैं और इसलिए हमारा राष्‍ट्रीय चरित्र कैसे बने, इस पर हम लोगों का कोई इंफैसिस होना चाहिए, प्रयास होना चाहिए और हम सब इसे मिलकर करेंगे, इसको किया जा सकता है। उन्होंने बच्चों से कहा कि एक विद्यार्थी के नाते आपके भी बहुत सारे सपने होंगे, मैं मानता हूं कि ज़िंदगी में परिस्थितियां किसी को भी रोक नहीं पाती हैं, अगर आगे बढ़ने वालों के इरादों में दम हो तो मैं मानता हूं कि इस देश के नौजवानों में, बालकों में वो सामर्थ्‍य है, उस सामर्थ्‍य को लेकर वो आगे बढ़ सकते हैं। 
उन्होंने कहा कि टेक्‍नोलॉजी का महात्‍म्‍य बहुत बढ़ रहा है, मैं सभी शिक्षकों से आग्रह करता हूं कि कुछ अगर सीखना पड़े तो सीखें, भले ही हमारी आयु 40-45-50 पर पहुंची हो, मगर हम सीखें और हम जिन बालकों के साथ जी रहे हैं, जो कि आज टेकनोलॉजी के युग में पल रहा है, बढ़ रहा है, उसे उससे वंचित न रखें, अगर हम उसे वंचित रखेंगे तो यह बहुत बड़ा क्राइम होगा, इट्स ए सोशल क्राइम, हमारी कोशिश होनी चाहिए कि आधुनिक विज्ञान, टेक्‍नोलॉजी से हमारे बालक जुड़ें, विश्‍व को उस रूप में जानने के लिए उसको वह अवसर मिलना चाहिए, यह हमारी कोशिश रहनी चाहिए। प्रधानमंत्री ने कहा कि मैं भी आपसे एक सवाल पूछना चाहता हूं, जवाब देंगे आप लोग? देंगे ? अच्‍छा, आप में से कितने बालक हैं, जिनको दिन में चार बार भरपूर पसीना निकलता है शरीर से? कितने हैं? नहीं हैं ना? देखिए जीवन में खेल-कूद नहीं है तो जीवन खिलता नहीं है, ये उम्र ऐसी है, इतना दौड़ना चाहिए, इतनी मस्‍ती करनी चाहिए, इतना समय निकालना चाहिए, शरीर में कम से कम चार बार पसीना निकलना चाहिए, आप किताब, टीवी और कंप्‍यूटर, इस दायरे में ज़िंदगी नहीं दबनी चाहिए, इससे भी बहुत बड़ी दुनिया है और इसलिए ये मस्‍ती हमारे जीवन में होनी चाहिए, आप लोगों में से कितने हैं, जिनको पाठ्यक्रम के सिवाय किताबें पढ़ने का शौक हैं? चलिये बहुत अच्‍छी संख्‍या में हैं, ज्‍यादातर जीवन चरित्र पढ़ने का शौक है, ऐसे लोग कितने हैं? वो संख्‍या बहुत कम है, मेरा विद्यार्थियों से आग्रह है, जिसकी जीवनी आपको पसंद हो, उसका जीवन चरित्र आपको पढ़ना चाहिए, जीवन चरित्र पढ़ने से हम इतिहास के बहुत निकट जाते हैं, क्‍योंकि उस व्‍यक्ति के बारे में जो भी लिखा जाता है, उसके नजदीक के इतिहास को हम भलीभांति जानते हैं। 

उन्होंने कहा कि कोई जरूरी नहीं है कि एक ही प्रकार के जीवन को पढ़ें, खेल-कूद में कोई आगे बढ़ा है तो उसका जीवन चरित्र पढ़ना चाहिए, सिने जगत में किसी ने प्रगति की है, उसका जीवन पढ़ने को मिलता है तो वो पढ़ना चाहिए, व्‍यापार जगत में किसी ने प्रगति की है, उसका जीवन चरित्र मिलता है तो इसको पढ़ना चाहिए, साइंटिस्‍ट के रूप में किसी ने काम किया है तो उसका जीवन पढ़ना चाहिए, लेकिन जीवन चरित्र पढ़ने से हम इतिहास के काफी निकट और बाई एंड लार्ज सत्‍य को समझने में भी सुविधा होती है, हमारी कोशिश रहनी चाहिए, वरना आजकल तो, आप लोगों को वो आदत है, पता नहीं, हर काम गूगल गुरु करता है, कोई भी सवाल है, गूगल गुरु के पास चले जाओ, इंफोर्मेशन तो मिल जाती है, ज्ञान नहीं मिलता है, जानकारी नहीं मिलती है, इसलिए हम सब उस दिशा में प्रयास करें। विद्यार्थियों के मन में कुछ सवाल भी हैं, उनसे गप्प गोष्ठी करना मुझे अच्‍छा लगेगा, बहुत हल्‍का-फुल्‍का माहौल बना दीजिए, जरा भी गंभीर रहने की जरूरत नहीं है, आपके शिक्षक लोगों ने कहा होगा, ऐसा मत करो, यूं मत करो, ऐसे सब कहा होगा, नहीं, आपको आपके शिक्षक ने जो कहा है, यहां से जाने के बाद उसका पालन कीजिए, मगर अभी हंसते-खेलते आराम से बैठिए, हम बातें करेंगे। 







Thursday 4 September 2014

भारतीय संगीतकारों को समर्पित 8 डाक टिकट जारी

भारतीय जीवन में संगीत का विशेष महत्व है। शास्त्रीय संगीत जो कि रागों पर आधारित है, देश में लोक जीवन का आधार रहा है। फिल्मों, म्यूजिक एलबमों, लोकगीतों आदि में इसके विभिन्न रूपों का प्रयोग किया गया है। यहाँ अनेक ऐसे संगीतकार हुए हैं जिन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत को आगे बढ़ाया है तथा राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर इसे लोकप्रिय बनाया है। भारतीय डाक विभाग ने शास्त्रीय संगीत की ऐसी महान विभूतियों को डाक टिकटों पर स्थान दिया है। 

इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि 3 सितम्बर 2014 को डाक विभाग ने ’’भारतीय संगीतकार’’ शीर्षक से आठ डाक टिकटों का सेट तथा एक मिनिएचर शीट जारी किया है। इनमें अली अकबर खान, भीमसेन जोशी, डीके पट्टम्माल, गंगूबाई हंगल, कुमार गंधर्व, मल्लिकार्जुन मंसूर, रवि शंकर और विलायत खान शामिल हैं। इनमें रवि शंकर व भीमसेन जोशी पर जारी डाक टिकट 25 रूपये मूल्यवर्ग के व अन्य पर जारी डाक टिकट 5 रूपये के हैं । भारत के राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी जी ने  इन डाक टिकटों को एक कार्यक्रम में समारोहपूर्वक जारी किया.

डाक निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि इलाहाबाद परिक्षेत्र में ये डाक टिकटें इलाहाबाद प्रधान डाकघर और वाराणसी प्रधान डाकघर में स्थित फिलेटलिक ब्यूरो में उपलब्ध हैं । उन्होंने बताया कि इलाहाबाद में पहले दिन ही 25,000 से ज्यादा राशि के डाक टिकटों को लोगों ने हाथों-हाथ खरीदा। इनमें सिर्फ संगीत प्रेमी और फिलेटलिस्ट ही नहीं बल्कि स्कूली बच्चों  और युवाओं के अलावा विभिन्न कार्यक्षेत्रों में  कार्य करने वाले अधिकारी, जज, डाॅक्टर, इंजीनियर, वकील से लेकर कारपोरेट जगत से जुड़े लोग तक शामिल हैं। इनमें से कई लोग तो इन डाक टिकटों को लोगों को गिफ्ट भी कर रहे हैं। इसके अलावा इलाहाबाद फिलेटलिक ब्यूरो से नियमित रूप से जुड़े 801 फिलेटलिक डिपाजिट एकाउंट होल्डर्स को भी यह डाक टिकट व अन्य सामग्री रजिस्टर्ड डाक से भेजी जा रही है। 

डाक निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने यह भी जोड़ा कि वेट आॅफसेट प्रक्रिया से मुद्रित कुल 46 लाख डाक टिकट देशभर में जारी किये गये हैं।  इनमें 25 रूपये मूल्य वर्ग वाले हर डाक टिकट 8 लाख की संख्या में एवं 5 रूपये मूल्यवर्ग वाले प्रत्येक डाक टिकट 5 लाख की संख्या में मुद्रित हुए हैं। प्रथम दिवस आवरण एवं विवरणिका के साथ-साथ 4 लाख मिनीएचर शीट और प्रत्येक डाक टिकट की 1 लाख शीटलेट भी जारी की गयी हैं। 

Sunday 24 August 2014

उमेश चौहान की बाल-कविताएँ

हिंदी साहित्य में बड़ों के साथ-साथ, नन्हे-मुन्नों के लिए भी लेखन करने वालों की कमी नहीं है। बाल-साहित्य एक ऐसी विधा है, जहाँ बड़ों को भी बच्चा बनकर सोचना पड़ता है, अन्यथा लेखन में कृत्रिमता हावी हो जाती है।  उमेश चौहान जी  उन लोगों में से हैं, जो बड़ों के साथ-साथ बच्चों के लिए भी निरंतर लेखन कर रहे हैं। उनकी बाल-कवितायेँ जहाँ बच्चों में मनोरंजन पैदा करती हैं, वहीँ उन्हें सीख भी देती हैं।  वे अपनी बाल कविताओं के बहाने कई बार अपना बचपन भी खोजते हैं। उमेश चौहान जी लेखक के साथ-साथ एक प्रशासनिक अधिकारी भी हैं।  साहित्य उन्हें संवेदनशील बनाता है और लोगों के नजदीक भी करता है।  बाल दुनिया ब्लॉग पर हम पहले भी उनकी कवितायेँ प्रकाशित कर चुके हैं और अब उनकी कुछ और बाल-कविताएँ :

लालची चाचा

चाचा-चाची एक बार बाजार गए सज-धजकर
भोले-भाले चाचा पहुँचे सब्जी - मंडी भीतर।
गोल-गोल तरबूज वहाँ बिकते थे सुंदर-सुंदर
नहीं कभी देखा चाचा ने लगे परखने बढ़कर।

सब्जी वाले से चाचा ने पूछा, “यह क्या भाई?”
“हाथी का अंडा” कह करके उसने बात बनाई।
ऐसा सुनकर चाचा जी को अचरज हुआ भयंकर
खुशी-खुशी चाची से बोले, “चीज बड़ी यह सुंदर!

चलो इसे ले चलकर घर में सेवा खूब करेंगे
कुछ दिन में जब बच्चा होगा, खिला-पिला पालेंगे।
नहीं किसी के घर में ऐसा होते अब तक देखा
बड़े खुशी होंगे सब बच्चे, राजू, सनी, सुरेखा।”

सब्जी वाले ने चाचा को जमकर मूर्ख बनाया
काफी  पैसे  ले  करके पूरा तरबूज थमाया।
बोला, “चाचा! इसे राह में फटने कहीं न देना
किसी जगह पर इसे जोर से नीचे मत रख देना।”

सहमे-सहमे चाचा उसको चले हाथ में लेकर
डरते थे वह फूट न जाए कहीं जोर से दबकर।
बीच राह में बड़े जोर की प्यास लगी चाचा को
नीचे रखकर उसे मिटाने चले तुरत तृष्णा को।

पास एक झाड़ी थी जिसमें एक स्यार था रहता
चाचा के डर से वह भागा खुरखुर-गुरगुर करता।
समझा चाचा ने कि फट गया शायद उनका अंडा
भाग रहा हाथी का बच्चा, सोच उठाया डंडा।
दौड़े  चाचा उसे  पकड़ने पास  घना जंगल था
घुसे उसी में नहीं चैन अब उन्हें एक भी पल था।
खड़ी रह गईं चाची करतीं मना उन्हें जाने से
किन्तु न माने चाचा दौड़े जिद अपनी ठाने से।

जंगल में चाचा को पाकर एक भेड़िया आया
पकड़ मार डाला चाचा को पेट फाड़कर खाया।
फँसे मूर्खता में निज चाचा बुद्धि न उनको आई
झूठे लालच में फँस करके अपनी जान गँवाई।

डॉगी
मेरे घर में डॉगी है
थोड़ा-थोड़ा बागी है।

अंग्रेजी में बातें करता
हिन्दी सुनते ही गुर्राता,
दाल-पनीर देखकर बिचके
मटन-चिकन झट चट कर जाता’
पापा ने ला डाला इसके 
पट्टा एक गुलाबी है। मेरे घर में ……

मेरे संग फुटबाल खेलता
खुश हो-होकर पूँछ हिलाता,
किन्तु बड़े जोरों से भूँके
कोई अजनबी जब घर आता,
पूर्व परिचितों के प्रति लेकिन
यह असीम अनुरागी है। मेरे घर में ……

नाम रखा है ‘बूजो’ इसका
संकर नस्ल रंग भूरा सा,
घर की रखवाली में तत्पर
हल्की आहट सुन उठ जाता,
आया जब से है यह घर में
बिल्ली घर से भागी है। मेरे घर में ……



मस्ती

 काले-काले बादल छाए
पुरवाई संग उड़कर आए।

जमकर बरसे मेघ सलोने
भीगे धरती के सब कोने।
रिंकू ने भी शर्ट उतारी
भीग-भीग किलकारी मारी।
सिम्मी, निम्मी, रिंकी, अख़्तर
जुटे सभी पल भर में छत पर।
दौड़-दौड़ सारे बच्चों ने
मस्ती के परचम लहराए। काले-काले बादल ……

खेल-खेल में ही रिंकू ने
अख़्तर को थोड़ा धकियाया।
छत की रेलिंग पर लटका था
अख़्तर खुद से संभल न पाय।
नीचे जाकर गिरा जोर से
गिरते ही फिर होश न आया।
भागे सारे बच्चे नीचे
मम्मी-पापा भी घबराए। काले-काले बादल ……

अस्पताल ले जा अख़्तर को
डॉक्टर से उपचार कराया।
चोट नहीं गहरी थी उसकी
होश तभी अख़्तर को आया।
बहुत सभी पछताए बच्चे
पापा-मम्मी ने समझाया।
मस्ती बहुत जरूरी होती

लेकिन सबकी हैं सीमाएं। काले-काले बादल ……

अनमोल खजाना

दीपक बड़ा दुलारा था
दादा जी को प्यारा था,
पापा दूर शहर में रहते
सबका वही सहारा था।

दादा जी बिलकुल बूढ़े थे
वे घंटों पूजा करते थे,
खर्चे-पानी से जो बचता
एक तिजोरी में रखते थे।

उसे खोलना और बंद
करना दीपक को भाता था,
बेहिसाब रखवाली का वह
पूरा लाभ उठाता था।

रोज सुबह चुपके उससे वह
रुपए बीस चुराता था,
विद्यालय के इंटरवल में
चाट-पकोड़े खाता था।

खिला-पिलाकर उसने अपने
साथी खूब बनाए थे,
उनके संग ही आता-जाता
असल दोस्त कतराए थे।

दादा कभी भाँप ना पाए
थे दीपक की चालाकी,
जब-जब वे बीमार पड़े
उसने ही उनकी सेवा की।
लेकिन चमत्कार होते हैं
कभी-कभी कुछ जीवन में,
महा-चरित्रों से मिलती है
सीख अनोखी बचपन में।

उस दिन टीचर ने कक्षा में
भावुक  हो  समझाया  था,
गाँधी जी की आत्म-कथा का
हिस्सा  एक  सुनाया  था।

गाँधी जी ने भी बचपन में
घर  के  द्रव्य चुराए  थे,
किन्तु बाद में पछताकर
बीमार पिता ढिग आए थे।

सच-सच लिखकर बता दिया
चिपटे फिर जोर-जोर  रोए,
आगे अपने कर्म-क्षेत्र में
बीज  सत्य  के  ही  बोए।

पढ़ते ही यह पाठ अचानक
दीपक का मन भर आया,
लौट शाम को घर पर उसने
दादा  को  सच  बतलाया।

फूट-फूटकर दीपक रोया
दादा से माफी माँगी,
चोरी-झूठ त्यागकर उसमें
सच के प्रति निष्ठा जागी।

दादा जी ने विह्वल होकर
उसे  प्यार  से  दुलराया,
थमा तिजोरी की चाभी फिर
बड़ा  मनोबल  उकसाया।

एक पाठ की एक सीख ने
दीपक का जीवन बदला,
शिक्षा का अनमोल खजाना
करता सबका सदा भला।

-उमेश चौहान 
सम्पर्क: सी-II/ 195, सत्य मार्ग, चाणक्यपुरी, नई दिल्ली–110021 (मो. नं. +91-8826262223).

पूरा नाम: उमेश कुमार सिंह चौहान (यू. के. एस. चौहान)
जन्म: 9 अप्रैल, 1959 को उत्तर प्रदेश के लखनऊ जनपद के ग्राम दादूपुर में।
शिक्षा: एम. एससी. (वनस्पति विज्ञान), एम. ए. (हिन्दी), पी. जी. डिप्लोमा (पत्रकारिता व जनसंचार)।

साहित्यिक गतिविधियाँ:

प्रकाशित पुस्तकें: ‘गाँठ में लूँ बाँध थोड़ी चाँदनी’ (प्रेम-गीतों का संग्रह) - सत्साहित्य प्रकाशन, दिल्ली (2001), ‘दाना चुगते मुरगे’ (कविता-संग्रह) - सत्साहित्य प्रकाशन, दिल्ली (2004), ‘अक्कित्तम की प्रतिनिधि कविताएं’  (मलयालम के महाकवि अक्कित्तम की अनूदित कविताओं का संग्रह) - भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली (2009), ‘जिन्हें डर नहीं लगता’ (कविता-संग्रह) - शिल्पायन, दिल्ली (2009), एवं ‘जनतंत्र का अभिमन्यु’ (कविता – संग्रह) - भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली (2012), मई 2013 से हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र 'जनसंदेश टाइम्स' (लखनऊ, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी एवं गोरखपुर से प्रकाशित) में साप्ताहिक स्तम्भ-लेखन

संपादित पुस्तकें: 'जनमंच' (श्री सी.वी. आनन्दबोस के मलयालम उपन्यास 'नाट्टुकूट्टम' का हिन्दी अनुवाद) - शिल्पायन, दिल्ली (2013)

सम्मान: भाषा समन्वय वेदी, कालीकट द्वारा ‘अभय देव स्मारक भाषा समन्वय पुरस्कार’ (2009) तथा इफ्को द्वारा ‘राजभाषा सम्मान’ (2011)





Monday 18 August 2014

माखनचोर का जन्मदिन



मुरलीधर मथुराधिपति माधव मदनकिशोर. 
मेरे मन मन्दिर बसो मोहन माखनचोर. 

कृष्ण जन्माष्टमी पर हार्दिक बधाइयाँ !!

Sunday 16 March 2014

प्यार के रंग से भरो पिचकारी


प्यार के रंग से भरो पिचकारी
स्नेह से रँग दो दुनिया सारी 
ये रंग न जाने कोई जात न बोली
आप सभी को मुबारक हो यह होली !!

Friday 27 December 2013

चिड़िया कितनी प्यारी है


चिड़िया कितनी प्यारी है
मुझको सुबह उठाती है.
मुरगी बोले कुकड़ू-कुकड़ू
कोयल गीत सुनाती है.

तोता बोली रटता है
चोरों को डर लगता है.
छत के ऊपर बैठा कौआ
सबका स्वागत करता है.

सबसे सीधी मैना है
आँगन में इठलाती है.
गौरैया भी खूब फुदकती

हर बच्चे को भाती है.


उमेश चौहान 
सम्पर्क: सी-II195, सत्य मार्ग, चाणक्यपुरी, नई दिल्ली110021 (मो. नं. +91-8826262223)


पूरा नाम: उमेश कुमार सिंह चौहान (यू. के. एस. चौहान)
जन्म: 9 अप्रैल, 1959 को उत्तर प्रदेश के लखनऊ जनपद के ग्राम दादूपुर में।
शिक्षा: एम. एससी. (वनस्पति विज्ञान), एम.. (हिन्दी), पी. जी. डिप्लोमा (पत्रकारिता व जनसंचार)।

साहित्यिक गतिविधियाँ:

  • प्रकाशित पुस्तकें: गाँठ में लूँ बाँध थोड़ी चाँदनी (प्रेम-गीतों का संग्रह) - सत्साहित्य प्रकाशन, दिल्ली (2001), दाना चुगते मुरगे (कविता-संग्रह) - सत्साहित्य प्रकाशन, दिल्ली (2004), ‘अक्कित्तम की प्रतिनिधि कविताएं’  (मलयालम के महाकवि अक्कित्तम की अनूदित कविताओं का संग्रह) - भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली (2009),जिन्हें डर नहीं लगता (कविता-संग्रह) - शिल्पायन, दिल्ली (2009), एवं जनतंत्र का अभिमन्यु (कविता संग्रह) - भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली (2012), मई 2013 से हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र 'जनसंदेश टाइम्स' (लखनऊ, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी एवं गोरखपुर से प्रकाशित) में साप्ताहिक स्तम्भ-लेखन

  • संपादित पुस्तकें: 'जनमंच' (श्री सी.वी. आनन्दबोस के मलयालम उपन्यास 'नाट्टुकूट्टम' का हिन्दी अनुवाद) - शिल्पायन, दिल्ली (2013)

  • सम्मान: भाषा समन्वय वेदी, कालीकट द्वारा अभय देव स्मारक भाषा समन्वय पुरस्कार’ (2009) तथा इफ्को द्वारा राजभाषा सम्मान(2011)


Wednesday 13 November 2013

बच्चे बनाएंगे डाक टिकट के लिए पेंटिंग


यदि आप चाहते हैं कि आपकी बनाई हुई पेंटिंग डाक टिकट के रूप में जारी हो तो यह अवसर लेकर आया है डाक विभाग। डाक विभाग देशव्यापी स्तर पर ‘‘स्टैम्प डिजाइन‘‘ प्रतियोगिता करवा रहा है जिसमें सर्वश्रेष्ठ पेंटिंग को अगले वर्ष बाल दिवस पर डाक टिकट के रूप में जारी किया जायेगा। इस संबंध में जानकारी देते हुए इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि डाक विभाग वर्ष 1998 से यह आयोजन करवा रहा है और इसके माध्यम से डाक टिकटों के प्रति बच्चों एवं विद्यार्थियों की भागीदारी सुनिश्चित की जाती है ।

डाक निदेशक श्री यादव ने बताया कि इस वर्ष की थीम ''एक दिन अपने दादा-दादी के साथ'' है जिस पर विद्यार्थियों को पेंटिंग बनानी है। यह पेटिंग स्याही, वाटर कलर, आयल कलर या किसी अन्य माध्यम से बनायी जा सकती है। प्रतियोगी ड्रांइग पेपर, आर्ट पेपर या अन्य किसी भी प्रकार का पेपर पेंटिंग के लिए इस्तेमाल कर सकते है। प्रतिभागियों को उक्त विषय पर मौलिक डिजायन ही बनानी है। निदेशक डाक सेवाएं कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि सभी विद्यार्थियों को तीन समूहों में विभाजित किया गया है - कक्षा 4 तक के विद्यार्थी, कक्षा 5 से कक्षा 8 तक के विद्यार्थी एवं कक्षा 9 से कक्षा 12 तक के विद्यार्थी। सभी श्रेणियों में प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्तर पर क्रमशः 10,000, 6,000 एवं 4,000 रूपये के तीन-तीन पुरस्कार राष्ट्रीय स्तर पर दिये जायेंगे। राष्ट्रीय स्तर पर चुनी गयी पुरस्कृत प्रविष्टियों के आधार पर ही अगले वर्ष बाल दिवस पर डाक टिकट, प्रथम दिवस आवरण एवं मिनियेचर शीट इत्यादि का प्रकाशन किया जायेगा। 

निदेशक डाक सेवाएं, इलाहाबाद परिक्षेत्र, श्री कृष्ण कुमार यादव ने आगे बताया कि इलाहाबाद परिक्षेत्र के सभी डाक मण्डलों में उक्त प्रतियोगिता 16 नवम्बर 2013 दिन शनिवार को प्रातः 1100 बजे आयोजित होगी। यह प्रतियोगिता इलाहाबाद प्रधान डाकघर, वाराणसी प्रधान डाकघर, प्रतापगढ़ प्रधान डाकघर, जौनपुर प्रधान डाकघर, मिर्जापुर प्रधान डाकघर एवं गाजीपुर प्रधान डाकघर में आयोजित की जाएगी। 

Sunday 3 November 2013

जगमग-जगमग करते दीपक



जगमग-जगमग करते दीपक
लगते कितने मनहर प्यारे,
मानों आज उतर आये हैं
अम्बर से धरती पर तारे !

दीपों का त्योहार मनुज के
अतंर-तम को दूर करेगा,
दीपों का त्योहार मनुज के
नयनों में फिर स्नेह भरेगा!

धन आपस में बाँट-बूट कर
एक नया नाता जोड़ेंगे,
और उमंगों की फुलझड़ियाँ
घर-घर में सुख से छोड़ेंगे !

दीपावलि का स्वागत करने
आओ हम भी दीप जलाएँ,
दीपावलि का स्वागत करने
आओ हम भी नाचे गाएँ !

-महेन्द्र भटनागर-

Sunday 13 October 2013

हिन्दी बाल-काव्य को मध्यप्रदेश का योगदान

म ध्यप्रदेश साहित्य-सृजन का अत्यन्त उर्वर  क्षेत्र है। साहित्य की विविध विधाओं का    यहां निरन्तर विकास हुआ है और आज   भी हो रहा है।
मध्यप्रदेश का श्रेष्ठ बाल-साहित्य भी रेखांकित करने योग्य है। बाल-साहित्य के अन्तर्गत बाल-काव्य का उल्लेख विशेष रूप से किया जा सकता है। अनेक प्रमुख बाल-काव्य प्रणेताओं की जन्मभूमि या कर्मभूमि होने का गौरव मध्यप्रदेश को प्राप्त है। इस पर साभार प्रस्तुत है वरिष्ठ बाल-साहित्यकार  विनोद चन्द्र पाण्डेय 'विनोद' का एक महत्वपूर्ण आलेख.

कामता प्रसाद गुरु का नाम हिन्दी के प्रारंभिक बाल-काव्य के रचनाकारों में प्रमुख है। उनका जन्म सन् 1875 ई. में ग्राम परकोटा, जिला सागर में हुआ था। यद्यपि एक व्याकरणविद् के रूप में उनकी ख्याति अधिक है तथापि उन्होंने अनेक बाल-कविताओं का सृजन किया। एक उदाहरण प्रस्तुत है-
यह सुन्दर छड़ी हमारी।
है हमें बहुत ही प्यारी॥
यह खेल समय हर्षाती।
मन में है साहस लाती॥
तन में अति जोर जगाती।
उपयोगी है यह भारी।
यह सुन्दर छड़ी हमारी॥
पं. सुखराम चौबे गुणाकर का भी नाम मध्यप्रदेश के बाल-काव्य प्रणेताओं में उल्लेखनीय है। इनका जन्म सन् 1867 ई. में ग्राम रहली, जिला सागर में हुआ था। अध्यापन-कार्य करते हुए भी उन्होंने बच्चों के लिए प्रिय कविताएं लिखी थीं। एक बाल-कविता की कुछ पंक्तियां उध्दृत हैं-
यह छाता है सुखदाई। मैं इसे न दूँ भाई।
जब घर से बाहर जाता था बाहर से घर आता।
यह संग में आता जाता। रखता है सदा मिताई।
लोचन प्रसाद पाण्डेय का नाम भी मध्यप्रदेश के बाल-काव्यकारों में आदर के साथ लिया जाता है। उन्होंने बाल-विनोद, बालिका-विनोद, पद्य-पुष्पांजलि आदि बालोपयोगी कविता-पुस्तकों का प्रणयन किया एक कविता की कुछ पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं-
खेल-समय खेलो तुम सब मिल, करो समय पर अपना काम।
उद्योगी हर्षित होने की है यह प्यारी रीति ललाम।
जो कुछ करते हो मन देकर, करो सदा तुम सुखदाई।
काम अधूरे कभी जगत में ठीक नहीं होते भाई।
पं. लल्ली प्रसाद पाण्डेय का जन्म सन् 1886 ई. में सानोदा, सागर (मध्य भारत) में हुआ था। बच्चों की प्रतिष्ठित पत्रिका 'बालसखा' का सुदीर्घकाल तक सम्पादन कर अनेक बाल साहित्यकारों का निर्माण किया। वह स्वयं भी बाल साहित्य का सृजन करते रहे। एक बाल-कविता की कुछ पंक्तियाँ उध्दरणीय है-
ऑंखों पर चश्मा है सुन्दर, सिर पर गाँधी टोपी है।
और गले में पड़ा दुपट्टा, निकली बाहर चोटी है।
टेबिल लगा बैठ कुर्सी पर, लिखते हैं वानर जी लेख।
करते है कविता का कौशल, रहती जिसमें मीन न मेख।
देवी प्रसाद गुप्त 'कुसुमाकर' का जन्म सन् 1893 ई. में ग्राम बनखेड़ी, जिला होशंगाबाद में हुआ था। यद्यपि व्यवसाय से वे वकील थे तथापि बच्चों के लिए उन्होंने अनेक सुन्दर कविताएँ लिखीं। एक कविता की कुछ पंक्तियाँ उल्लेखनीय हैं-
दादा का जब मुँह चलता है, मुझे हंसी तब आती है।
अम्मा मेरे कान खींचकर, मुझको डाँट बताती है।
किन्तु हँसी बढ़ती जाती है, मेरे वश की बात नहीं।
चलते देख पपोले मुख को, रूक सकती है हँसी कहीं।

हिन्दी के बाल-काव्य प्रणेताओं में सभा मोहन अवधिया स्वर्ण सहोदर का नाम अत्यन्त सम्मानपूर्वक लिया जाता है। उनका जन्म सन् 1902 ई. में शहापुरा, जिला मण्डला (मध्यप्रदेश) में हुआ था। वह शिक्षण कार्य से जुड़े रहे और निरन्तर बाल-साहित्य में साधनारत रहे। उन्होंने मनोरंजक, प्रेरक और ज्ञानवर्धक बाल-कविताएं लिखी हैं। कुछ काव्य पंक्तियाँ उल्लेखनीय हैं-
नटखट हम हाँ, नटखट हम। करने निकले खटपट  हम।
आ गये लड़के या गये हम। बन्दर देख लुभा गये हम।
बन्दर को बिजकावें हम। बन्दर दौड़ा भागे हम।
बच गये लड़के, बच गये हम।
ठाकुर गोपाल शरणसिंह हिन्दी के प्रमुख कवि माने जाते हैं। उनका जन्म सन् 1891 ई. में रीवा (म.प्र.) में हुआ था। उन्होंने कुछ बालोपयोगी कविताएं भी लिखी हैं। एक उदाहरण प्रस्तुत है-
सुन्दर सजीला चटकीला वायुयान एक,
भैया हरे कागज का आज मैं बनाऊँगा।
चढ़ के उसी पै सैर नभ की करूँगा खूब,
बादल के साथ-साथ उसको उड़ाऊँगा।
मन्द-मन्द चाल से चलाऊँगा उसे मैं वहाँ,
चहक-चहक चिड़ियों के संग मैं गाऊंगा।
चन्द्र का खिलौना, मृग छोना वह छीन लूंगा।
भैया को गगन की तरैया तोड़ लाऊँगा।
श्रीमती सुभद्राकुमारी चौहान हिन्दी की सुप्रतिष्ठित कवयित्री हैं। यद्यपि सन् 1904 ई. में उनका जन्म प्रयाग (उ.प्र.) में हुआ था, तथापि उनका विवाह जबलपुर के सुप्रसिध्द वकील लक्ष्मणसिंह चौहान से हुआ था। उनकी बचपन शीर्षक बाल कविता अत्यधिक लोकप्रिय है। उसकी कुछ पंक्तियाँ विशेष रूप से पठनीय हैं-
मैं बचपन को बुला रही थी, बोल उठी बिटिया मेरी।
नन्दन-वन-सी फूल उठी वह, छोटी-सी कुटिया मेरी।
'माँ ओ' कहकर बुला रही थी, मिट्टी खाकर आई थी।
कुछ मुँह में कुछ लिए हाथ में, मुझे खिलाने लाई थी।
मैंने पूछा- 'यह क्या लाई', बोल उठी वह 'माँ काओ'
फूल-फूल मैं उठी खुशी से, मैंने कहा 'तुम्हीं खाओ।'
कविवर गौरीशंकर 'लहरी' का जन्म सन् 1909 ई. में सागर में हुआ था। वह मध्यप्रदेश के सूचना विभाग में कार्यरत रहे। उन्होंने बाल-कविताओं का सृजन भी किया। कुछ काव्य पंक्तियाँ उल्लिखित हैं-
बोली हवा बीज से उस दिन, चलो घू्मने मेरे साथ।
दूर-दूर के देश दिखाऊँ, जाने क्या लग जाये हाथ।
बीज आ गया इन बातों में, खुश हो घर से निकल पड़ा।
गया नहीं था बहुत दूर तब, मिट्टी ने उसको पकड़ा।

अमृतलाल दुबे का जन्म 1908 ई. में जबेरा, जिला दमोह (मध्यप्रदेश) में हुआ था। उन्होंने शिक्षा विभाग में कार्य किया और बालोपयोगी कविताओं की रचना की। एक बाल-कविता का यह अंश दृष्टव्य है-
शेर कहे मैं वन का राजा, खून पिया करता हूँ ताजा।
यह पहाड़ मेरी दहाड़ से, गूँजे, काँपे, थराए।
दुनिया मुझसे डर जाए।
साहित्यकार रामानुजलाल श्रीवास्तव का जन्म सन् 1898 ई. में सिहोरा (मध्य भारत) में हुआ था। इन्होंने बाल-कविताएँ भी लिखी हैं, जो 'बालसखा' पत्रिका में प्रकाशित होती रहती थी। बालकों को सन्देश देते हुए उन्होंने कहा था-
इसी भाँति तुम विद्या पढ़कर सुन्दर दीपक बन जाओ।
अज्ञानी के शून्य हृदय में ज्ञान-उजाला फैलाओ॥

पं. माखनलाल चतुर्वेदी 'एक भारतीय आत्मा' राष्ट्रीय भावधारा के प्रमुख कवि हैं। इनका जन्म सन् 1889 ई. में बाबई, जिला होशंगाबाद में हुआ था। खण्डवा में रहकर 'कर्मवीर' पत्रिका का सम्पादन करते थे। उनकी कुछ कविताएँ बालोपयोगी भी हैं। एक उदाहरण प्रस्तुत हैं-
ले लो दो आने के चार। लड्डू राजगिरे के यार।
यह है पृथ्वी जैसे गोल। ढुलक पड़ेंगे गोल-मटोल।
इनके मीठे स्वादों में ही बन जाता है इनका मोल।
दामों का मत करो विचार। ले लो दो आने के चार।
एकांकी सम्राट डॉ. रामकुमार वर्मा का जन्म स्थान नरसिंहपुर (मध्यभारत) था। इनका जन्म सन् 1905 ई. में हुआ था। यह इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष रहे। वहीं रहकर इन्होंने साहित्य-साधना की। इनकी बाल कविताएँ 'चमचम', 'शिश'ु और बालसखा में प्रकाशित होती थी। एक बालोपयोगी कविता उदाहरण स्वरूप उध्दृत की जा रही है-
प्रभुवर सूरज को चमकाकर, रोज सबेरे देते भेज।
काम घूमने का सिखलाकर, भर देते हो उसमें तेज॥
इसी तरह मुझको भी अब सब, काम खूब सिखला देना।
मुझमें अपना तेज डालकर, दुनिया में चमका देना॥
रामेश्वर गुरु 'कुमार हृदय' की बाल-काव्य साधना अविस्मरणीय है। उनका जन्म सन् 1914 ई. को जबलपुर में हुआ था। उनकी बाल कविताएं बालसखा, शिशु और खिलौना आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित होती थीं। उनके एक अभिनय गीत का यह अंश अवलोकनीय है-
राजा (पहले कैदी से)
क्यों तुम पड़े कैद में जाकर,
बतलाओ कारण समझाकर।
पहला कैदी (हाथ जोड़कर)
लोगों ने दी झूठ गवाही।
लाए मुझको पकड़ सिपाही।
दूसरा कैदी- (गिड़गिड़ाकर पैरों पर पड़ते हुए)
वह हाकिम था पूरा फंदी।
जिसने मुझे बनाया बंदी।
लक्ष्मी प्रसाद मिश्र 'कवि-हृदय' का जन्म सन् 1913 ई. में सागर में हुआ था। उन्होंने बाल कविताओं की रचना की जिनका प्रकाशन तत्कालीन अनेक बाल पत्रिकाओं की रचना की जिनका प्रकाशन तत्कालीन अनेक बाल-पत्रिकाओं में हुआ। उनकी बाल कविता का एक उदाहरण दृष्टव्य है-
हरे-भरे मैदान हमारे। लगते हैं हमको अति प्यारे।
खेलों की हरियाली प्यारी। बागों की है शोभा न्यारी॥
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी मध्यप्रदेश (अब छत्तीसगढ़) के खैरागढ़ के निवासी थे। सरस्वती पत्रिका का सम्पादन उन्होंने दीर्घकाल तक किया था। उनकी बाल कविताएं भी बच्चों में लोकप्रिय थीं। एक कविता का अंश प्रस्तुत है-
बुढ़िया चला रही थी चक्की। पूरे साठ वर्ष की पक्की।
दोने में थी रखी मिठाई। उस पर उड़कर मक्खी आई।
विनय मोहन शर्मा 'वीरात्मा' का जन्म सन् 1905 ई. में करकवेल मध्यप्रदेश में हुआ था। इनका वास्तविक नाम शुकदेव प्रसाद तिवारी था। उन्होंने 'वीरात्मा' नाम से अनेक बाल कविताओं का सृजन किया। एक बाल कविता उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत है-
मधुर गीत गा नींद बुलाना। थपकी दे दे मुझे सुलाना।
मेरा जरा विकल हो जाना। तेरा टप-टप अश्रु गिराना।
वह अब तो मुझे रूलाता है। माँ! तेरी याद दिलाता है।

ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी का जन्म सन् 1908 में ई. में ग्राम करेली, जिला नरसिंहपुर (मध्य प्रदेश) में हुआ था। उन्होंने बाल गीतों की भी रचना की। उनके एक बाल गीत का अंश उल्लिखित है-
अम्मा अम्मा मुझे बता दे यह चमकीले तारे।
सारी रात छिपा ही खेला करते हैं बेचारे।

सन् 1908 ई. में जन्मे रूद्रदत्त मिश्र मध्यप्रदेश के सूचना विभाग में कार्यरत रहे। उन्होंने उल्लेखनीय बाल काव्य साधना की। उनकी एक बाल कविता उध्दरणीय है-
नहीं किसी का लेना-देना, नहीं किसी का खाना।
कंकड़-पत्थर जो मिल जाए, वही हमारा खाना।
 नहीं घोंसला कहीं हमारा, नहीं हमारा घर है।
जहां बैठकर रात बितावें, वही हमारा घर है।
शांति चाहते हम दुनिया में, झगड़ा हमें न भाता।
हम सबका ही हित करते हैं, रखते अच्छा नाता।
बाबूलाल जैन 'जलज' का जन्म सन् 1909 ई. में देवरीकलां, जिला सागर मेें हुआ था। उनका बाल-काव्य सृजन भी सराहनीय है। उनकी एक बाल प्रार्थना उध्दृत है:-
प्रभुवर दीजै यह वरदान।
शीलवान विनयी हम होवें। कभी फूट के बीज न बोवें।
दीन जनों के दु:ख को खोवें। करें सदा सबका ही मान।
गुणी जनों की संगति पावें। उच्च विचार सदा मन आवें।
लोभ मोह से चित्त हटावें। समझें सबको सदा समान।
हिन्दी बाल साहित्य साधकों में नर्मदा प्रसाद खरे का नाम सुविख्यात है। उनका जन्म सन् 1913 ई. जबलपुर में हुआ था। उनकी अनेक बाल काव्य कृतियां प्रकाशित हुई हैं। तितली के संबंध में उनकी एक बाल कविता विशेष रूप से पठनीय है-
रंग-बिरंगे पंख तुम्हारे, सबके मन को भाते हैं।
कलियां देख तुम्हें खुश होतीं, फूल देख मुस्काते हैं।
रंग-बिरंगे पंख तुम्हारे, सबका मन ललचाते हैं।
तितली रानी, तितली रानी कहकर सभी बुलाते हैं।
पास नहीं क्यों आती तितली, दूर-दूर क्यों रहती हो।
फूल-फूल के कानों में तुम जा-जाकर क्या कहती हो?
सन् 1911 ई. में जिला सागर, (मध्यप्रदेश) में जन्मे देवीदयाल चतुर्वेदी 'मस्त' कुछ समय तक 'बाल सखा' पत्रिका के संपादक रहे। उन्होंने स्वयं भी बाल कविताओं की रचना की। उनकी एक बाल कविता की कुछ पंक्तियां उल्लेखनीय हैं-
टन-टन टन-टन घंटा बजता, शाला को हम जाते हैं।
वहां पहुंचकर पंडित जी को हम सब शीश झुकाते हैं।
अच्छी-अच्छी बातें हमको पंडित जी बतलाते हैं।
रोज कहानी, गीत बहुत से वह हमको सिखलाते हैं।
अब्दुल रहमान सागरी का जन्म सन् 1911 ई. में ग्राम गढ़कोटा, जिला सागर में हुआ था। बच्चों के लिए उन्होंने श्रेष्ठ कविताएं लिखी हैं। जागरण का संदेश देते हुए उन्होंने आह्वान किया है-
जागो और जगाओ।
बीत चुकीं आलस की घड़ियां,
जाग उठीं अब सारी चिड़ियां।
जागे फूल खिलीं अब कलियां॥
तुम भी जागो आओ। जागो और जगाओ।
उत्तम चन्द्र श्रीवास्तव का कार्यक्षेत्र मध्य भारत था। उनका जन्म सन् 1916 ई. में हुआ था। उनकी एक बाल कविता का अंश उध्दृत है-
नया साल आया है भाई खुशियां नई मनाने को।
अपना और सभी का जीवन सुन्दर सुखी बनाने को॥

सन् 1918 ई. में जबलपुर में जन्मे डॉ. राजेश्वर गुरु भी बच्चों के श्रेष्ठ कवि रहे हैं। उनका एक शिशुगीत प्रस्तुत है-
बिल्ली मेरी प्यारी मौसी, कौआ मेरा मामा।
बिल्ली पहने फ्राक गरारा, कौआ जी पाजामा।
लाला जगदलपुरी का जन्म सन् 1920 ई. में जगदलपुर, जिला बस्तर में हुआ था। उनका बाल-काव्य भी सराहनीय है। एक उदाहरण दृष्टव्य है-
नन्ही-सी माचिस की तीली।
रगड़े खाती आग उगलती। उजियाला देने को जलती।
कहती मुझसे सही काम लो। आग संभाले नहीं संभलती।

सन् 1922 ई. में बिलहरा, सागर (मध्यप्रदेश) में जन्मे कृष्णकान्त तेलंग ने भी बच्चों की कविताएँ लिखी हैं। एक उदाहरण देखिए-
लम्बी-लम्बी भूरी मोटी बाबा की थीं मूँछे।
मानो होठों पर रक्खी हों, ला घोड़े की पूँछें।
रामभरोसे गुप्त 'राकेश' का जन्म सन् 1925 ई. में आलमपुर जिला भिण्ड (मध्यप्रदेश) में हुआ। उनकी बाल-काव्य साधना प्रशंसनीय है। एक बाल-कविता की कुछ पंक्तियाँ अवलोकनार्थ प्रस्तुत हैं-
देशभक्ति के गीत सुनाते, वीर साहसी सैनिक हम।
कभी न कड़वे वचन बोलते, वाणी रखते सदा नरम॥
डॉ. हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य के सुप्रतिष्ठित रचनाकार हैं। उनका जन्म सन् 1940 ई. में नागोद, जिला सतना में हुआ। उन्होंने बाल-कविताएँ भी लिखी हैं। कुछ पंक्तियाँ उध्दरणीय है-
कविवर तोंदूराम बुझक्कड़ कभी-कभी आ जाते हैं।
खड़ी निरन्तर रहती चोटी, आंखें धँसी मिचमिची छोटी।
नाक चायदानी की टोंटी,
अंग-अंग की छटा निराली, भारी तोंद हिलाते हैं।
सन् 1945 ई. में ग्राम रामपुर कला, परगना सबलगढ़, जिला मुरैना (मध्यप्रदेश) में जन्मे आााद रामपुरी की भी एक बाल-कविता अवलोकनीय है-
लंगड़ा तोतापरी कठौआ खुशियों भरे दशहरी आम।
रस गुब्बारे गाल फुलाए सजधज खड़े सुनहरी आम।
राजा चौरसिया ने प्रभूत बाल-काव्य की रचना की है।
उपर्युक्त रचनाकारों के अतिरिक्त जगदीश तोमर, देवेन्द्र दीपक, परशुराम शुक्ल, अभिनव तैलंग, वीरेन्द्र मिश्र, अंशु शुक्ला, अशोक आनंद, अहद प्रकाश, गफूर स्नेही, भीष्मसिंह चौहान, गोवर्धन शर्मा, नयन कुमार राठी, ललित कुमार उपाध्याय, आशा शर्मा, नरेन्द्रनाथ लाहा, बटूक चतुर्वेदी, रमेशचन्द्र शाह, राम वल्लभ आचार्य, लक्ष्मीनारायण पयोधि, उषा जायसवाल, पदमा चौगांवकर आदि ने भी बाल काव्य की समृध्दि में अपना बहुमूल्य योगदान दिया है, किन्तु सभी की बाल कविताओं के उध्दरण देना सम्भव नहीं प्रतीत होता।
मध्यप्रदेश से प्रकाशित बाल-पत्रिकाओं शक्तिपुत्र, चकमक, समझ-झरोखा, देवपुत्र, अपना बचपन और स्नेह आदि तथा उनके संपादकों ने बाल-काव्य के विकास में महती भूमिका निभाई है। विशेष रूप से कृष्णकुमार अष्ठाना और महेश सक्सेना का योगदान सराहनीय है। भोपाल में स्थापित बाल कल्याण एवं बाल साहित्य शोध केन्द्र तथा इन्दौर में स्थापित बाल साहित्य सृजन पीठ का अवदान विस्मृत नहीं किया जा सकता। अत: इसमें कोई सन्देह नहीं कि हिन्दी बाल-काव्य को मध्यप्रदेश का योगदान रेखांकित करने योग्य है। 

(मध्यप्रदेश संदेश से साभार)