Sunday 13 October 2013

हिन्दी बाल-काव्य को मध्यप्रदेश का योगदान

म ध्यप्रदेश साहित्य-सृजन का अत्यन्त उर्वर  क्षेत्र है। साहित्य की विविध विधाओं का    यहां निरन्तर विकास हुआ है और आज   भी हो रहा है।
मध्यप्रदेश का श्रेष्ठ बाल-साहित्य भी रेखांकित करने योग्य है। बाल-साहित्य के अन्तर्गत बाल-काव्य का उल्लेख विशेष रूप से किया जा सकता है। अनेक प्रमुख बाल-काव्य प्रणेताओं की जन्मभूमि या कर्मभूमि होने का गौरव मध्यप्रदेश को प्राप्त है। इस पर साभार प्रस्तुत है वरिष्ठ बाल-साहित्यकार  विनोद चन्द्र पाण्डेय 'विनोद' का एक महत्वपूर्ण आलेख.

कामता प्रसाद गुरु का नाम हिन्दी के प्रारंभिक बाल-काव्य के रचनाकारों में प्रमुख है। उनका जन्म सन् 1875 ई. में ग्राम परकोटा, जिला सागर में हुआ था। यद्यपि एक व्याकरणविद् के रूप में उनकी ख्याति अधिक है तथापि उन्होंने अनेक बाल-कविताओं का सृजन किया। एक उदाहरण प्रस्तुत है-
यह सुन्दर छड़ी हमारी।
है हमें बहुत ही प्यारी॥
यह खेल समय हर्षाती।
मन में है साहस लाती॥
तन में अति जोर जगाती।
उपयोगी है यह भारी।
यह सुन्दर छड़ी हमारी॥
पं. सुखराम चौबे गुणाकर का भी नाम मध्यप्रदेश के बाल-काव्य प्रणेताओं में उल्लेखनीय है। इनका जन्म सन् 1867 ई. में ग्राम रहली, जिला सागर में हुआ था। अध्यापन-कार्य करते हुए भी उन्होंने बच्चों के लिए प्रिय कविताएं लिखी थीं। एक बाल-कविता की कुछ पंक्तियां उध्दृत हैं-
यह छाता है सुखदाई। मैं इसे न दूँ भाई।
जब घर से बाहर जाता था बाहर से घर आता।
यह संग में आता जाता। रखता है सदा मिताई।
लोचन प्रसाद पाण्डेय का नाम भी मध्यप्रदेश के बाल-काव्यकारों में आदर के साथ लिया जाता है। उन्होंने बाल-विनोद, बालिका-विनोद, पद्य-पुष्पांजलि आदि बालोपयोगी कविता-पुस्तकों का प्रणयन किया एक कविता की कुछ पंक्तियाँ अवलोकनीय हैं-
खेल-समय खेलो तुम सब मिल, करो समय पर अपना काम।
उद्योगी हर्षित होने की है यह प्यारी रीति ललाम।
जो कुछ करते हो मन देकर, करो सदा तुम सुखदाई।
काम अधूरे कभी जगत में ठीक नहीं होते भाई।
पं. लल्ली प्रसाद पाण्डेय का जन्म सन् 1886 ई. में सानोदा, सागर (मध्य भारत) में हुआ था। बच्चों की प्रतिष्ठित पत्रिका 'बालसखा' का सुदीर्घकाल तक सम्पादन कर अनेक बाल साहित्यकारों का निर्माण किया। वह स्वयं भी बाल साहित्य का सृजन करते रहे। एक बाल-कविता की कुछ पंक्तियाँ उध्दरणीय है-
ऑंखों पर चश्मा है सुन्दर, सिर पर गाँधी टोपी है।
और गले में पड़ा दुपट्टा, निकली बाहर चोटी है।
टेबिल लगा बैठ कुर्सी पर, लिखते हैं वानर जी लेख।
करते है कविता का कौशल, रहती जिसमें मीन न मेख।
देवी प्रसाद गुप्त 'कुसुमाकर' का जन्म सन् 1893 ई. में ग्राम बनखेड़ी, जिला होशंगाबाद में हुआ था। यद्यपि व्यवसाय से वे वकील थे तथापि बच्चों के लिए उन्होंने अनेक सुन्दर कविताएँ लिखीं। एक कविता की कुछ पंक्तियाँ उल्लेखनीय हैं-
दादा का जब मुँह चलता है, मुझे हंसी तब आती है।
अम्मा मेरे कान खींचकर, मुझको डाँट बताती है।
किन्तु हँसी बढ़ती जाती है, मेरे वश की बात नहीं।
चलते देख पपोले मुख को, रूक सकती है हँसी कहीं।

हिन्दी के बाल-काव्य प्रणेताओं में सभा मोहन अवधिया स्वर्ण सहोदर का नाम अत्यन्त सम्मानपूर्वक लिया जाता है। उनका जन्म सन् 1902 ई. में शहापुरा, जिला मण्डला (मध्यप्रदेश) में हुआ था। वह शिक्षण कार्य से जुड़े रहे और निरन्तर बाल-साहित्य में साधनारत रहे। उन्होंने मनोरंजक, प्रेरक और ज्ञानवर्धक बाल-कविताएं लिखी हैं। कुछ काव्य पंक्तियाँ उल्लेखनीय हैं-
नटखट हम हाँ, नटखट हम। करने निकले खटपट  हम।
आ गये लड़के या गये हम। बन्दर देख लुभा गये हम।
बन्दर को बिजकावें हम। बन्दर दौड़ा भागे हम।
बच गये लड़के, बच गये हम।
ठाकुर गोपाल शरणसिंह हिन्दी के प्रमुख कवि माने जाते हैं। उनका जन्म सन् 1891 ई. में रीवा (म.प्र.) में हुआ था। उन्होंने कुछ बालोपयोगी कविताएं भी लिखी हैं। एक उदाहरण प्रस्तुत है-
सुन्दर सजीला चटकीला वायुयान एक,
भैया हरे कागज का आज मैं बनाऊँगा।
चढ़ के उसी पै सैर नभ की करूँगा खूब,
बादल के साथ-साथ उसको उड़ाऊँगा।
मन्द-मन्द चाल से चलाऊँगा उसे मैं वहाँ,
चहक-चहक चिड़ियों के संग मैं गाऊंगा।
चन्द्र का खिलौना, मृग छोना वह छीन लूंगा।
भैया को गगन की तरैया तोड़ लाऊँगा।
श्रीमती सुभद्राकुमारी चौहान हिन्दी की सुप्रतिष्ठित कवयित्री हैं। यद्यपि सन् 1904 ई. में उनका जन्म प्रयाग (उ.प्र.) में हुआ था, तथापि उनका विवाह जबलपुर के सुप्रसिध्द वकील लक्ष्मणसिंह चौहान से हुआ था। उनकी बचपन शीर्षक बाल कविता अत्यधिक लोकप्रिय है। उसकी कुछ पंक्तियाँ विशेष रूप से पठनीय हैं-
मैं बचपन को बुला रही थी, बोल उठी बिटिया मेरी।
नन्दन-वन-सी फूल उठी वह, छोटी-सी कुटिया मेरी।
'माँ ओ' कहकर बुला रही थी, मिट्टी खाकर आई थी।
कुछ मुँह में कुछ लिए हाथ में, मुझे खिलाने लाई थी।
मैंने पूछा- 'यह क्या लाई', बोल उठी वह 'माँ काओ'
फूल-फूल मैं उठी खुशी से, मैंने कहा 'तुम्हीं खाओ।'
कविवर गौरीशंकर 'लहरी' का जन्म सन् 1909 ई. में सागर में हुआ था। वह मध्यप्रदेश के सूचना विभाग में कार्यरत रहे। उन्होंने बाल-कविताओं का सृजन भी किया। कुछ काव्य पंक्तियाँ उल्लिखित हैं-
बोली हवा बीज से उस दिन, चलो घू्मने मेरे साथ।
दूर-दूर के देश दिखाऊँ, जाने क्या लग जाये हाथ।
बीज आ गया इन बातों में, खुश हो घर से निकल पड़ा।
गया नहीं था बहुत दूर तब, मिट्टी ने उसको पकड़ा।

अमृतलाल दुबे का जन्म 1908 ई. में जबेरा, जिला दमोह (मध्यप्रदेश) में हुआ था। उन्होंने शिक्षा विभाग में कार्य किया और बालोपयोगी कविताओं की रचना की। एक बाल-कविता का यह अंश दृष्टव्य है-
शेर कहे मैं वन का राजा, खून पिया करता हूँ ताजा।
यह पहाड़ मेरी दहाड़ से, गूँजे, काँपे, थराए।
दुनिया मुझसे डर जाए।
साहित्यकार रामानुजलाल श्रीवास्तव का जन्म सन् 1898 ई. में सिहोरा (मध्य भारत) में हुआ था। इन्होंने बाल-कविताएँ भी लिखी हैं, जो 'बालसखा' पत्रिका में प्रकाशित होती रहती थी। बालकों को सन्देश देते हुए उन्होंने कहा था-
इसी भाँति तुम विद्या पढ़कर सुन्दर दीपक बन जाओ।
अज्ञानी के शून्य हृदय में ज्ञान-उजाला फैलाओ॥

पं. माखनलाल चतुर्वेदी 'एक भारतीय आत्मा' राष्ट्रीय भावधारा के प्रमुख कवि हैं। इनका जन्म सन् 1889 ई. में बाबई, जिला होशंगाबाद में हुआ था। खण्डवा में रहकर 'कर्मवीर' पत्रिका का सम्पादन करते थे। उनकी कुछ कविताएँ बालोपयोगी भी हैं। एक उदाहरण प्रस्तुत हैं-
ले लो दो आने के चार। लड्डू राजगिरे के यार।
यह है पृथ्वी जैसे गोल। ढुलक पड़ेंगे गोल-मटोल।
इनके मीठे स्वादों में ही बन जाता है इनका मोल।
दामों का मत करो विचार। ले लो दो आने के चार।
एकांकी सम्राट डॉ. रामकुमार वर्मा का जन्म स्थान नरसिंहपुर (मध्यभारत) था। इनका जन्म सन् 1905 ई. में हुआ था। यह इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष रहे। वहीं रहकर इन्होंने साहित्य-साधना की। इनकी बाल कविताएँ 'चमचम', 'शिश'ु और बालसखा में प्रकाशित होती थी। एक बालोपयोगी कविता उदाहरण स्वरूप उध्दृत की जा रही है-
प्रभुवर सूरज को चमकाकर, रोज सबेरे देते भेज।
काम घूमने का सिखलाकर, भर देते हो उसमें तेज॥
इसी तरह मुझको भी अब सब, काम खूब सिखला देना।
मुझमें अपना तेज डालकर, दुनिया में चमका देना॥
रामेश्वर गुरु 'कुमार हृदय' की बाल-काव्य साधना अविस्मरणीय है। उनका जन्म सन् 1914 ई. को जबलपुर में हुआ था। उनकी बाल कविताएं बालसखा, शिशु और खिलौना आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित होती थीं। उनके एक अभिनय गीत का यह अंश अवलोकनीय है-
राजा (पहले कैदी से)
क्यों तुम पड़े कैद में जाकर,
बतलाओ कारण समझाकर।
पहला कैदी (हाथ जोड़कर)
लोगों ने दी झूठ गवाही।
लाए मुझको पकड़ सिपाही।
दूसरा कैदी- (गिड़गिड़ाकर पैरों पर पड़ते हुए)
वह हाकिम था पूरा फंदी।
जिसने मुझे बनाया बंदी।
लक्ष्मी प्रसाद मिश्र 'कवि-हृदय' का जन्म सन् 1913 ई. में सागर में हुआ था। उन्होंने बाल कविताओं की रचना की जिनका प्रकाशन तत्कालीन अनेक बाल पत्रिकाओं की रचना की जिनका प्रकाशन तत्कालीन अनेक बाल-पत्रिकाओं में हुआ। उनकी बाल कविता का एक उदाहरण दृष्टव्य है-
हरे-भरे मैदान हमारे। लगते हैं हमको अति प्यारे।
खेलों की हरियाली प्यारी। बागों की है शोभा न्यारी॥
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी मध्यप्रदेश (अब छत्तीसगढ़) के खैरागढ़ के निवासी थे। सरस्वती पत्रिका का सम्पादन उन्होंने दीर्घकाल तक किया था। उनकी बाल कविताएं भी बच्चों में लोकप्रिय थीं। एक कविता का अंश प्रस्तुत है-
बुढ़िया चला रही थी चक्की। पूरे साठ वर्ष की पक्की।
दोने में थी रखी मिठाई। उस पर उड़कर मक्खी आई।
विनय मोहन शर्मा 'वीरात्मा' का जन्म सन् 1905 ई. में करकवेल मध्यप्रदेश में हुआ था। इनका वास्तविक नाम शुकदेव प्रसाद तिवारी था। उन्होंने 'वीरात्मा' नाम से अनेक बाल कविताओं का सृजन किया। एक बाल कविता उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत है-
मधुर गीत गा नींद बुलाना। थपकी दे दे मुझे सुलाना।
मेरा जरा विकल हो जाना। तेरा टप-टप अश्रु गिराना।
वह अब तो मुझे रूलाता है। माँ! तेरी याद दिलाता है।

ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी का जन्म सन् 1908 में ई. में ग्राम करेली, जिला नरसिंहपुर (मध्य प्रदेश) में हुआ था। उन्होंने बाल गीतों की भी रचना की। उनके एक बाल गीत का अंश उल्लिखित है-
अम्मा अम्मा मुझे बता दे यह चमकीले तारे।
सारी रात छिपा ही खेला करते हैं बेचारे।

सन् 1908 ई. में जन्मे रूद्रदत्त मिश्र मध्यप्रदेश के सूचना विभाग में कार्यरत रहे। उन्होंने उल्लेखनीय बाल काव्य साधना की। उनकी एक बाल कविता उध्दरणीय है-
नहीं किसी का लेना-देना, नहीं किसी का खाना।
कंकड़-पत्थर जो मिल जाए, वही हमारा खाना।
 नहीं घोंसला कहीं हमारा, नहीं हमारा घर है।
जहां बैठकर रात बितावें, वही हमारा घर है।
शांति चाहते हम दुनिया में, झगड़ा हमें न भाता।
हम सबका ही हित करते हैं, रखते अच्छा नाता।
बाबूलाल जैन 'जलज' का जन्म सन् 1909 ई. में देवरीकलां, जिला सागर मेें हुआ था। उनका बाल-काव्य सृजन भी सराहनीय है। उनकी एक बाल प्रार्थना उध्दृत है:-
प्रभुवर दीजै यह वरदान।
शीलवान विनयी हम होवें। कभी फूट के बीज न बोवें।
दीन जनों के दु:ख को खोवें। करें सदा सबका ही मान।
गुणी जनों की संगति पावें। उच्च विचार सदा मन आवें।
लोभ मोह से चित्त हटावें। समझें सबको सदा समान।
हिन्दी बाल साहित्य साधकों में नर्मदा प्रसाद खरे का नाम सुविख्यात है। उनका जन्म सन् 1913 ई. जबलपुर में हुआ था। उनकी अनेक बाल काव्य कृतियां प्रकाशित हुई हैं। तितली के संबंध में उनकी एक बाल कविता विशेष रूप से पठनीय है-
रंग-बिरंगे पंख तुम्हारे, सबके मन को भाते हैं।
कलियां देख तुम्हें खुश होतीं, फूल देख मुस्काते हैं।
रंग-बिरंगे पंख तुम्हारे, सबका मन ललचाते हैं।
तितली रानी, तितली रानी कहकर सभी बुलाते हैं।
पास नहीं क्यों आती तितली, दूर-दूर क्यों रहती हो।
फूल-फूल के कानों में तुम जा-जाकर क्या कहती हो?
सन् 1911 ई. में जिला सागर, (मध्यप्रदेश) में जन्मे देवीदयाल चतुर्वेदी 'मस्त' कुछ समय तक 'बाल सखा' पत्रिका के संपादक रहे। उन्होंने स्वयं भी बाल कविताओं की रचना की। उनकी एक बाल कविता की कुछ पंक्तियां उल्लेखनीय हैं-
टन-टन टन-टन घंटा बजता, शाला को हम जाते हैं।
वहां पहुंचकर पंडित जी को हम सब शीश झुकाते हैं।
अच्छी-अच्छी बातें हमको पंडित जी बतलाते हैं।
रोज कहानी, गीत बहुत से वह हमको सिखलाते हैं।
अब्दुल रहमान सागरी का जन्म सन् 1911 ई. में ग्राम गढ़कोटा, जिला सागर में हुआ था। बच्चों के लिए उन्होंने श्रेष्ठ कविताएं लिखी हैं। जागरण का संदेश देते हुए उन्होंने आह्वान किया है-
जागो और जगाओ।
बीत चुकीं आलस की घड़ियां,
जाग उठीं अब सारी चिड़ियां।
जागे फूल खिलीं अब कलियां॥
तुम भी जागो आओ। जागो और जगाओ।
उत्तम चन्द्र श्रीवास्तव का कार्यक्षेत्र मध्य भारत था। उनका जन्म सन् 1916 ई. में हुआ था। उनकी एक बाल कविता का अंश उध्दृत है-
नया साल आया है भाई खुशियां नई मनाने को।
अपना और सभी का जीवन सुन्दर सुखी बनाने को॥

सन् 1918 ई. में जबलपुर में जन्मे डॉ. राजेश्वर गुरु भी बच्चों के श्रेष्ठ कवि रहे हैं। उनका एक शिशुगीत प्रस्तुत है-
बिल्ली मेरी प्यारी मौसी, कौआ मेरा मामा।
बिल्ली पहने फ्राक गरारा, कौआ जी पाजामा।
लाला जगदलपुरी का जन्म सन् 1920 ई. में जगदलपुर, जिला बस्तर में हुआ था। उनका बाल-काव्य भी सराहनीय है। एक उदाहरण दृष्टव्य है-
नन्ही-सी माचिस की तीली।
रगड़े खाती आग उगलती। उजियाला देने को जलती।
कहती मुझसे सही काम लो। आग संभाले नहीं संभलती।

सन् 1922 ई. में बिलहरा, सागर (मध्यप्रदेश) में जन्मे कृष्णकान्त तेलंग ने भी बच्चों की कविताएँ लिखी हैं। एक उदाहरण देखिए-
लम्बी-लम्बी भूरी मोटी बाबा की थीं मूँछे।
मानो होठों पर रक्खी हों, ला घोड़े की पूँछें।
रामभरोसे गुप्त 'राकेश' का जन्म सन् 1925 ई. में आलमपुर जिला भिण्ड (मध्यप्रदेश) में हुआ। उनकी बाल-काव्य साधना प्रशंसनीय है। एक बाल-कविता की कुछ पंक्तियाँ अवलोकनार्थ प्रस्तुत हैं-
देशभक्ति के गीत सुनाते, वीर साहसी सैनिक हम।
कभी न कड़वे वचन बोलते, वाणी रखते सदा नरम॥
डॉ. हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य के सुप्रतिष्ठित रचनाकार हैं। उनका जन्म सन् 1940 ई. में नागोद, जिला सतना में हुआ। उन्होंने बाल-कविताएँ भी लिखी हैं। कुछ पंक्तियाँ उध्दरणीय है-
कविवर तोंदूराम बुझक्कड़ कभी-कभी आ जाते हैं।
खड़ी निरन्तर रहती चोटी, आंखें धँसी मिचमिची छोटी।
नाक चायदानी की टोंटी,
अंग-अंग की छटा निराली, भारी तोंद हिलाते हैं।
सन् 1945 ई. में ग्राम रामपुर कला, परगना सबलगढ़, जिला मुरैना (मध्यप्रदेश) में जन्मे आााद रामपुरी की भी एक बाल-कविता अवलोकनीय है-
लंगड़ा तोतापरी कठौआ खुशियों भरे दशहरी आम।
रस गुब्बारे गाल फुलाए सजधज खड़े सुनहरी आम।
राजा चौरसिया ने प्रभूत बाल-काव्य की रचना की है।
उपर्युक्त रचनाकारों के अतिरिक्त जगदीश तोमर, देवेन्द्र दीपक, परशुराम शुक्ल, अभिनव तैलंग, वीरेन्द्र मिश्र, अंशु शुक्ला, अशोक आनंद, अहद प्रकाश, गफूर स्नेही, भीष्मसिंह चौहान, गोवर्धन शर्मा, नयन कुमार राठी, ललित कुमार उपाध्याय, आशा शर्मा, नरेन्द्रनाथ लाहा, बटूक चतुर्वेदी, रमेशचन्द्र शाह, राम वल्लभ आचार्य, लक्ष्मीनारायण पयोधि, उषा जायसवाल, पदमा चौगांवकर आदि ने भी बाल काव्य की समृध्दि में अपना बहुमूल्य योगदान दिया है, किन्तु सभी की बाल कविताओं के उध्दरण देना सम्भव नहीं प्रतीत होता।
मध्यप्रदेश से प्रकाशित बाल-पत्रिकाओं शक्तिपुत्र, चकमक, समझ-झरोखा, देवपुत्र, अपना बचपन और स्नेह आदि तथा उनके संपादकों ने बाल-काव्य के विकास में महती भूमिका निभाई है। विशेष रूप से कृष्णकुमार अष्ठाना और महेश सक्सेना का योगदान सराहनीय है। भोपाल में स्थापित बाल कल्याण एवं बाल साहित्य शोध केन्द्र तथा इन्दौर में स्थापित बाल साहित्य सृजन पीठ का अवदान विस्मृत नहीं किया जा सकता। अत: इसमें कोई सन्देह नहीं कि हिन्दी बाल-काव्य को मध्यप्रदेश का योगदान रेखांकित करने योग्य है। 

(मध्यप्रदेश संदेश से साभार)
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