Sunday 23 December 2012

फिर भी सबसे ठीक हूँ

 
पढ़ने में थोड़ा वीक हूँ
फिर भी सबसे ठीक हूँ।

कभी नहीं मै कक्षा में
करता हूँ शैतानी
दिल दुखाना नहीं किसी का
समझाती है नानी।

इसीलिए मैं किसी को
नही देता हूँ संताप
दूजों को सुख मिले सदा
ऐसे करता हूँ उत्पात।

सहन नहीं कर पता
मैं कोई अत्याचार
मीठे बोल सभी से बोलूं
है ऐसा व्यवहार।

छोटे और बड़े सभी को
देता समुचित मान
भूले से भी मैं शत्रु का
न करता अपमान।

सीखा यही, सिखाता आया
बोल-बोल मृदुबानी
हँसा-हँसा कर करता हूँ
मै ज्ञान भरी शैतानी।

-सुमित कुमार भारती, लखनऊ-

Sunday 25 November 2012

बच्चों की बनाई पेंटिंग उभरेगी डाक-टिकट पर

हॉलिडे भला किसे नहीं भाता। हर बच्चे की अपनी कल्पनाएँ होती हैं कि हॉलिडे को कैसे खूबसूरत और यादगार बनाया जाय। और जब मौका इन्हें पेंटिंग के रूप में चित्रित करने का हो तो कैनवास पर कई तरह के रंग उभर कर आते हैं।  डाक विभाग द्वारा 23 नवम्बर, 2012 को आयोजित “डिजाईन ए  स्टाम्प” प्रतियोगिता में हॉलिडे विषय पर बच्चों ने पेंटिंग में ऐसे ही रंग बिखेरे।
 
       इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि इस प्रतियोगिता में इलाहबाद परिक्षेत्र में कुल 389 बच्चों ने भाग लिया, जिनमे इलाहाबाद में 37, प्रतापगढ़ में 78, जौनपुर में 79, व वाराणसी में 192 प्रतिभागी बच्चे  शामिल हैं।  इलाहाबाद  में कुल 18 स्कूलों के बच्चों ने प्रतियोगिता में हिस्सा लिया, जिनमे सैंट एंथोनी  गर्ल्स इन्टर कॉलेज, बिशप जॉन्सन इंटर कालेज, डा. के. एन. काटजू इंटर कालेज, ज्वाला देवी सरस्वती विद्या मंदिर, वशिष्ठ वात्सल्य पब्लिक स्कूल, पतंजलि ऋषिकुल इत्यादि शामिल हैं। सभी विद्यार्थियों को तीन समूहों में विभाजित किया गया - कक्षा 4 तक के विद्यार्थी, कक्षा 5 से कक्षा 8 तक के विद्याथी एवं कक्षा 9 से कक्षा 12 तक के विद्यार्थी ।
 
 निदेशक श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि इन सभी प्रविष्टियों का मूल्यांकन रीजनल स्तर पर करने के बाद तीनों वर्गों में श्रेष्ठ प्रविष्टि को निदेशालय स्तर पर राष्ट्रीय प्रतियोगिता में शामिल करने हेतु परिमंडलीय कार्यालय लखनऊ भेजा जायेगा और  सभी श्रेणियों में प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्तर पर क्रमशः 10,000, 6,000 एवं 4,000 रूप्ये के तीन-तीन पुरस्कार राष्ट्रीय स्तर पर दिये जायेगें । राष्ट्रीय स्तर पर चुनी गयी पुरस्कृत प्रविष्टियों के आधार पर ही अगले वर्ष बाल दिवस पर डाक टिकट, प्रथम दिवस आवरण एवं मिनियेचर शीट इत्यादि का प्रकाशन किया जायेगा। इस अवसर पर स्कूली बच्चों , शिक्षको व अभिभावकों ने फिलाटेलिक डिपाजिट अकाउंट खोलने में भी रूचि दिखाई जिसके तहत उन्हें हर माह घर बैठे डाक टिकटें प्राप्त हो सकेंगी

Tuesday 13 November 2012

इको फ्रेंडली दीपावली मनाएं

दीपावली व आतिशबाजी का गहरा नाता है। लक्ष्मी पूजन के बाद शगुन के रूप में फोड़े जाने वाले पटाखे अब हमारी ही मौत का सामान बनते जा रहे हैं। हवा में जहर घोलते ये पटाखे कई प्रकार की शारीरिक व मानसिक व्याधियों को जन्म दे रहे हैं।

पटाखों की धमक हमारे चेहरे पर जरूर मुस्कान लाती है, पर यह मुस्कान हमारी बर्बादी का पूर्वाभ्यास होती है। इसका आभास हमें उस वक्त नहीं होता जब हम पटाखों की रोशनी में खो जाते हैं।

आजकल के युवा पटाखे खरीदते समय उसकी तीखे शोर व प्रकाश पर ध्यान देते हैं। पटाखे के रूप में हम पैसों की बर्बादी व जान को जोखिम में डालने का पूरा-पूरा सामान खुशी-खुशी घर लाते हैं।  
* बीमारियों को खुला न्योता :- पटाखे जब जलते हैं और तेज धमाके के साथ फूटते हैं तो हममें से हर किसी के चेहरे पर मुस्कुराहट छा जाती है। उस वक्त हम भूल जाते हैं कि इन पटाखों के काले धुएँ व शोर का हमारे शरीर पर क्या दुष्प्रभाव पड़ेगा?

जब पटाखे जलते व फूटते हैं तो उससे वायु में सल्फर डाइआक्साइड व नाइट्रोजन डाइआक्साइड आदि गैसों की मात्रा बढ़ जाती है। ये हमारे शरीर के लिए नुकसानदेह होती हैं। पटाखों के धुएँ से अस्थमा व अन्य फेफड़ों संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

* पटाखों का शोर मत कहना वन्स मोर :- पटाखों की आवाज हमारी श्रवण शक्ति पर भी प्रभाव डालती है। इससे भविष्य में हमारी श्रवण शक्ति कमजोर हो सकती है।

आम दिनों में शोर का मानक स्तर दिन में 55 व रात में 45 डेसिबल के लगभग होता है परंतु दीपावल‍ी आते-आते यह 70 से 90 डेसिबल तक पहुँच जाता है। इतना अधिक शोर हमें बहरा करने के लिए पर्याप्त है।

* पटाखे, हादसों का पर्याय :-
कोई चीज हमें नुकसान पहुँचा सकती है। यह जानते हुए भी हम उसका उपयोग करते हैं। पटाखे हादसों का पर्याय हैं। हमारी थोड़ी-सी लापरवाही हमारे अमूल्य जीवन को बर्बाद कर सकती है। यह जानते हुए भी हम अपने शौक के खातिर हँसते-हँसते अपनी जान को दाँव पर लगाते हैं।
प्रतिवर्ष दीपावली पर कई लोग पटाखों से जल जाते हैं व कई अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं। अनार, रॉकेट, रस्सी बम आदि धमाकेदार पटाखों के शौकीनों के साथ तो ये हादसे होते ही हैं। उस विध्वंसकारी चीज को आखिर हम क्यों इस्तेमाल करते हैं, जो हमें केवल क्षणिक सुख देती है?

* इकोफ्रेंडली पटाखे बेहतर विकल्प :-
पटाखों के शौकीनों के लिए इस दीपावली पर बाजार में इकोफ्रेंडली पटाखे आए हैं, जिससे आपका पटाखे जलाने का शौक भी पूरा हो जाएगा और वो भी वायुमंडल को नुकसान पहुँचाए बगैर। अब आप ही बताएँ कि है ना यह फायदे का सौदा?

जिस परिवेश में हम रहते हैं, उसी को हम प्रदूषित करके अपनी जान के लिए खतरा मोल लेते हैं। पटाखे फोड़ना कोई बुरी बात नहीं है। दीपावली खुशियों का त्योहार है तो क्यों न हम इस दीपावली पर वायुमंडल को नुकसान पहुँचाए बगैर इकोफ्रेंडली पटाखों से अपने इस शौक को पूरा करें।

डूडल फार गूगल कांटेस्ट के विजेता बने अरुण कुमार यादव

प्रतिभा उम्र की मोहताज़ नहीं होती, बशर्ते उसे उचित परिवेश मिले। गूगल इंडिया ने चंडीगढ़ केंद्रीय विद्यालय के 9वीं क्लास के स्‍टूडेंट अरुण कुमार यादव को डुडल 4 गुगल कंपीटीशन-2012 का विजेता घोषित किया है। कंपीटीशन में विनिंग डुडल टाइटल इंडिया - प्रिज्म ऑफ मल्‍टीपलसिटी को 14 नवंबर चिल्ड्रन डे पर गुगल इंडिया के होम पेज पर लाइव डिस्प्ले किया जाएगा। ये डुडल क्लासमेट कंपनी की ओर से स्पेशल कलर पैक और बच्चें की ड्राइंग बुक्स पर भी चित्रित किया जाएगा। कंपीटीशन में फाइनल में पहुंचने वाले सभी प्रतिभागियों को सैमसंग टैबलेट और गुगल गुड डी बैग्स दिए जाएंगे।

इस साल के कंपीटीशन का थीम एकता में अनेकता था जिसमें दो लाख के करीब एंट्रीज मिली थी। कंपनी ने गुगल लोगो पर 5 से 16 साल के बच्‍चों को डुडलिंग के जरिए अपनी सृजन क्षमता दिखाने के लिए आमंत्रित किया था। प्रतियोगिता को तीन अलग -अलग कैटेगरीज में बांटा गया था। पहली कैटेगरी पहली से तीसरी क्लास, दूसरी में चौथी से छठी क्लास के और तीसरी कैटेगरी में 7वीं से 10वीं कक्षा के बच्‍चों को शामिल किया गया था। यादव के अलावा पहली से तीसरी क्लास की कैटेगरी में श्री अरबिंदो स्‍कूल ऑफ इंटरनेशनल एजुकेशन की सौभाग्‍य कालिया शामिल है। जबकि गुडग़ांव की अदिति तिवारी को चौथी से छठी क्लास वाली कैटेगरी में अंतिम तेरह में शामिल किया गया है। सभी को हार्दिक बधाइयाँ !!

Wednesday 31 October 2012

बढ़ते बच्चों के लिए सही खुराक...

बच्चों की ग्रोइंग एज में उन्हें राइट डाइट देना वाकई बहुत जरूरी है। लेकिन इसके लिए आप उनसे जबर्दस्ती न करें। बेहतर होगा कि आप पहले हर चीज के न्यूट्रिएंट्स के बारे में जानकर बच्चों को स्मार्ट तरीके से वे आइटम सर्व करें:

बच्चों की ग्रोइंग एज में उनके लिए न्यूट्रिशंस बहुत जरूरी हैं। लेकिन आजकल लाइफस्टाइल और फूड ऑप्शंस के चलते बच्चे जंक फूड की तरफ ज्यादा अट्रैक्ट होते हैं। न्यूट्रिशनिस्ट डॉ. सुनीता दुबे कहती हैं, 'पैरंट्स को बच्चों में खाने-पीने की अच्छी आदतें डालनी चाहिए। अगर ये शुरुआत से ही इन आदतों के हिसाब से पाला जाए, तो ये पूरी जिंदगी बरकरार रहती हैं। फिर अगर बच्चों की डाइट सही हो, तो इससे बच्चों को एनर्जी मिलने के साथ ही उनका दिमाग भी बहुत शार्प होता है। यहां तक कि उनके मूड पर भी इसका पॉजिटिव असर पड़ता है।'

क्लिनिकल साइकॉलजिस्ट डॉ. नूपुर कृष्णन कहती हैं, 'बच्चों को एनर्जी की बहुत ज्यादा जरूरत होती है, क्योंकि वे इस टाइम पर वे अपनी ग्रोइंग एज में होते हैं। अगर इस स्टेज पर कोई डेफिशिएंसी रह जाए, तो इससे उनकी ग्रोथ पर बहुत असर होता है।' देखा जाए, तो प्रति किलोग्राम के हिसाब से एक बच्चे को एडल्ट्स की तुलना में ज्यादा कैलरीज की जरूरत होती है। बच्चों में मेटाबॉलिज्म रेट बहुत ज्यादा होता है और एज बढ़ने के साथ धीरे-धीरे यह कम होने लगता है। फिर बड़ों की तुलना में बच्चों की फिजिकल ऐक्टिविटी ज्यादा होती है।

एक बच्चे को बड़े की तुलना में ज्यादा प्रोटीन चाहिए होता है। यह न सिर्फ टिशूज को रिपेयर करने के लिए चाहिए होता है, बल्कि प्रॉपर ग्रोथ के लिए भी इसकी जरूरत होती है। कैलरीज के कुल हिस्से में से 14 से 15 पर्सेंट तक प्रोटीन होता है। प्रोटीन का मेन सोर्स दूध और दूध से बने प्रॉडक्ट्स हैं, मसलन दही, पनीर, लस्सी, श्रीखंड वगैरह। इसके अलावा मीट, फिश, ऐग, पल्सेज वगैरह को भी बच्चों की डाइट में शामिल किया जाना चाहिए। डॉ. कृष्णन के मुताबिक, किस बच्चे को दिन में कितनी कैलरीज की जरूरत है, यह उसकी हाइट, बिल्ट, जेंडर और ऐक्टिविटी लेवल पर डिपेंड करता है। वैसे, यह काम पैरंट्स का होगा कि वह इस बात का ध्यान रखें कि बच्चों को पूरी कैलरीज मिल रही हैं या नहीं।

न्यूट्रिशंस हैं जरूरी
डाइटिशियन और न्यूट्रिशनिस्ट वैशाली एम. कहती हैं, 'बच्चों के ग्रोइंग पीरियड में फिजिकल, बॉयोकेमिकल और इमोशनल डिवेलपमेंट तेजी से होता है। इस दौरान वे एडल्ट हाइट का 20 पर्सेंट और वेट का 50 पर्सेंट गेन कर लेते हैं। इस टाइम पर उनकी ग्रोथ बहुत तेजी से होती है, इसलिए उन्हें न्यूट्रिएंट्स की जरूरत भी ज्यादा होती है। इसके लिए उसकी डाइट में ऐसी चीजें शामिल करें, जिनसे उसे एनर्जी, प्रोटीन, मिनरल्स और विटामिन्स सभी सही अमाउंट्स में मिलें।'

ये हैं फूड सोर्स
कैल्शियम- मिल्क एंड मिल्क प्रॉडक्ट, स्प्राउट्स, नचनी, बाजरा, ज्वार, ब्लैक ग्राम दाल, सीड्स, ग्राउंडनट चिक्की, आलमंड, सोयाबीन, मेथी, बीटरूट। आयरन- सोयाबीन, पालक, गोभी, रेड मीट, ब्रोकली। विटामिन सी- ब्रोकली, कैप्सिकम, गोभी, स्ट्रॉबेरी, लेमन, मस्टर्ड, टनिर्प, ग्रीन पापाया, कैबेज, पालक। विटामिन ए- डार्क ग्रीन, येलो वेजिटेबल एंड फ्रूट्स, गाजर, टमाटर, दूध, मक्खन, चीज और अंडे।

ईटिंग हैबिट्स
- जहां तक हो सके, खाना घर पर बनाने की कोशिश करें।
- बच्चों को भी इसमें इन्वॉल्व करें। बच्चों को ये सिलेक्ट करने में मजा आता है कि उन्हें लंच में क्या खाना है और डिनर में क्या खाना है। इस दौरान आप उन्हें खाने की न्यूट्रिशनल वैल्यूज के बारे में बता सकती हैं।
- आप खाने को इनाम या सजा के तौर पर यूज न करें।
- बच्चे पर प्लेट में रखा खाना पूरा खाने के लिए दबाव न डालें।
- बच्चे को खाना तभी दें, जब उसे वाकई भूख लगी हो। अगर बेवजह प्रेशर डालेंगी, तो वह खाना से मन चुराने लगेगा.

(साभार : नवभारत टाइम्स-दिल्ली , 29 दिसंबर2011)

Saturday 27 October 2012

मेरी झोली में

मेरी झोली में
सपने ही सपने भरे
ले-ले आ कर वही
जिसका भी जी करे.

एक सपना है
फूलों की बस्ती का
एक सपना है
बस मौज मस्ती का,
मुफ्त की चीज है
फिर कोई क्यों डरे?

एक सपना है
रिमझिम फुहारों का
एक सपना है
झिलमिल सितारों का
एक सपना जो
भूखे का पेट भरे.
ले-ले आ कर वही
जिसका भी जी करे.


 


Wednesday 24 October 2012

यूँ आरंभ हुआ विजयदशमी पर्व

आज दशहरा (विजयदशमी) पर्व है. यह पर्व भारतीय संस्कृति में सबसे ज्यादा बेसब्री के साथ इंतजार किये जाने वाला त्यौहार है। दशहरा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के शब्द संयोजन "दश" व "हरा" से हुयी है, जिसका अर्थ भगवान राम द्वारा रावण के दस सिरों को काटने व तत्पश्चात रावण की मृत्यु रूप में राक्षस राज के आंतक की समाप्ति से है। यही कारण है कि इस दिन को विजयदशमी अर्थात अन्याय पर न्याय की विजय के रूप में भी मनाया जाता है। दशहरे से पूर्व हर वर्ष शारदीय नवरात्र के समय मातृरूपिणी देवी नवधान्य सहित पृथ्वी पर अवतरित होती हैं- क्रमशः शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी व सिद्धिदात्री रूप में माँ दुर्गा की लगातार नौ दिनों तक पूजा होती है।

ऐसी मान्यता है कि नवरात्र के अंतिम दिन भगवान राम ने चंडी पूजा के रूप में माँ दुर्गा की उपासना की थी और माँ ने उन्हें युद्ध में विजय का आशीर्वाद दिया था। इसके अगले ही दिन दशमी को भगवान राम ने रावण का अंत कर उस पर विजय पायी, तभी से शारदीय नवरात्र के बाद दशमी को विजयदशमी के रूप में मनाया जाता है और आज भी प्रतीकात्मक रूप में रावण-पुतला का दहन कर अन्याय पर न्याय के विजय की उद्घोषणा की जाती है.

दशहरे की परम्परा भगवान राम द्वारा त्रेतायुग में रावण के वध से भले ही आरम्भ हुई हो, पर द्वापरयुग में महाभारत का प्रसिद्ध युद्ध भी इसी दिन आरम्भ हुआ था। पर विजयदशमी सिर्फ इस बात का प्रतीक नहीं है कि अन्याय पर न्याय अथवा बुराई पर अच्छाई की विजय हुई थी बल्कि यह बुराई में भी अच्छाई ढूँढ़ने का दिन होता है।

आप सभी को विजयदशमी पर्व की ढेरों शुभकामनायें !!

कृष्ण कुमार यादव

Sunday 21 October 2012

हिंदी के श्रेष्ठ शिशु-बाल गीत

हिन्दी के श्रेष्ठ शिशु और बाल गीतों की यदि चर्चा हो तो सर्वप्रथम हमारा ध्यान लोक-साहित्य पर जाता है। जिसमें न केवल अनेक लोककथाओं को पिरोते हुए बच्चों के लिए कविताएँ मिलती हैं बल्कि स्वर, लय और ध्वनि के चमत्कार से सुसाित बाल-मन को लुभाने वाले अनेक खेल गीत भी विद्यमान हैं। बाल लोकगीतकारों ने शिशु-मानस को बहुत आत्मीयता से देखा है और उसके अनुरूप ही गीत रचे हैं। इन गीतों के रचयिताओं के नाम कोई नहीं जानता लेकिन ये बाल और शिशु गीत हिंदी समाज में बच्चों के मन को वर्षों से गुदगुदाते आए हैं।

अक्कड़-बक्कड़ बंबे बोअस्सी नब्बे पूरे सौ।
सौ में लगा धागाचोर निकल के भागा।
 
यह एक ऐसा लोक खेल-गीत है जिसे गाकर बच्चे अपना कोई भी खेल आरंभ करते हैं।
बच्चों के लिए लोक-साहित्य में चंदा को हमेशा बच्चों के मामा की तरह प्रस्तुत किया गया है और चंदा मामा को लेकर अनेक बाल तथा शिशु-गीत प्रचलित हैं।

चंदा-मामा दूर केपुए पकाए पूर के
आप खाए थाली मेंमुन्ने को दें प्याली में
प्याली गई टूटमुन्ना गया रूठ!

ये प्लालियाँ, कटोरियाँ जिसमें बच्चे दूध-दही-भात, मनपसंद व्यंजन खाते हैं-बच्चों के मन में बसी रहती हैं।

लल्ला लल्ला लोरीदूध की कटोरी
दूध में बताशालल्ला करें तमासा।


या फिर,

अटकन-बटकन दही चटाकनमामा लाए चार कटोरी
एक कटोरी टूट गईमामा की बहू रूठ गई।


लोक-साहित्य अलिखित साहित्य है। पर हिंदी में लिखित बाल-साहित्य का प्रारंभ हम भारतेन्दु-युग से मान सकते हैं। इससे पहले बाल-साहित्य के नाम पर संस्कृत से हिंदी में अनुवादित केवल पंचतंत्र और हितोपदेश जैसी कृतियाँ ही थीं। इसमें बेशक बच्चों की अस्मिता झलकती है। भारतेंदु हरिश्चन्द्र की प्रेरणा से बाल-दर्पण (1862) तथा बालबोधिनी (1874) पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ। इन पत्रिकाओं से ही हिंदी में बाल-साहित्य का जन्म हुआ। भारतेंदु-युग के प्रमुख बाल साहित्यकारों में सबसे पहले स्वयं भारतेन्दु हरिशचन्द्र का ही नाम आता है। आपकी बालोपयोगी पुस्तकों में सत्य हरिश्चन्द्र, अंधेर नगरी, बादशाह दर्पण और कश्मीर कुसुम प्रमुख हैं। अंधेर नगरी की ये पंक्तियाँ तो आज भी बच्चों का ही नहीं, बड़ों-बड़ों का भी केवल मनोरंजन ही नहीं करतीं, उन्हें सोचने के लिए भी बाध्य करती हैं।

अंधेर नगरी चौपट राजा।
टके सेर भाजी, टके सेर खाजा॥


पूर्व स्वतंत्रता युग, जिसे हम 1901 से 1947 तक मान सकते हैं, में हिन्दी बाल साहित्य में काफी बढ़ोतरी हुई। इस काल के बाल साहित्यकारों में कामताप्रसाद गुरु, मैथिलीशरण गुप्त, रामनरेश त्रिपाठी, सुखदेव चौबे, विद्याभूषण, विशु, गिरजा दत्त शुक्ल, श्रीनाथ सिंह, सोहनलाल द्विवेदी, रामेश्वर गुरु, आदि प्रमुख हैं। इनमें से कई ऐसे कविलेखक हैं जो स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े रहे और जिनमें राष्ट्रीय भावना की प्रमुखता रही। इनकी बाल कविताएं भी राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत रहीं। सोहनलाल द्विवेदी इनमें प्रमुख कवि कहे जा सकते हैं। हजारी प्रसाद द्विवेदी का कहना था कि हिंदी में बड़े-बड़े साहित्यकार तो हैं किंतु बच्चों के माई-बाप तो केवल सोहनलाल द्विवेदी हैं। द्विवेदी जी ने राष्ट्रभाव को विकसित और प्रेरित करने के लिए अनेकानेक बाल गीत लिखे और इनमें उपदेश भी कुछ इस तरह दिया कि बच्चों का अपना स्वाद बरकरार रहे-

मीठा होता खस्ता खाजा
मीठा होता हलुआ ताजा
मीठे होते गट्टे गोल
सबसे मीठे, मीठे बोल
मैंने पाले बहुत कबूतर
भोले भाले बहुत कबूतर
पहने हैं पैंजनी कबूतर





बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दौर में जिन्हें और शिशु गीतकारों के रूप में प्रथम कवियों में सम्मिलित किया जा सकता है वे हैं, श्रीधर पाठक, बालमुकुंद गुप्त, सत्यनारायण कविरत्न आदि। बालमुकुंद गुप्त ने रेलगाड़ी नाम से एक अत्यंत सुंदर कविता लिखीं-

हिस हिस हिस हिस हिस हिस करती
रेल धड़ाधड़ जाती है
जिन जंजीरों से जकड़ी है
उन्हें खूब खड़काती है।





इस बाल गीत में स्पष्ट ही स्वतंत्रता के लिए प्रयत्न करने का उपदेश भी निहित है। इस काल प्रसंग में यदि अयोध्यासिंह उपाध्याय का नाम न लिया जाय तो यह उनके साथ बड़ा अन्याय होगा। हरिऔघ एक गंभीर कवि थे, लेकिन उन्होंने कई बालोपयोगी कविताएं लिखीं। उन्हें भी हिंदी के प्रथम बालकवियों में नि:संदेह रखा जा सकता है। उनकी एक प्रसिद्ध कविता बंदर शीर्षक से है-

देखो लड़कों बंदर आयाएक मदारी उसको लाया।
उसका है कुछ ढंग निरालाकानों में पहने वो बाला॥




पूर्व स्वतंत्रता युग के कुछ अन्य कवियों ने अत्यंत रोचक और बाल-मन में अपनी पैठ बनाती कविताएं रची हैं जिन्हें हम न केवल उत्कृष्ट कविताएं कह सकते हैं, बल्कि जो शिशु-बाल गीत लेखन के लिए एक मापदंड बनाती हैं। श्रीनाथ सिंह की एक कविता है-

नानी का संदूक
नानी का संदूक निरालाहुआ धुएं से बेहद काला
पीछे से वह खुल जाता हैआगे लटका रहता ताला
चंदन चौकी देखी उसमेंसूखी लौकी देखी उसमें
बाली जौ की देखी उसमेंखाली जगहों में है ताला।


भावपूर्ण, संवेदनशील और श्रेष्ठ गीतों को लिखने में जिस कवि ने सचमुच एक बड़ा और युगांतर काम किया है, वह है निरंकार देव सेवक। उन्होंने ही सच पूछा जाय, शिशु गीतों की असली पहचान कराई, उनकी खूबियों पर प्रकाश डाला और साथ ही उन्हें एक आधुनिक मुहावरा दिया। उनका एक मजेदार बाल गीत इस प्रकार है-

अगर मगर दो भाई थे, लड़ते खूब लड़ाई थे।
अगर मगर से छोटा था, मगर मगर से खोटा था.


-


अभी तक चिड़िया हिंदी शिशुबाल कविताओं में चीं चीं चूं चूं ही बोलती थी। एक प्रसिद्धि कविता है- चिडिया है चीं चीं बोल रही कानों में अमृत घोल रही वे फुदक-फुदक इठलाती हैं वे सबका मन बहलाती हैं। निरंकार जी ने चिड़ियों की बोली को एक नया आकार दिया। चिड़ियों की यह नई बोली हिंदी को अंग्रेजी अक्षरों और उनके संयोजन से मिली

टी-टुट टुट
चिड़िया कहती टी-टुट टुट, मुझको भी दे दो बिस्कुट
भूखी हूं, मैं खाऊंगी, खा पीकर उड़ जाऊंगी





यह वह समय था जब अंग्रेजी साहित्य का हिंदी पर गहरा प्रभाव पड़ रहा था। वस्तुत: हिंदी का सारा छायावादी साहित्य अंग्रेजी रोमेटिज्म से प्रभावित और प्रेरित था। इसी प्रभाव में सुमित्रानन्दन पंत ने यह कविता लिखी-

संध्या का झुटपुटबांसों का झुरमुट
थीं चहक रहीं चिड़ियां टी वी टी टुट टुट





ये पंक्तियां एक गंभीर कविता का अंश है। लेकिन सेवक जी ने चिड़ियों की इस अंग्रेजी बोली को स्पष्ट ही शिशु गीत में पिरोया है।

पूर्व स्वतंत्रता युग ने यदि हिंदी शिशु बाल गीतों के लिए एक सुदृढ़ आधार तैयार किया तो स्वतंत्रता के बाद के युग में ऐसे गीतों के लिए एक अच्छी और मजबूत इमारत बनी। इस युग के कवियों में दामोदर अग्रवाल, शेर जंग गर्ग, बाल स्वरूप राही, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, योगेन्द्र कुमार लल्ला, सूर्य कुमार पांडे, शंकुतला सिरोठिया आदि नाम सम्मान से लिए जा सकते हैं।
सेवक जी के बाद शिशु गीतों को और भी अधिक ऊंचाई पर ले जाने वालों में शेर जंग गर्ग का नाम सर्वोच्च शिखर पर है। बाल-मन को लुभाने वाले उनके नटखट और चुटीले गीत बहुत ही प्यारे बन पड़े है
कितनी अच्छी कितनी प्यारीसब दुनिया से न्यारी गाय
सारा दूध हमें दे देतीआओ इसे पिलाएं चाय
अथवा
गुड़िया है आफत की पुड़ियाबोले हिंदी कन्नड़ उड़िया।
नानी के संग भी खेली थीकिंतु अभी तक हुई न बुढ़िया॥
इन गीतों में जहां बच्चों के लिए मनोरंजन है, वहीं एक खिलंदडेपन के साथ विचार को प्रेरित करने वाले तत्व भी हैं। यही बात हमें दामोदर अग्रवाल के बाल-गीतों में भी दिखाई देती है। उन्होंने प्रकृति के कई रंग-बिरंगे चित्र तो खींचे ही हैं
कुछ रंग भरे फूलकुछ खट्टे मीठे फलथोड़ी बांसुरी की धुनथोड़ा जामुन का जल- परंतु उनके गीतों में कहीं न कहीं विचार भी समाहित है।
सड़क पर मिले जो मुझे एक पैसा
मैं झट से उसे अपनी मुट्ठी में ले लूं
मैं झट से उसे अपने भाई को दे दूं
मैं झट सेउसे अपनी मां को दिखाऊं
मैं सबको चलूं ले के मेला दिखाऊं
मैं राजा बनूं और हाथी पे घूमूं
मैं वो पैसा पूरा का पूरा लूटा दूं
मैं पैसा लुटाकर गरीबी मिटा दूं
योगेन्द्र कमार लल्ला और सूर्य कुमार पांडे के शिशु-गीत भी उल्लेखनीय हैं। उन्हें बिना किसी विवाद के श्रेष्ठ गीतों में रखा जा सकता है। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना एक बड़े कवि हैं। लेकिन बाल मन में उनकी पैठ देखते ही बनती है। उनकी प्रसिद्ध कविता-इब्नबतूतापहन के जूता-हमारा ध्यान तो खींचती ही है, बच्चों के दिल को भी आकर्षित करती है। हाल ही में इसकी प्रथम पंक्ति को टेक बनाकर एक फिल्मी गाना काफी चर्चा में रहा और गीतकार गुलजार पर आरोप लगाए गए। पर मुद्दे की बात यह है कि गुलजार जैसे कवि भी इस गीत के आकर्षण से बच नहीं पाए। सर्वेश्वर जी का पूरा गीत इस प्रकार है
इब्नबतूता पहन के जूता निकल पड़े तूफान में
थोड़ी हवा नाक में घुस गई
थोड़ी घुस गई कान में
कभी नाक को कभी कान को
मलते इब्नेबतूता
इसी बीच में निकल पड़ा
उनके पैरों का जूता
उड़ते-उड़ते जूता उनका
जा पहुंचा जापान में
इब्नबतूता खड़े रह गए मोची की दुकान में।

यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि हिन्दी जगत में कोई भी कवि अपने को बाल कवि के रूप में स्थापित करने के लिए उत्सुक नहीं हैं। बड़े-बड़े कवियों ने तमाम अच्छे शिशु और बाल गीत लिखे हैं। बाल साहित्य रचा है। कुछ ने तो अपना लेखन ही बाल साहित्य से आरंभ किया है। लेकिन आगे चलकर वे प्रौढ़ साहित्य की ओर प्रवृत्त हो गए। बाल साहित्य उनके लिए गौण हो गया। यह ध्यातव्य है कि हिंदी के अनेक बड़े और प्रतिष्ठित कवियों ने बाल साहित्य की रचना की। उनमें मुंशी प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, निराला, सुमित्रानंदन पंत, सुभद्राकुमारी चौहान, मैथिलीशरण गुप्त, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना आदि साहित्यकारों का नाम लिया जा सकता है। किंतु क्योंकि हिंदी में बाल साहित्य हमेशा ही दोयम दर्जे का साहित्य माना गया अत: बड़े साहित्यकार इससे विमुख हो गए। आज जरूरत है कि प्रतिभा संपन्न साहित्यकार बाल लेखन की ओर प्रवृत्त हों और अपने को बाल साहित्यकार कहलाने में गौरवान्वित महसूस करें।

-डा. सुरेन्द्र वर्मा
10 एचआईजी-1, 29 कलर रोड, इलाहाबाद-11001

(साभार: लोक गंगा)

Thursday 18 October 2012

सोन मछरिया

ताल में जी ताल में
 सोनमछरिया ताल में.
मछुआरे ने मंतर फूंका
जाल गया पाताल में

थर-थर कांप ताल का पानी
फंसी जाल में मछली रानी,
तड़प-तड़प कर सोनमछरिया
मछुआरे से बोली भैया-
मुझे निकालो, मुझे निकालो,
दम घुटता है जाल में.

जाल में जी जाल में
सोनमछरिया जाल में.

मछुआरे ने सोचा पल भर,
कहा- छोड़ दूं तुझे मैं अगर,
उठ जाएगा दाना-पानी,
क्या होगा फिर मछली रानी?'
मछली बोली रोती-रोती-
'मेरे पास पड़े कुछ मोती,
जल में छोड़ो, ले आऊँगी,
सारे तुमको दे जाऊंगी.'

मछुआरे को बात जंच गई,
बस मछली की जान बच गई,
मछुआरे को मोती दे कर
जल में फुदकी जल की रानी.
सोनमछरिया-मछुआरे की
खत्म हुई इस तरह कहानी.
 
C-H2/1002 Classic Residency, Rajnagar Extension, NH-58, Ghaziabad-201003,

Tuesday 16 October 2012

'नवरात्र' पर 'नव-सृजन' की ओर हों तत्पर..

 
!! नवरात्र पर नव-सृजन की ओर तत्पर हों !!
***नवरात्र की हार्दिक शुभकामनायें ***

Tuesday 5 June 2012

पर्यावरण सुरक्षित तो जीवन सुरक्षित

पर्यावरण सुरक्षित तो जीवन सुरक्षित
(विश्व पर्यावरण दिवस पर)

Sunday 13 May 2012

माँ - दीनदयाल शर्मा


माँ तू आंगन मैं किलकारी,
माँ ममता की तुम फुलवारी।
सब पर छिड़के जान,
माँ तू बहुत महान।।

दुनिया का दरसन करवाया,
कैसे बात करें बतलाया।

दिया गुरु का ज्ञान,
माँ तू बहुत महान।।

मैं तेरी काया का टुकड़ा,
मुझको तेरा भाता मुखड़ा।
दिया है जीवनदान,
माँ तू बहुत महान।।

कैसे तेरा कर्ज चुकाऊं,
मैं तो अपना फर्ज निभाऊं।
तुझ पर मैं कुर्बान,
माँ तू बहुत महान।।

-दीनदयाल शर्मा,

10/22 आर.एच.बी. कॉलोनी,
हनुमानगढ़ जंक्शन-335512
राजस्थान, भारत

Monday 7 May 2012

पूर्व राज्यपाल डा. भीष्म नारायण सिंह ने किया कृष्ण कुमार-आकांक्षा यादव के बाल-गीत संग्रहों का विमोचन



युगल दंपत्ति एवं चर्चित साहित्यकार व ब्लागर कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव के बाल-गीत संग्रह 'जंगल में क्रिकेट' एवं 'चाँद पर पानी' का विमोचन पूर्व राज्यपाल डा. भीष्म नारायण सिंह और डा. रत्नाकर पाण्डेय (पूर्व सांसद) ने राष्ट्रभाषा स्वाभिमान न्यास एवं भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद्, नई दिल्ली द्वारा गाँधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में 27 अप्रैल, 2012 को किया. उद्योग नगर प्रकाशन, गाजियाबाद द्वारा प्रकाशित इन दोनों बाल-गीत संग्रहों में कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव के 30 -30 बाल-गीत संगृहीत हैं.


इस अवसर पर दोनों संग्रहों का विमोचन करते हुए अपने उद्बोधन में पूर्व राज्यपाल डा. भीष्म नारायण सिंह ने युगल दम्पति की हिंदी साहित्य के प्रति समर्पण की सराहना की. उन्होंने कहा कि बाल-साहित्य बच्चों में स्वस्थ संस्कार रोपता है, अत: इसे बढ़ावा दिए जाने क़ी जरुरत है. पूर्व सांसद डा. रत्नाकर पाण्डेय ने युवा पीढ़ी में साहित्य के प्रति बढती अरुचि पर चिंता जताते हुए कहा कि, यह प्रसन्नता का विषय है कि भारतीय डाक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी होते हुए भी श्री यादव अपनी जड़ों को नहीं भूले हैं और यह बात उनकी कविताओं में भी झलकती है. युगल दम्पति के बाल-गीत संग्रह क़ी प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें आज का बचपन है और बीते कल का भी और यही बात इन संग्रह को महत्वपूर्ण बनाती है.


कार्यक्रम में राष्ट्रभाषा स्वाभिमान न्यास के संयोजक डा. उमाशंकर मिश्र ने कहा कि यदि युगल दंपत्ति आज यहाँ उपस्थित रहते तो कार्यक्रम कि रौनक और भी बढ़ जाती. गौरतलब है कि अपनी पूर्व व्यस्तताओं के चलते यादव दंपत्ति इस कार्यक्रम में शरीक न हो सके. आभार ज्ञापन उद्योग नगर प्रकाशन के विकास मिश्र द्वारा किया गया. इस कार्यक्रम में तमाम साहित्यकार, बुद्धिजीवी, पत्रकार इत्यादि उपस्थित थे.

- रत्नेश कुमार मौर्या
संयोजक- 'शब्द-साहित्य'
म्योराबाद, इलाहाबाद.
mauryark@indiatimes.com
http://shabdasahitya.blogspot.in/

Sunday 25 March 2012

सब हैप्पी बर्थ-डे गाओ..


जन्मदिन है पाखी का
खूब करो धमाल
जमके आज खाओ सब
हो जाओ लाल-लाल।

सब हैप्पी बर्थ-डे गाओ
मस्ती करो, मौज मनाओ
पाखी, तन्वी, कुहू, ख़ुशी
सब मिलकर बैलून फुलाओ।

आईसक्रीम और केक खाओ
कोई भी न मुँह फुलाओ
कितना प्यारा बर्थ-डे केक
सब हैप्पी बर्थ-डे गाओ।

Friday 23 March 2012

भारतीय नववर्ष विक्रमी सम्वत 2069 पर हार्दिक शुभकामनायें


आप सभी को भारतीय नववर्ष विक्रमी सम्वत 2069 और चैत्री नवरात्रारंभ पर हार्दिक शुभकामनायें. आप सभी के लिए यह नववर्ष अत्यन्त सुखद हो, शुभ हो, मंगलकारी व कल्याणकारी हो, नित नूतन उँचाइयों की ओर ले जाने वाला हो !!


-आकांक्षा यादव

Sunday 22 January 2012

बहादुर बच्चों के जज्बे को सलाम..!!

कहते हैं हौसले हों तो आकाश भी छू लेता है मनुष्य. फिर बच्चे तो इस देश के भविष्य हैं. उनका जज्बा हमें प्रेरणा देता है. ऐसे ही 24 बच्चों को इस साल राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार के लिए चुना गया है. देश के 24 बहादुर बच्चों में शामिल इन नौनिहालों ने अपनी छोटी सी उम्र में जिस साहस का परिचय दिया है, वह वाकई हैरत में डालने वाला और सराहनीय है। पुरस्कार पाने वाले बच्चों में 08 लड़कियां और 16 लड़के हैं। इनमें से पांच बच्चों को मरणोपरांत यह पुरस्कार दिया जाएगा।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह गणतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर इन बच्चों को राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित करेंगे। ये बहादुर बच्चों राजधानी के ऐतिहासिक राजपथ पर होने वाले गणतंत्र दिवस परेड में भी भाग लेंगे।

इस श्रेणी में बहादुरी का सर्वश्रेष्ठ ‘भारत पुरस्कार’ उत्तराखण्ड के 15 वर्षीय कपिल नेगी को मरणोपरांत दिया जाएगा। कपिल ने बाढ़ में फंसे अपने साथियों को निकालने में मदद की लेकिन इस प्रयास में कपिल की जान चली गई। पुत्र के खोने से भावुक हुईं कपिल की माता अनीता नेगी ने कहा, "वह सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनना चाहता था। हमें अपने पुत्र पर गर्व है लेकिन वह इस दुनिया में नहीं है।"


प्रतिष्ठित गीता चोपड़ा पुरस्कार गुजरात की 13 वर्षीया मित्तल महेन्द्रभाई पताडिया को दिया जाएगा। जिसने अपने अदम्य साहस का परिचय देते हुए हथियारबंद अपराधियों का सामना किया था और डकैती के प्रयास को विफल कर दिया था।

संजय चोपडा पुरस्कार के लिए उत्तर प्रदेश के 12वर्षीय ओम प्रकाश यादव को चयनित किया गया है। ओम प्रकाश ने अत्यंत साहस का परिचय देते हुए जलती हुई वैन से अपने आठ स्कूली साथियों की जान बचाई थी और ऐसा करने के दौरान वह 70 प्रतिशत तक जल गए थे। ओम प्रकाश यादव ने कहा, "मैं काफी गर्व का अनुभव करता हूं क्योंकि मैंने अपने स्कूल के साथियों का जीवन बचाया। मैं प्रधानमंत्री के हाथों राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार पाने को लेकर काफी खुश हूं। मेरा संदेश है कि लोगों को एक-दूसरे की सहायता करनी चाहिए।"

अरुणाचल प्रदेश के 14 वर्षीय मास्टर आदित्य गोपाल (मरणोपरांत) दिल्ली के 14 वर्षीय मास्टर उमा शंकर और छत्तीसगढ़ की 15 वर्षीया अंजलि सिंह गौतम को बापू ग्यैधानी पुरस्कार के लिए चुना गया है। आदित्य गोपाल ने पानी में डूब रहे एक मित्र को बचाने के प्रयास में अपनी जान गंवा दी थी। मास्टर उमा शंकर ने बस दुर्घटना में घायल लोगों को अस्पताल पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. जबकि अंजलि ने अपने छोटे भाई को नक्सवादी हमले से बचाया था।

पुरस्कार पाने वाले अन्य बच्चों इस प्रकार हैं। मास्टर वाई अमर उदय किरण और मास्टर एस शिव प्रसाद (आंध्र प्रदेश), मास्टर रंजन प्रधान और कुमारी शीतल साध्वी सलुजा- (छत्तीसगढ़), कुमारी दिव्याबेन मनसंगभाई चौहान (गुजरात) मास्टर संदेश पी हेगडे और कुमारी सिंधुश्री बी.ए (कर्नाटक) मास्टर मोहम्मद निशाद वी पी. मास्टर अंसिफ सी के और मास्टर सहसाद के (केरल) मास्टर जॉनसन तुरंगबम एवं मास्टर क्षेत्रिमयम राकेश सिंह (मणिपुर) मास्टर सी ललदुहौमा "मरणोपरांत" (मिजोरम) कुमारी प्रशांत शांडिल्य (ओडीशा) मास्टर डुंगर सिंह (राजस्थान) मास्टर जी परमेश्वरन (तमिलनाडु) कुमारी लवली वर्मा "मरणोपरांत" उत्तर प्रदेश और कुमारी सौधिता बर्मन "मरणोपरांत" पश्चिम बंगाल।

उल्लेखनीय है कि वीरता पुरस्कार के लिए इन बहादुर बच्चों का चयन कई मंत्रालयों, गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) के प्रतिनिधियों और आईसीसीडबल्यू के सदस्यों ने किया है। गणतंत्र दिवस से पहले प्रधानमंत्री इन बहादुर बच्चों को रजत पदक, प्रमाणपत्र और नकद राशि देकर सम्मानित करेंगे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पिछले साल पुरस्कार राशि को बढ़ाने का वादा किया था और इस वर्ष दी जाने वाली राशि में तीन गुने की वृद्धि हुई है। अब तक राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मानित होने वाले बच्चों को सात से 10 हजार रुपये का नकद इनाम दिया जाता था लेकिन इस साल भारत अवार्ड के तहत पचास हजार, गीता चोपड़ा और संजय चोपड़ा अवार्ड के तहत चालीस हजार रूपये और बापू गैधानी अवार्ड के तहत बीस हजार रूपये प्रदान किये जायेंगें

पुरस्कार प्राप्त बच्चे गणतंत्र दिवस की परेड में भी हिस्सा लेंगे। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील पुरस्कार विजेता बच्चों के सम्मान में एक समारोह का आयोजन करेंगी।

--बाल दुनिया