Saturday 9 October 2010

लेटर बाक्स - कृष्ण कुमार यादव

आप सभी ने लेटर-बाक्स देखा होगा...लाल-लाल. अब तो हरे, पीले, नीले लेटर-बाक्स भी दिखने लगे हैं. ये लेटर बाक्स चिट्ठियों को एक जगह से दूजी जगह ले जाने के लिए आधार का कार्य करते हैं. इनके बिना तो पत्रों की दुनिया भी सूनी हो जाएगी. मोबाईल और नेट आ जाने के बाद दुनिया भर में व्यक्तिगत पत्रों की संख्या में कमी आई है, पर अपने देश में अभी भी हर दिन डाकिया 2 करोड़ डाक बाँटता है. सुनकर विश्वास नहीं होता न...पर यही सच है. आज तो 'विश्व डाक दिवस' भी है. इसी दिन विश्व डाक संघ का 1874 में गठन हुआ था. चलिए आज के दिन लेटर-बाक्स को लेकर एक बाल-कविता-



लाल रंग का लेटर बाक्स
पेट इसका खूब बड़ा
जाड़ा, गर्मी या बरसात
रहता है अडिग खड़ा

लाल, गुलाबी, हरे, नीले
पत्र जायें देश-विदेश
हर पत्र की है महत्ता
छुपा हुआ सबका संदेश।

खूब सारे पत्र आते
पेट में इसके समाते
सब पाकर अपना संदेशा
मन ही मन खुश हो जाते।

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