Thursday, 5 August, 2010

ये क्यूं हो गया : किरण राजपुरोहित नितिला


जी भरकर खेली भी न थी
पापा की गोदी में
लडाया ही न था मां ने
भरपूर अपनी बांहों में!
दादी की दुलार ने
थपका भी न था अभी
दादा ने उंगली थाम
कुछ दूर ही चलाया था!
जीजी की छुटकी अभी
मस्ती में उछली न थी
छोटू का दूध झपट कर
पिया न था जी भर कर!
छुटकी के खिलौनों से
कुढ़ ही तो रही थी
भैया के चिकोटी के निशां
अभी ताजे ही तो थे,
बाजू से उसके मेरे दांतों
की ललाई छूटी न थी
ठुनक ठुनक कर जिद से
रोना मनमानी में और
खुश हो कर दादा के
गले लगती ही थी !
सहेली की धौल याद थी
उसकी कुट्टी अभी भूली न थी
नई फ्रॉक न आने पर
मचलना जारी ही था
उछल कर भइसा की गोद में
चढना यूं ही चल रहा था !
पड़ोस के भैया को
बहाने खोजती थी चिढाने के
पड़ोसन चाची को डराना
चुपके से, चल ही रहा था
संतोलिया छुपाछुपी का रंग
अभी चढ़ ही रहा था
गड्डे कंचे अभी स्कर्ट की
जेब में चिहुंक ही रहे थे !
आंगन में चहक
शुरु ही हुई थी
मां की लाड़ली गोरैया
कहां मस्त फुदकी थी ,
महसूस ही तो न किया था
मन भर ना ही जिया था
जो अनमोल था उसे
सहज ही तो लिया था
इतना तो सोचा भी न था
और ....और..........
और ....सबकी नजरें बदल गई
नसीहतें बरसने लगी !
कुछ सीखो !
कब सीखोगी !
यहां मत जाओ !
उससे बात न करो !
इस तरह मत हंसा करो!
सब कहते संभल कर रहो !
यह मत पहनो ! नजर नीची रखो !
क्यूं कि ------क्यूं कि
अब तुम बड़ी हो गई हो !!

किरण राजपुरोहित नितिला

12 comments:

Akanksha Yadav said...

यह मत पहनो ! नजर नीची रखो !
क्यूं कि ------क्यूं कि
अब तुम बड़ी हो गई हो !!

....बहुत सुन्दर कविता..किरण जी को बधाई.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

एक लडकी के जीवन को बखूबी लिखा है ..सुन्दर अभिव्यक्ति

Akshitaa (Pakhi) said...

यह तो बहुत अच्छी कविता है...
________________________
'पाखी की दुनिया' में 'लाल-लाल तुम बन जाओगे...'

Dr Mandhata Singh said...

आजादी कहां मिल पाती हैं बेटियों को। घर में भाइयों के मुकाबले खुद मां कम तरजीह देती है और समाज में अबला की पहचान सबकुछ ऐसे दायरे हैं जहां बेटियां जीवनभर निगहबानी की शिकार हो जाती हैं। बड़ी अच्छी कविता है। शायद लोगों को सोचने पर मजबूर करे।

प्रवीण पाण्डेय said...

यह सत्य है, पुष्प खिलने के पहले ही माली सिमटने की आज्ञा दे देते हैं।

Ashish (Ashu) said...

दिल को छू गयी..
और ....और..........
और ....सबकी नजरें बदल गई

सच कहा ऒर दुनिया ही बदल जाती हे
काश कोई दुनिया वालो से कहता कि नजरे नीची रखो बिटिया बडी हो रही हॆ

Dr. Brajesh Swaroop said...

उम्दा भाव लिए कविता..बधाई.

Dr. Brajesh Swaroop said...

उम्दा भाव लिए कविता..बधाई.

शरद कुमार said...

कविता के माध्यम से सुन्दर टिपण्णी...अनुपम रचना.

मुकेश कुमार सिन्हा said...

dil ko chhuti bal sulabh rachna.......:)

किरण राजपुरोहित नितिला said...

sabka bahut bahut dhanywaad rachana sarahane ke liye !!


Aashu ne jo kaha wah man ko bha gaya ---
काश कोई दुनिया वालो से कहता कि नजरे नीची रखो बिटिया बडी हो रही हॆ

rajkishore said...

ये क्यूं हो गया : किरण राजपुरोहित नितिला कविता पढी और बहुत ही पंसद आई शुभ कामनाओं के साथ राजकिशोर राजपुरोहित
http://www.rajpurohitsamaj.org/