Monday, 25 April, 2011

प्यार से समझाएं बच्चों को..

बच्चों को अनुशासन में रहने और रखने के लि‌ए हिंसा का सहारा लिया जाता है । ये हिंसा कहीं और नहीं अपने ही घरों और स्कूलों में होती है । बच्चों पर की गई हिंसा किसी भी रूप में हो सकती है, चाहे वह शारीरिक हो, मानसिक हो या फिर भावनात्मक ।

यूनिसेफ की एक रिपोर्ट में कहा गया हैं, कि दो से 14 साल की आयु के बच्चों को अनुशासन में रखने के लि‌ए तीन चौथा‌ई बच्चों के साथ हिंसा का सहारा लिया जाता है । इसमें आधे बच्चों को शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है । जेनेवा में आयोजित यू‌एन की मानवाधिकार समिति के बैठक में यूनिसेफ ने एक रिपोर्ट प्रस्तुत किया । यह रिपोर्ट दुनिया के ३३ निचले और मध्यम आय वाले देशों के 1-14 आयुवर्ग के बच्चों पर आधारित थी, जिसमें बच्चों के अभिभावक भी शामिल थे । बैठक में यू‌एन विशेषज्ञों ने तय किया कि बच्चों के प्रति हिंसात्मक रवैया न अपनाने के लि‌ए जागरूकता फैला‌ई जाये। इसको रोकने लि‌ए दुनियाभर की सरकारें कानूनी कदम उठायें ।

रिपोर्ट में कहा गया है, कि बच्चों को अनुशासन में रखने के लि‌ए घरों में आठ तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है । इसमें कुछ शारीरिक हैं, तो कुछ मानसिक । शारीरिक हिंसा में बच्चों को पीटना या जोर से झकझोरना आदि है, जबकि मानसिक हिंसा में बच्चों पर चीखना या नाम लेकर डांटना आदि है ।

थोड़े देर के लि‌ए यह बात ठीक भी है, लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है जो काफी खतरनाक है । बचपन में बोया गया हिंसा का ये बीज युवा होते-होते विषधर वटवृक्ष का रूप ले लेता है, जो किसी भी रूप में अच्छा नहीं है । यह सच है कि शिक्षा और शिष्टाचार सिखाने के लि‌ए अनुशासन जरूरी है । हो सकता है, अनुशासन के लि‌ए दंड भी आवश्यक हो, लेकिन दंड इतना कभी नहीं होना चाहि‌ए कि बच्चों के कोमल मन और उसके स्वाभिमान पर चोट करे, उसकी कोमल भावना‌एं आहत हो ।

बच्चों पर किये या हु‌ए हिंसक और हृदय विदारक अत्याचार न केवल उनके बाल सुलभ मन को कुंठित करते हैं, बल्कि उनके मन में एक बात घर कर जाती है, कि बड़ों (सबलों) को छोटों (निर्बल) पर हिंसा करने का अधिकार है । बाल सुलभ मन पर घर कर जाने वाली यही बात, कुंठा आगे चलकर निजी जिंदगी और सामाजिक जीवन में विषवेल के रूप में दिखा‌ई देता है । गलती करना इंसान कि फितरत है, और गलती को सुधार लेना इंसान कि बुद्धिमता का परिचायक । गलती को‌ई भी करे, एहसास होने पर उसे भी दुख होता है । गलती पर दंड देने या प्रताड़ित करने से हो चुकी गलती को सुधारा नहीं जा सकता है । प्रताड़ित करने और मन को आहत करने के बजाये उसे बताया जाना चाहि‌ए कि गलती हु‌ई तो क्यों और कैसे हुई? उसके नुकसान का आंकलन बच्चों से ही करा‌एँ।

गलती का एहसास कराने के लि‌ए हिंसक होने की जरूरत नहीं है, प्यार से बता‌एं । प्यार हर काम को आसन करता है । यह मुश्किल तो है, लेकिन दुश्कर नहीं और परिणाम सौ प्रतिशत ।

साभार : समय दर्पण

11 comments:

अजित गुप्ता का कोना said...

बात तो आपकी अच्‍छी है लेकिन हम देखते रहे हैं कि पुराने जमाने में बच्‍चों के साथ सख्‍ती बरती जाती थी और वे कभी भी हिंसक नहीं होते थे अपितु माता-पिता के आज्ञाकारी बनकर रहते थे। इसलिए यह आकलन एकपक्षीय अधिक लगता है। आज अमेरिका जैसी जगहों पर माता-पिता की नाक में दम कर रखा है बच्‍चों ने। इसलिए थोडा तो उन्‍हें डाँटना ही पडता है।

Unknown said...

मैं आपकी बात से आंशिक रूप से सहमत हूँ, असल में मैं इस बिषय पर शोध कर रहा हूँ, काफी आँकड़े जुटाये हैं, अभी काफी काम बाकी है पर जितना मैंने अभी तक महसूस किया है, वो ये है कि बच्चों जब छोटे हों तब उनको इस तरह प्रताड़ित नहीं करना चाहिए, 10 साल से छोटे बच्चे को इस तरह डांटना नहीं चाहिए, पर 10 साल से अधिक के बच्चे यदि कुछ ऐसी गलतियाँ करना शुरू करें जो कि अक्षम्य हों तो उनको मारने-पीटने चाहिए यानि थोडा दबाब बनाना शुरू कर देना चाहिए, अन्यथा वो उद्दंड हो जायेंगे|

यहाँ एक बात और ध्यान रखने लायक है, आपको मजबूरी में डांटना या पीटना पड़े तो कुछ समय बाद उनको प्यार से उनकी गलती बताएं और समझाएं|

यदि माता पिता दोनों ही ऐसा करेंगे तो बहुत गडबड हो जायेगी, एक थोडा दबाब बना कर रखे और एक खूब प्यार उडेले तो ठीक है, एक और बात जो मेरी खोज में सामने आयी है वो ये कि यदि आप पढाते नहीं हैं तो पढ़ने के पीछे अपने बच्चे को मारें नहीं, यदि इस बात पर बच्चे को पीटने का मन कर रहा है तो पहले खुद को पीटें क्यूंकि यह आपकी गलती है कि आप उसको पढाते नहीं हैं,

एक और बात: अधितकर माता पिता बच्चों को ये जताते हैं कि हम तुम्हारे ऊपर बहुत रु. खर्च कर रहे हैं और तुम ऐसे हो वैसे हो| यह बहुत बहुत हानिकारक होता है, बच्चे के लिए भी और आपके लिए भी|

और भी बहुत कुछ है, अपने ब्लॉग पर लिखूंगा किसी दिन इस पर एक पोस्ट आंकड़ों के साथ :)

निर्मला कपिला said...

सार्थक आलेख है। और बहुत कुछ है---- इसका इन्तजार रहेगा। आभार।

प्रवीण पाण्डेय said...

सच कहा, छोटे पौधों की तरह सम्हाल कर रखना होगा।

Udan Tashtari said...

उत्तम एवं सार्थक आलेख.

Rajeev Bharol said...

मैं अजित गुप्ता जी की टिप्पणी से सहमत हूँ.

Akshitaa (Pakhi) said...

कोई अपने बच्चों को भी मारता है..छी..छी...गन्दी बात.

S R Bharti said...

गलती का एहसास कराने के लि‌ए हिंसक होने की जरूरत नहीं है, प्यार से बता‌एं । प्यार हर काम को आसन करता है । यह मुश्किल तो है, लेकिन दुश्कर नहीं और परिणाम सौ प्रतिशत ।

well said !

Patali-The-Village said...

उत्तम एवं सार्थक आलेख| गलती का एहसास कराने के लि‌ए हिंसक होने की जरूरत नहीं है, प्यार से बता‌एं|

A.G.Krishnan said...

JAI SHRI KRISHNA.

Blessings to all Children. Enjoy this joke :-

Kalmadi visits Antique shop (owned by Ronie, the naughty fellow).

Kalmadi : I’m looking for something “unique” to be kept in my Drawing………. make others envious…..U know..... (winks).

Ronie : Ok, Ok Sir, I got it……(assures and goes to Store Room; after a while, returns with “something” beautifully wrapped in a gift pack).

Ronie : This is the only piece left…………SPECIALLY FOR YOU.
Kalmadi wanted to see it before parting Rs.50,000/- but Ronie won’t allow fearing leakage of its secrecy/uniqueness……instructs Kalmadi not to open it before reaching home. Finally Kalmadi makes payment and comes home wondering about the content. At home, he opens the pack.

Kalmadi : What nonsense…….."old dusty leather sleeper and that too a single piece” ?


(Immediately makes a Call to Ronie who asks him to read the letter attached with it)

Letter goes this way :-

“This is a unique sleeper which was hurled at former corrupt CWG Official Kalmadi in the Court complex in New Delhi."

HA HA HA ! ! !

Surendra shukla" Bhramar"5 said...

आकांक्षा जी निम्न बात आप की जायज है लेकिन देखा ये जाता है वास्तविक जिंदगी में की बच्चे तो बच्चे होते हैं आप उन्हें एक बार डांट देती हैं की फिर ऐसा करोगे तो मार पड़ेगी फिर गलती फिर वही बात आप कहती रहती हैं और वे जान जाते हैं की मम्मा या डैड मारेंगे तो है नहीं इसलिए वे गलती करते रहते हैं एक दो बार तो आप उन्हें छोड़ सकती हैं लेकिन फिर थोडा सख्ती या मार पड़े तो वे सुधर जाते हैं जो उनकी जिंदगी भर काम आता है

गलती का एहसास कराने के लि‌ए हिंसक होने की जरूरत नहीं है, प्यार से बता‌एं । प्यार हर काम को आसन करता है । यह मुश्किल तो है, लेकिन दुश्कर नहीं और परिणाम सौ प्रतिशत