Wednesday 11 May 2016

बाल साहित्य विशेषांकों में एक और कदम ''ज्ञान विज्ञान बुलेटिन'' का

हाल ही में ज्ञान विज्ञान बुलेटिन का बाल साहित्य विशेषांक प्रकाशित हुआ है। इस अंक का विमोचन कौसानी में आयोजित राष्ट्रीय बाल साहित्य संगोष्ठी में हुआ। बाल साहित्य के पुरोधा से लेकर युवा बाल साहित्यकारों के महत्वपूर्ण आलेख पत्रिका में शामिल किए गए हैं। इसमें डाॅ0 राष्ट्रबंधु, डाॅ0 हरिकृष्ण देवसरे, रमेश तैलंग, देवेंद्र मेवाड़ी, डाॅ0 दिविक रमेश, डाॅ0शकुंतला कालरा, डाॅ0 नागेश पांडेय ‘संजय’, अशोक सिंह सोलंकी, कुंवर प्रदीप निगम, डाॅ0 प्रभु चैधरी, रामआसरे गोयल, विमला जोशी ‘विभा’, सुषमा भंडारी, डाॅ0 मोहम्मद अरशद खान, जगदीश जोशी, मालती शर्मा ‘गोपिका’, मनोहर चमोली ‘मनु’, के महत्वपूर्ण आलेख इस अंक में शामिल हैं। 

इस अंक में बाल साहित्य की उपलब्धियों के साथ अपेक्षाओं पर भी महत्वपूर्ण बातें कही गई हैं। भविष्य का बाल साहित्य पर भी विमर्श पत्रिका में शामिल है। बाल साहित्य का विकास एवं संभावनाओं, बाल साहित्य में लोक साहित्य का योगदान, बाल साहित्य में पर्यावरण, बाल साहित्य अपेक्षा और उपेक्षा , बाल साहित्य और इंटरनेट, बाल साहित्य यथार्थ और कल्पना, बच्चों के लिए विज्ञान लेखन, बाल साहित्य में संभावनाएं, संचार माध्यम, बालक और बाल साहित्य, आंचलिकता और बाल साहित्य, हिन्दी बाल कविता उपलब्धियां और संभावनाएं तथा बाल साहित्य कैसा हो आदि पर विहंगम चर्चा की गई है।

इस अंक का संपादकीय कहता है कि बालसाहित्य के प्रचार-प्रसार में बालपत्रिकाओं-पुस्तकों की खरीद के प्रति उदासीनता को तोड़ने की आवश्यकता है। संपादकीय कहता है कि पढ़ने-लिखने की संस्कृति को बनाए और बचाए रखने के लिए पुस्तकालयों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। संपादकीय बाल साहित्य को वैज्ञानिक सोच पर आधारित और बाल मनोविज्ञान आधारित होने की वकालत करता है। 

डाॅ0 हरिकृष्ण देवसरे का महत्वपूर्ण आलेख पत्रिका में शामिल किया गया है। वह लिखते हैं कि आज बालसाहित्य की घटिया पुस्तकें और आलोचनाएं उसके भविष्य के लिए कितनी विषैली हैं,यह सहज ही देखा जा सकता है। लोककथाओं की दुनिया में बच्चों को भटकाकर, झूठे कल्पनालोक की सैर कराकर और सदियों  पुराने जीवन मूल्यों की घुट्टी पिलाकर हम कब तक अपने को संतुष्ट मानकर बालसाहित्य के विकास का ढोल पीटते रहेंगे?

देवेन्द्र मेवाड़ी का आलेख कहता है कि बच्चे वही पढ़ेंगे जो उन्हें रोचक लगेगा और आसानी सेे उनकी समझ में आएगा। अगर उसे पढ़ने में आनंद नहीं आएगा और वे उसे सहज रूप से समझ नहीं पाएंगे तो उस किताब या पत्र पत्रिका के बंद करके अलग रख देंगे। आलेख आगे कहता है कि आज बच्चों कको विज्ञान की तर्क संगत कहानी चाहिए जो उसे कल्पना लोक में भी ले जाए औैर उसे यह भी लगे कि हां ऐसा हो सकता है। ऐसी कहानी, जिस पर वे विश्वास कर सकें जो उनके अपने ज्ञान के तर्क पर सही साबित हो सके। 

रमेश तैलंग का आलेख कहता है कि हिंदी बाल कविता ने अपनी लगभग डेढ़ सौ वर्षों की अनवरत यात्रा में कथ्य,शिल्प और प्रयोग की दृष्टि से अनेक उपलब्धियां हासिल की हैं और नई संभावनाओं के भी नए गवाक्ष खोले हैं । आलेख कहता है कि बाल कविता की आत्मा सूचना में नहीं संवेदना में बसती है। अनुभवों में नहीं अनुभूतियों में रसती है। 

दिविक रमेश का आलेख कहता है कि आज हिंदी के बालसाहित्य का इतिहास भी बहुत अनजाना नहीं रह गया है। हालांकि हिन्दी में उत्कृष्ट बाल साहित्य है लेकिन उसकी उपेक्षा क्यों? अब तो लिखने वाले भी बहुत हैं। लिखा भी बहुत जा रहा है। किसी भी महत्वपूर्ण वस्तु की उपेक्षा या तो नासमझी में की जाती है या उसे कमतर समझते हुए जानबुझकार। हिंदी का बाल साहित्य इन दोनों  का ही शिकार है।

डाॅ0 मोहम्मद अरशद खान का आलेख कहता है कि बदलती परिस्थितियां और तकनीकी विकास के दौर में भी बाल साहित्य और बाल पत्रिकाओं की सार्थकता बनी रहेगी। उसका रूप भले ही बदल जाए। आलेख इशारा करता है कि बच्चे सोने के अतिरिक्त अन्य किसी भी क्रिया टी0वी0 के सामने अपना अधिक समय बिताते हैं। आलेख संचार माध्यम,बालक और बालसाहित्य पर बहुत सारे मुद्दे केेंद्रित करता है।

जगदीश जोशी का आलेख कहता है कि हमारे क्षेत्र में जो भी बाल गीत,बाल कथाएं एवं बच्चों से संबंधित साहित्य बिखरा पड़ा है उसे संकलन करने की योजना बनायी जानी चाहिए।

सुषमा भंडारी का आलेख कहता है कि आज के युग में बच्चे यथार्थ से जुड़ना चाहते हैं इसलिए केवल काल्पनिक काल्पनिक बातों पर विश्वास नहीं करते। इसलिए साहित्य में कल्पना का पुट सिर्फ रूचि पैदा करने के लिए होना चाहिए। यथार्थ की नींव पर कल्पनाओं का समावेश करके साहित्य गढ़ा जाए तो बच्चे अवश्य रूचि लेंगे।

कुंवर प्रदीप निगम का आलेख जोर देते हुए कहता है कि आज का बाल साहित्य बच्चों के शिष्ट, सुसंस्कृत एवं सुयोग्य नागरिक बनाने में योगदान कर रहा है। आलेख आगे कहता है कि बाल साहित्य का मुख्य उद्देश्य मनोरंजन,उत्कंठित, प्रेरक,जिज्ञासापूर्ण तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सारगर्भित हो जो राष्ट्र निर्माण में भी सहायक बन सके। 

डाॅ0 प्रभु चौधरी  का आलेख कहता है कि बाल साहित्य की भाषा गूढ़ नहीं बल्कि सीधी सरल जो सहज समझ में आ सके ऐसी होनी चाहिए। शब्दावली भी ऐसी हा जो बच्चों को स्वयं अर्थ प्रदान करती चले। आलेख आगे कहता है कि हमारे सामने लक्ष्य होना चाहिए कि जीवन की दृृष्टि से हम बाल को इस प्रकार से चले किक कहीं से भी वह कुंठित न हो। उसकी प्रतिभा का दोहन न हो। 

रामआसरे गोयल का आलेख कहता है कि लोकसाहित्य को बड़ों से सुनकर ही हर बचपन बड़ा हुआ है। लोकसाहित्य को आधार बनाकर ही साहित्यकार बालसाहित्य रचता है। लोक साहित्य ही बालसाहित्य की नींव की ईंट है। ध्यान देने योग्य बात है कि बच्चों के लिए साहित्य सर्जना करते समय बचपन की डोर को पुनः थामना होगा। उनकी नटखट शरारतें,तोेतली बोली,किशोरों की ऊहापोहपरक स्थिति को ध्यान में रखकर ही बालसाहित्य की रचना हो। 

विमला जोशी ‘विभा’ का आलेख कहता है कि आज जहां हम बालसाहित्य में मनोरंजन,वैज्ञानिक सोच व वैचारिक खुलेपन की बात करते हैं वहीं हमें गिरते नैतिक मूल्यों हमारी संस्कृति हमारी विरासत और पर्यावरण के प्रति भी चिंतनशील होकर बाल सुलभ मनोभाव को ध्यान में रखते हुए अपनी कलम चलानी होगी।
डाॅ0 नागेश पांडेय ‘संजय’ का आलेख कहता है कि इंटरनेट पर बाल साहित्य नितांत अपेक्षित है किंतु बालकों से इसका जुड़ाव अभिभावकों के संरक्षण में ही होना चाहिए। लेख कहता है कि इंटरनेट पर आत्मतुष्टि के लिए लिखी गई रचनाएं आज के जागरूक बच्चे के मन में बालसाहित्य के प्रति अरूरिच ही उत्पन्न कर रही है। इस अंक में राष्ट्रबंधु पर एक संस्मरण है। साथ ही राष्ट्रबंधु जी की एक बाल कहानी भी प्रकाशित है।

पिछले कई सालों से भारत ज्ञान विज्ञान समिति,उत्तराखण्ड का मुखपत्र नवंबर में बाल साहित्य विशेषांक प्रकाशित ही नहीं कर रहा है, उसका भरपूर स्वागत भी किया जाता है। लेकिन इस बार जून माह में ही इस मासिक बुलेटिन का बालसाहित्य विशेषांक देखकर अपार प्रसन्नता हुई। 40 पृष्ठ वह भी संपूर्ण ए फोर साइज के आवरण मुख भीतर व बाहर सहित कुल चार पेज को रंगीन देखकर अलग ही अनुभूति होती है। हमेशा की तरह इस बुलेटिन में एक-एक पेज पर पठनीय सामग्री पाठकों के लिए रखी गई है। इस अंक के साथ बुलेटिन अपने साढ़े ग्यारह साल पूर्ण कर चुका है। 

पत्रिका: ज्ञान विज्ञान बुलेटिन ( मासिक)/ संपादक: उदय किरौला/प्रकाशक: भारत ज्ञान विज्ञान समिति, उत्तराखण्ड/पृष्ठ संख्या: 40/ मूल्य: 5 रुपए
समीक्षक: मनोहर चमोली पोस्ट बाक्स 23 पौड़ी, उत्तराखंड
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